रॉबर्ट्सगंज (सोनभद्र): चित्रगुप्त जयंती के अवसर पर जनपद मुख्यालय रॉबर्ट्सगंज में स्थित चित्रगुप्त मन्दिर में पूजा का अयोजन किया गया। इसी के अंतर्गत सोनभद्र जनपद के हैनीमैन कहे जाने वाले होम्योपैथ चिकित्सक, समाजसेवी डॉक्टर जयराम लाल श्रीवास्तव के आवास जय निवास पर चित्रगुप्त जयंती का आयोजन बड़ी हर्षोल्लास के साथ संपन्न हुआ। इस अवसर पर उपस्थित होम्योपैथ चिकित्सक डॉक्टर कुसमाकर श्रीवास्तव, दिवाकर श्रीवास्तव, प्रभाकर श्रीवास्तव, साधना श्रीवास्तव, विनीता श्रीवास्तव लक्ष्मी, श्रीवास्तव शुभम श्रीवास्तव, कुसंग श्रीवास्तव, डॉक्टर कृति, श्रीवास्तव, पंखुड़ी प्रभाकर, नितिशा श्रीवास्तव, दिव्यांशी श्रीवास्तव, समर्थ श्रीवास्तव सहित अन्य सजातीय बंधुओं, स्त्रियों, पुरुषों, बच्चों ने भाग लिया और भगवान चित्रगुप्त के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलित कर पूजा, पाठ, हवन इत्यादि का कार्यक्रम आयोजित हुआ।
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लोक मान्यताओं के अनुसार कायस्थ बंधु दीपावली के दिन अपनी कलम का प्रयोग बंद कर देते हैं और दीपावली के लगभग 24 घंटे बाद यमराज के लेखाकार चित्रगुप्त की पूजा अर्चना करते हैं इसके साथ-साथ कलम दवात की पूजा करते हुए लेखन कार्य करते हैं।
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जानकारी के अनुसार सोनभद्र नगर में चित्रगुप्त पूजा का आरंभ डॉ० जयराम लाल श्रीवास्तव, राजा शारदा महेश इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य रूद्र प्रसाद श्रीवास्तव, ललित मोहन श्रीवास्तव सहित अन्य कायस्थ बंधुओं ने मिलकर चित्रगुप्त पूजा का आरंभ किया था, तब से यह पूजा अनवरत रूप से चला आ रहा है, इस पूजा में कायस्थ बंधुओं के अलावा अन्य जाति, समुदाय के लोग शामिल हुए और भगवान चित्रगुप्त की पूजा, अर्चना, आरती इत्यादि में श्रद्धा पूर्वक भाग लिया।
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चित्रगुप्त पृथ्वी वासियों के अच्छे बुरे कर्मों का हिसाब रखने वाले हैं और मृत्यु के पश्चात उनके लेखनी अनुसार ही पृथ्वी वासियों का परलोक तय होता है और वही स्वर्ग और नर्क का निर्णय लेते हैं, चित्रगुप्त जयंती के अवसर पर लोगों ने एक दूसरे से मिलकर शुभकामनाएं दी और और लोक कल्याण सुख समृद्धि खुशहाली के लिए भगवान चित्रगुप्त से प्रार्थना किया।
संस्कृति लाइव संवाददाता, सोनभद्र। जनपद मुख्यालय रॉबर्ट्सगंज में स्थिति बांके बिहारी मंदिर में गोवर्धन पूजा का भव्य आयोजन मथुरा वृंदावन के तर्ज पर किया गया ,इस अवसर पर बांके बिहारी जी को 56 प्रकार का भोग, मेवा, मिश्री, दही, दूध, मक्खन इत्यादि का भोग लगाया गया और उनकी विधिवत पूजा, आरती श्रद्धालुओं द्वारा किया गया।
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इस अवसर पर उपस्थित महिला श्रद्धालुओं ने बाके बिहारी जी के सम्मान में विभिन्न प्रकार के लोकगीत ढोलक की थाप, करताल की ध्वनि पर गाया। ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान गोवर्धन इंद्र का घमंड चूर करने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठाया था और देवराज इंद्र द्वारा बरसाए गए जल से नगर वासियों को बाढ़ की विभीषिका से बचाया था और नागरिकों के जीवन की रक्षा किया था।
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बांके बिहारी मंदिर सहित नगर के राम भक्त हनुमान के मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा महाबली हनुमान को 56 प्रकार का भोग, लड्डू, मिष्ठान आदि का भोग लगाया गया इस अवसर पर संकट से बचने के लिए लोगों ने सुंदरकांड, हनुमान चालीसा का पाठ भी किया।
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गोवर्धन पूजा का आयोजन स्थानीय जनों ने अपने घरों में भी किया इस अवसर पर स्त्रियों ने लोकगीत, लोक कथाएं आदि का वाचन किया किया सोनभद्र नगर में यह परंपरा वर्षों से कायम है और भक्तजन अपनी श्रद्धा पूर्वक पूजा-पाठ के माध्यम से सुख समृद्धि की कामना करते हैं ।
रॉबर्ट्सगंज (सोनभद्र): दीपावली धन की देवी लक्ष्मी के सम्मान में विगत वर्षों की भांति इस वर्ष भी जनपद सोनभद्र में दीपावली का त्यौहार हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। इस अवसर पर जनपद वासियों ने जहां एक और अपने घरों की सफाई रंग रोगन करके अपने घरों व्यापारिक प्रतिष्ठानों को दीपमाला बिजली के झालरों मोतियों से सजाया वहीं दूसरी ओर उत्साही युवकों युवकों ने पटाखे फोड़कर अपनी खुशी का इजहार किया और मंदिरों में दीप प्रज्वलित कर आध्यात्मिक, सुख, शांति, स्वास्थ्य, दीर्घायु होने की मंगल कामना किया।
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भक्तजनों ने शुभ मुहूर्त में मां लक्ष्मी गणेश कुबेर मां काली की विधिवत पूजा पाठ किया। पंच दिवसीय पर्व के अंतर्गत पंचांग के अनुसार अमावस्या यह दिन इस पर्व को मनाए जाने के संदर्भ में अनेकों की मिथक, पौराणिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, लोक कथाएं इत्यादि प्रचलित है। इतिहासकार दीपक कुमार केसरवानी के अनुसार-“प्राचीन हिंदू ग्रन्थ रामायण में बताया गया है कि दीपावली को 14 साल के वनवास पश्चात भगवान राम व पत्नी सीता और उनके भाई लक्ष्मण अयोध्या लौटने की खुशी दीपावली पर्व का आयोजन अयोध्या वासियों द्वारा किया गया था तब से लेकर आज तक यह पर्व संपूर्ण विश्व रूप से मनाया जा रहा है।
महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महाकाव्य महाभारत अनुसार दीपावली को 12 वर्षों के वनवास व 1 वर्ष के अज्ञातवास के बाद पांडवों की वापसी के प्रतीक रूप बनाया जाता है। लोक मान्यताओं के अनुसार-” दीपावली को भगवान विष्णु की पत्नी तथा उत्सव, धन और समृद्धि की देवी लक्ष्मी से जुड़ा हुआ हैं।
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दीपावली का पांच दिवसीय महोत्सव देवताओं और राक्षसों द्वारा सागर के मंथन से पैदा हुई लक्ष्मी के जन्म दिवस से शुरू होता है। दीपावली की रात वह दिन है जब लक्ष्मी ने अपने पति के रूप में विष्णु को चुना और फिर उनसे शादी की। लक्ष्मी के साथ-साथ भक्त बाधाओं को दूर करने के प्रतीक गणेश; संगीत, साहित्य की प्रतीक सरस्वती; और धन प्रबंधक कुबेर को प्रसाद अर्पित करते हैं। लोक मान्यताओं के अनुसार दीपावली को विष्णु की वैकुण्ठ में वापसी के दिन के रूप में मनाते है। इस दिन लक्ष्मीजी प्रसन्न रहती हैं इनके पूजन से भक्तजन वर्ष भर मानसिक, शारीरिक दुखों से दूर सुखी रहते हैं।
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भारत के पूर्वी क्षेत्र उड़ीसा और पश्चिम बंगाल में लक्ष्मी की जगह काली की पूजा करते हैं, और इस त्योहार को काली पूजा कहते हैं। मथुरा और उत्तर मध्य क्षेत्रों में इसे भगवान कृष्ण से जुड़ा मानते हैं। अन्य क्षेत्रों में, गोवर्धन पूजा (या अन्नकूट) की दावत में कृष्ण के लिए 56 या 108 विभिन्न व्यंजनों का भोग लगाया जाता है और सांझे रूप से स्थानीय समुदाय द्वारा मनाया जाता है।
भारत के पश्चिम और उत्तरी भागों में दीवाली का त्योहार नये हिन्दू वर्ष की शुरुआत का प्रतीक हैं।
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दीप जलाने की प्रथा के पीछे अलग-अलग कारण या कहानियाँ हैं। राम भक्तों के अनुसार दीवाली वाले दिन अयोध्या के राजा राम लंका के अत्याचारी राजा रावण का वध करके अयोध्या लौटे थे। उनके लौटने कि खुशी में आज भी लोग यह पर्व मनाते है। कृष्ण भक्तिधारा के लोगों का मत है कि इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने अत्याचारी राजा नरकासुर का वध किया था। इस नृशंस राक्षस के वध से जनता में अपार हर्ष फैल गया और प्रसन्नता से भरे लोगों ने घी के दीए जलाए। एक पौराणिक कथा के अनुसार विंष्णु ने नरसिंह रूप धारणकर हिरण्यकश्यप का वध किया था।तथा इसी दिन समुद्रमंथन के पश्चात लक्ष्मी व धन्वंतरि प्रकट हुए।
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जैन धर्म की मान्यताओं के अनुसार-” चौबीसवें तीर्थंकर, महावीर स्वामी को इस दिन मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। इसी दिन उनके प्रथम शिष्य, गौतम गणधर को केवल ज्ञान प्राप्त हुआ था।
जैन समाज द्वारा दीपावली, महावीर स्वामी के निर्वाण दिवस के रूप में मनाई जाती है। महावीर स्वामी (वर्तमान अवसर्पिणी काल के अंतिम तीर्थंकर) को इसी दिन (कार्तिक अमावस्या) को मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। इसी दिन संध्याकाल में उनके प्रथम शिष्य गौतम गणधर को केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। अतः अन्य सम्प्रदायों से जैन दीपावली की पूजन विधि पूर्णतः भिन्न है। सिख धर्म की मान्यताओं के अनुसार-“सिक्खों के लिए दीवाली महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसी दिन ही अमृतसर में 1577 में स्वर्ण मन्दिर का शिलान्यास हुआ था । इसके अलावा 1619 में दीवाली के दिन सिक्खों के छठे गुरु हरगोबिन्द सिंह जी को जेल से रिहा किया गया था।
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दीपावली पर्व को लेकर हिंदू धर्म विविध प्रकार की मान्यताएं हैं। मुख्य रूप से यह त्यौहार भगवती लक्ष्मी के आगमन एवं लोक जन में सुख, समृद्धि, ऐश्वर्या की वृद्धि को लेकर मनाया जाता है और यह भी मान्यता है कि मां लक्ष्मी के आगमन के पश्चात घरों में दुख विपत्ति के प्रतीक दरिद्र को घर के बाहर खेदने(निकालने) का नियम है। महिलाएं इस कार्य को बड़े ही मनमोहक ढंग से करती हैं इसके पीछे यह भी मान्यता है कि दीपावली के दिन रात भर लोग अपने घरों, प्रतिष्ठानों को मां लक्ष्मी के आगमन के लिए द्वार खुले रहते हैं, ऐसी स्थिति में चोरी आदि जैसे आर्थिक अपराधों से बचने के लिए दरिद्र खेदने का नियम हमारे पूर्वजों ने बनाया है। इसके साथ ही साथ दीपावली की रात्रि में काजल पारने की परंपरा भी कायम है और इस दिन बनाए हुए काजल में औषधि गुण होते हैं जिससे आंखों की ज्योति बढ़ती है।
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दीपावली पर्व की शुभकामनाएं देने का दौर इंटरनेट पर पहले से ही शुरू हो गया था लेकिन नगरों, कस्बों, ग्रामीण इलाकों में दीपावली के दिन लोगों ने एक दूसरे के घर जाकर गले मिलकर दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं दिया और स्वादिष्ट मिष्ठान व्यंजनों का स्वाद लिया।
दीपावली (संस्कृत : दीपावलिः = दीप + अवलिः = दीपकों की पंक्ति, या पंक्ति में रखे हुए दीपक) शरद ऋतु (उत्तरी गोलार्द्ध) में हर वर्ष मनाया जाने वाला एक प्राचीन सनातन त्यौहार है। दीपावली कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है दीपावली भारत के सबसे बड़े और सर्वाधिक महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। दीपावली दीपों का त्योहार है। आध्यात्मिक रूप से यह ‘अन्धकार पर प्रकाश की विजय’ को दर्शाता है।
भारतवर्ष में मनाए जाने वाले सभी त्यौहारों में दीपावली का सामाजिक और धार्मिक दोनों दृष्टि से अत्यधिक महत्त्व है। इसे दीपोत्सव भी कहते हैं। ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ अर्थात (हे भगवान!) मुझे अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाइए। यह उपनिषदों की आज्ञा है। इसे सिख, बौद्ध तथा जैन धर्म के लोग भी मनाते हैं। जैन धर्म के लोग इसे महावीर के मोक्ष दिवस के रूप में मनाते हैं[ तथा सिख समुदाय इसे बन्दी छोड़ दिवस के रूप में मनाता है।
माना जाता है कि दीपावली के दिन अयोध्या के राजा राम अपने चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात लौटे थे। अयोध्यावासियों का हृदय अपने परम प्रिय राजा के आगमन से प्रफुल्लित हो उठा था। श्री राम के स्वागत में अयोध्यावासियों ने घी के दीपक जलाए। कार्तिक मास की सघन काली अमावस्या की वह रात्रि दीयों की रोशनी से जगमगा उठी। तब से आज तक भारतीय प्रति वर्ष यह प्रकाश-पर्व हर्ष व उल्लास से मनाते हैं। भारतीयों का विश्वास है कि सत्य की सदा जीत होती है झूठ का नाश होता है। दीपावली यही चरितार्थ करती है- असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय।
दीपावली स्वच्छता व प्रकाश का पर्व है। कई सप्ताह पूर्व ही दीपावली की तैयारियाँ आरंभ हो जाती हैं। लोग अपने घरों, दुकानों आदि की सफाई का कार्य आरंभ कर देते हैं। घरों में मरम्मत, रंग-रोगन, सफेदी आदि का कार्य होने लगता है। लोग दुकानों को भी साफ-सुथरा कर सजाते हैं। बाजारों में गलियों को भी सुनहरी झंडियों से सजाया जाता है। दीपावली से पहले ही घर-मोहल्ले, बाजार सब साफ-सुथरे व सजे-धजे नज़र आते हैं।
फिजी फिजी में, दीपावली एक सार्वजनिक अवकाश है और इस धार्मिक त्यौहार को हिंदुओं (जो फिजी की आबादी का करीब एक तिहाई भाग का गठन करते है) द्वारा एक साथ मनाया जाता है, और सांस्कृतिक रूप से फिजी के दौड़ के सदस्यों के बीच हिस्सा लेते है और यह बहुत समय इंतजार करने के बाद साल में एक बार आता है। यह मूल रूप से 19 वीं सदी के दौरान फिजी के तत्कालीन कालोनी में ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय उपमहाद्वीप से आयातित गिरमिटिया मजदूरों द्वारा मनाया है, सरकार की कामना के रूप में फिजी के तीन सबसे बड़े धर्मों, यानि, ईसाई धर्म, हिंदू धर्म और इस्लाम के प्रत्येक की एक अलग से धार्मिक सार्वजनिक छुट्टी करने की स्थापना के लिए यह 1970 में स्वतंत्रता पर एक छुट्टी के रूप में स्थापित किया गया था।
फिजी में, भारत में दीपावली समारोह से एक बड़े पैमाने पर मनाया जाने के रूप में दीपावली पर अक्सर भारतीय समुदाय के लोगों द्वारा विरोध किया जाता है, आतिशबाजी और दीपावली से संबंधित घटनाओं को वास्तविक दिन से कम से कम एक सप्ताह शुरू पहले किया जाता है। इसकी एक और विशेषता है कि दीपावली का सांस्कृतिक उत्सव (अपने पारंपरिक रूप से धार्मिक उत्सव से अलग), जहां फिजीवासियों भारतीय मूल या भारत-फिजीवासियों, हिंदू, ईसाई, सिख या अन्य सांस्कृतिक समूहों के साथ मुस्लिम भी फिजी में एक समय पर दोस्तों और परिवार के साथ मिलने और फिजी में छुट्टियों के मौसम की शुरुआत का संकेत के रूप में दीपावली का जश्न मनाते है। व्यावसायिक पक्ष पर, दीपावली कई छोटे बिक्री और मुफ्त विज्ञापन वस्तुएँ के लिए एक सही समय है। फिजी में दीपावली समारोह ने, उपमहाद्वीप पर समारोह से स्पष्ट रूप से अलग, अपने खुद के एक स्वभाव पर ले लिया है।
समारोह के लिए कुछ दिन पहले नए और विशेष कपड़े, साथ साड़ी और अन्य भारतीय कपड़ों में ड्रेसिंग के साथ सांस्कृतिक समूहों के बीच खरीदना, और सफाई करना, दीपावली इस समय का प्रतिक होता है। घरों को साफ करते हैं और तेल के लैंप या दीये जलाते हैं। सजावट को रंगीन रोशनी, मोमबत्तियाँ और कागज लालटेन, साथ ही धार्मिक प्रतीकों का उपयोग कर रंग के चावल और चाक से बाहर का एक रंगीन सरणी साथ गठन कर के घर के आसपास बनाते है। परिवार, दोस्तों और पड़ोसियों और घरों के लिए बनाए गये निमंत्रण पत्र खुल जाते है। उपहार बनते हैं और प्रार्थना या पूजा हिन्दुओं द्वारा किया जाता है। मिठाई और सब्जियों के व्यंजन अक्सर इस समय के दौरान खाया जाता है और आतिशबाजी दिवाली से दो दिन पहले और बाद तक में जलाए जाते है।
मॉरिशस अफ्रीकी हिंदू बहुसंख्यक देश मॉरिशस में यह एक अधिकारिक सार्वजनिक अवकाश है।
रीयूनियन रियूनियन में, कुल जनसंख्या का एक चौथाई भाग भारतीय मूल का है और संयुक्त राज्य अमेरिका
संयुक्त राज्य अमेरिका में कई शहरों में दीवाली की घटनाओं और समारोहों का आयोजन किया जाता है। 2003 में दीवाली को व्हाइट हाउस में पहली बार मनाया गया और पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज वॉकर बुश द्वारा 2007 में संयुक्त राज्य अमेरिका कांग्रेस द्वारा इसे आधिकारिक दर्जा दिया गया।2009 में बराक ओबामा, व्हाइट हाउस में व्यक्तिगत रूप से दीवाली में भाग लेने वाले पहले राष्ट्रपति बने। संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति के रूप में भारत की अपनी पहली यात्रा की पूर्व संध्या पर, ओबामा ने दीवाली की शुभकामनाएं बांटने के लिए एक आधिकारिक बयान जारी किया।
2009 में काउबॉय स्टेडियम में, दीवाली मेला में 100,000 लोगों की उपस्थिति का दावा किया था। 2009 में, सैन एन्टोनियो आतिशबाजी प्रदर्शन सहित एक अधिकारिक दीवाली उत्सव को प्रायोजित करने वाला पहला अमेरिकी शहर बन गया; जिसमे 2012 में, 15,000 से अधिक लोगों ने भाग लिया था।वर्ष 2011 में न्यूयॉर्क शहर, पियरे में, जोकि अब टाटा समूह के ताज होटल द्वारा संचालित हैं, ने अपनी पहली दीवाली उत्सव का आयोजन किया। संयुक्त राज्य अमेरिका में लगभग 3 लाख हिंदू हैं।
ब्रिटेन
लीसेस्टर, यूनाइटेड किंगडम में दीवाली की सजावट।[56] ब्रिटेन में भारतीय लोग बड़े उत्साह के साथ दिवाली मनाते हैं। लोग अपने घरों को दीपक और मोमबत्तियों के साथ सजाते और स्वच्छ करते हैं। दीया एक प्रकार का प्रसिद्ध मोमबत्ति हैं। लोग लड्डू और बर्फी जैसी मिठाइयो को भी एक दूसरे में बाटते है, और विभिन्न समुदायों के लोग एक धार्मिक समारोह के लिए इकट्ठा होते है और उसमे भाग लेते हैं। भारत में परिवार से संपर्क करने और संभवतः उपहार के आदान प्रदान के लिए भी यह एक बहुत अच्छा अवसर है।
व्यापक ब्रिटिश के अधिक गैर-हिंदु नागरिकों को सराहना चेतना के रूप में दीपावली के त्योहार की स्वीकृति मिलना शुरू हो गया है और इस अवसर पर वो हिंदू धर्म का जश्न मानते है। हिंदुओ के इस त्यौहार को पूरे ब्रिटेन भर में मनाना समुदाय के बाकी लोगों के लिए विभिन्न संस्कृतियों को समझने का अवसर लाता है। पिछले दशक के दौरान प्रिंस चार्ल्स जैसे राष्ट्रीय और नागरिक नेताओं ने ब्रिटेन के में स्थित स्वामीनारायण मंदिर जैसे कुछ प्रमुख हिंदू मंदिरों में दीवाली समारोह में भाग लिया है, और ब्रिटिश जीवन के लिए हिंदू समुदाय के योगदान की प्रशंसा करने के लिए इस अवसर का उपयोग किया। वर्ष 2013 में प्रधानमंत्री डेविड कैमरन और उनकी पत्नी, दीवाली और हिंदू नववर्ष अंकन Annakut त्योहार मनाने के लिए Neasden में बीएपीएस स्वामीनारायण मंदिर में हजारों भक्तों के साथ शामिल हो गए।] 2009 के बाद से, दीवाली हर साल ब्रिटिश प्रधानमंत्री के निवास स्थान, 10 डाउनिंग स्ट्रीट, पर मनाया जा रहा है। वार्षिक उत्सव, गॉर्डन ब्राउन द्वारा शुरू करना और डेविड कैमरन द्वारा जारी रखना, ब्रिटिश प्रधानमंत्री द्वारा की मेजबानी की सबसे प्रत्याशित घटनाओं में से एक है।
लीसेस्टर (en:Leicester) भारत के बाहर कुछ सबसे बड़ी दीपावली समारोह के लिए मेजबान की भूमिका निभाता है।
न्यूज़ीलैंड न्यूजीलैंड में, दीपावली दक्षिण एशियाई प्रवासी के सांस्कृतिक समूहों में से कई के बीच सार्वजनिक रूप से मनाया जाता है। न्यूजीलैंड में एक बड़े समूह दिवाली मानते हैं जो भारत-फ़ीजी समुदायों के सदस्य हैं जोकि प्रवासित हैं और वहाँ बसे हैं। दिवाली 2003 में, एक अधिकारिक स्वागत के बाद न्यूजीलैंड की संसद पर आयोजित किया गया था।[65] दीवाली हिंदुओं द्वारा मनाया जाता है। त्योहार अंधकार पर प्रकाश, अन्याय पर न्याय, अज्ञान से अधिक बुराई और खुफिया पर अच्छाई, की विजय का प्रतीक हैं। लक्ष्मी माता को पूजा जाता है। लक्ष्मी माता प्रकाश, धन और सौंदर्य की देवी हैं। बर्फी और प्रसाद दिवाली के विशेष खाद्य पदार्थ हैं।
नेपाल
नेपाल में, कई जानवरों को दीवाली उत्सव में शामिल किया जाता है। कौआ, कुत्ता (ऊपर), गाय और बैल को अपने त्योहार तिहार के दौरान खिलाया और सजाया भी जाता है। दीपावली को “तिहार” या “स्वन्ति” के रूप में जाना जाता है। यह भारत में दीपावली के साथ ही पांच दिन की अवधि तक मनाया जाता है। परन्तु परम्पराओं में भारत से भिन्नता पायी जाती है। पहले दिन ‘काग तिहार’ पर, कौए को परमात्मा का दूत होने की मान्यता के कारण प्रसाद दिया जाता है। दूसरे दिन ‘कुकुर तिहार’ पर, कुत्तों को अपनी ईमानदारी के लिए भोजन दिया जाता है। काग और कुकुर तिहार के बाद ‘गाय तिहार’ और ‘गोरु तिहार’ में, गाय और बैल को सजाया जाता है। तीसरे दिन लक्ष्मी पूजा की जाती है। इस नेपाल संवत् अनुसार यह साल का आखिरी दिन है, इस दिन व्यापारी अपने सारे खातों को साफ कर उन्हें समाप्त कर देते हैं। लक्ष्मी पूजा से पहले, मकान साफ किया और सजाया जाता है; लक्ष्मी पूजा के दिन, तेल के दीयों को दरवाजे और खिड़कियों के पास जलाया जाता।
मलेशिया दीपावली मलेशिया में एक संघीय सार्वजनिक अवकाश है। यहां भी यह काफी हद तक भारतीय उपमहाद्वीप की परंपराओं के साथ ही मनाया जाता है। ‘ओपन हाउसेस’ मलेशियाई हिन्दू (तमिल,तेलुगू और मलयाली)द्वारा आयोजित किये जाते हैं जिसमें भोजन के लिए अपने घर में अलग अलग जातियों और धर्मों के साथी मलेशियाई लोगों का स्वागत किया जाता है। मलेशिया में दीवाली का त्यौहार धार्मिक सद्भावना और मलेशिया के धार्मिक और जातीय समूहों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों के लिए एक अवसर बन गया है।
सिंगापुर
लिटल इंडिया में दीवाली की सजावट, सिंगापुर में हिंदुओं के लिए यह एक वार्षिक उत्सव है। दीपावली एक राजपत्रित सार्वजनिक अवकाश है। अल्पसंख्यक भारतीय समुदाय (तमिल) द्वारा इसे मुख्य रूप से मनाया जाता है, यह आम तौर पर छोटे भारतीय जिलों में, भारतीय समुदाय द्वारा लाइट-अप द्वारा चिह्नित किया जाता है। इसके अलावा बाजारों, प्रदर्शनियों, परेड और संगीत के रूप में अन्य गतिविधियों को भी लिटिल इंडिया के इलाके में इस दौरान शामिल किया जाता है। सिंगापुर की सरकार के साथ-साथ सिंगापुर के हिंदू बंदोबस्ती बोर्ड इस उत्सव के दौरान कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन करता है।
श्री लंका यह त्यौहार इस द्वीप देश में एक सार्वजनिक अवकाश के रूप में तमिल समुदाय द्वारा मनाया जाता है। इस दिन पर लोग द्वारा सामान्यतः सुबह के समय तेल से स्नान करा जाता है , नए कपड़े पहने जाते हैं, उपहार दिए जाते है, पुसै (पूजा) के लिए कोइल (हिंदू मंदिर) जाते हैं। त्योहार की शाम को पटाखे जलना एक आम बात है। हिंदुओं द्वारा आशीर्वाद के लिए व घर से सभी बुराइयों को सदा के लिए दूर करने के लिए धन की देवी लक्ष्मी को तेल के दिए जलाकर आमंत्रित किया जाता है। श्रीलंका में जश्न के अलावा खेल, आतिशबाजी, गायन और नृत्य, व भोज आदि का अयोजन किया जाता है।
ऑस्ट्रेलिया ऑस्ट्रेलिया के मेलबॉर्न में, दीपावली को भारतीय मूल के लोगों और स्थानीय लोगों के बीच सार्वजनिक रूप से मनाया जाता है। फेडरेशन स्क्वायर पर दीपावली को विक्टोरियन आबादी और मुख्यधारा द्वारा गर्मजोशी से अपनाया गया है। सेलिब्रेट इंडिया इंकॉर्पोरेशन ने 2006 में मेलबोर्न में प्रतिष्ठित फेडरेशन स्क्वायर पर दीपावली समारोह शुरू किया था। अब यह समारोह मेलबॉर्न के कला कैलेंडर का हिस्सा बन गया है और शहर में इस समारोह को एक सप्ताह से अधिक तक मनाया जाता है।
पिछले वर्ष 56,000 से अधिक लोगों ने समारोह के अंतिम दिन पर फेडरेशन स्क्वायर का दौरा किया था और मनोरंजक लाइव संगीत, पारंपरिक कला, शिल्प और नृत्य और यारा नदी पर शानदार आतिशबाज़ीे के साथ ही भारतीय व्यंजनों की विविधता का आनंद लिया।
विक्टोरियन संसद, मेलबोर्न संग्रहालय, फेडरेशन स्क्वायर, मेलबोर्न हवाई अड्डे और भारतीय वाणिज्य दूतावास सहित कई प्रतिष्ठित इमारतों को इस सप्ताह अधिक सजाया जाता है। इसके साथ ही, कई बाहरी नृत्य का प्रदर्शन होता हैं। दीपावली की यह घटना नियमित रूप से राष्ट्रीय संगठनों एएफएल, क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया, व्हाइट रिबन, मेलबोर्न हवाई अड्डे जैसे संगठनों और कलाकारों को आकर्षित करती है। स्वयंसेवकों की एक टीम व उनकी भागीदारी और योगदान से यह एक विशाल आयोजन के रूप में भारतीय समुदाय को प्रदर्शित करता है।
अकेले इस त्योहार के दौरान एक सप्ताह की अवधि में भाग लेने आये लोगों की संख्या के कारण फेडरेशन स्क्वायर पर दिवाली को ऑस्ट्रेलिया में सबसे बड़े उत्सव के रूप में पहचाना जाता है।
ऑस्ट्रेलियाई बाहरी राज्य क्षेत्र, क्रिसमस द्वीप पर, दीपावली के अवसर पर ऑस्ट्रेलिया और मलेशिया के कई द्वीपों में आम अन्य स्थानीय समारोहों के साथ, एक सार्वजनिक अवकाश के रूप में मान्यता प्राप्त है।
रंगोली दीपावली के दिन भारत में विभिन्न स्थानों पर मेले लगते हैं।[66] दीपावली एक दिन का पर्व नहीं अपितु पर्वों का समूह है। दशहरे के पश्चात ही दीपावली की तैयारियाँ आरंभ हो जाती है। लोग नए-नए वस्त्र सिलवाते हैं। दीपावली से दो दिन पूर्व धनतेरस का त्योहार आता है। इस दिन बाज़ारों में चारों तरफ़ जनसमूह उमड़ पड़ता है। बरतनों की दुकानों पर विशेष साज-सज्जा व भीड़ दिखाई देती है। धनतेरस के दिन बरतन खरीदना शुभ माना जाता है अतैव प्रत्येक परिवार अपनी-अपनी आवश्यकता अनुसार कुछ न कुछ खरीदारी करता है।
इस दिन तुलसी या घर के द्वार पर एक दीपक जलाया जाता है। इससे अगले दिन नरक चतुर्दशी या छोटी दीपावली होती है। इस दिन यम पूजा हेतु दीपक जलाए जाते हैं। अगले दिन दीपावली आती है। इस दिन घरों में सुबह से ही तरह-तरह के पकवान बनाए जाते हैं। बाज़ारों में खील-बताशे, मिठाइयाँ, खांड़ के खिलौने, लक्ष्मी-गणेश आदि की मूर्तियाँ बिकने लगती हैं। स्थान-स्थान पर आतिशबाजी और पटाखों की दूकानें सजी होती हैं।
सुबह से ही लोग रिश्तेदारों, मित्रों, सगे-संबंधियों के घर मिठाइयाँ व उपहार बाँटने लगते हैं। दीपावली की शाम लक्ष्मी और गणेश जी की पूजा की जाती है। पूजा के बाद लोग अपने-अपने घरों के बाहर दीपक व मोमबत्तियाँ जलाकर रखते हैं। चारों ओर चमकते दीपक अत्यंत सुंदर दिखाई देते हैं। रंग-बिरंगे बिजली के बल्बों से बाज़ार व गलियाँ जगमगा उठते हैं। बच्चे तरह-तरह के पटाखों व आतिशबाज़ियों का आनंद लेते हैं। रंग-बिरंगी फुलझड़ियाँ, आतिशबाज़ियाँ व अनारों के जलने का आनंद प्रत्येक आयु के लोग लेते हैं। देर रात तक कार्तिक की अँधेरी रात पूर्णिमा से भी से भी अधिक प्रकाशयुक्त दिखाई पड़ती है।
दीपावली से अगले दिन गोवर्धन पर्वत अपनी अँगुली पर उठाकर इंद्र के कोप से डूबते ब्रजवासियों को बनाया था। इसी दिन लोग अपने गाय-बैलों को सजाते हैं तथा गोबर का पर्वत बनाकर पूजा करते हैं। अगले दिन भाई दूज का पर्व होता है।भाई दूज या भैया द्वीज को यम द्वितीय भी कहते हैं। इस दिन भाई और बहिन गांठ जोड़ कर यमुना नदी में स्नान करने की परंपरा है। इस दिन बहिन अपने भाई के मस्तक पर तिलक लगा कर उसके मंगल की कामना करती है और भाई भी प्रत्युत्तर में उसे भेंट देता है।
जेडदीपावली के दूसरे दिन व्यापारी अपने पुराने बहीखाते बदल देते हैं। वे दूकानों पर लक्ष्मी पूजन करते हैं। उनका मानना है कि ऐसा करने से धन की देवी लक्ष्मी की उन पर विशेष अनुकंपा रहेगी। कृषक वर्ग के लिये इस पर्व का विशेष महत्त्व है। खरीफ़ की फसल पक कर तैयार हो जाने से कृषकों के खलिहान समृद्ध हो जाते हैं। कृषक समाज अपनी समृद्धि का यह पर्व उल्लासपूर्वक मनाता हैं।
अंधकार पर प्रकाश की विजय का यह पर्व समाज में उल्लास, भाई-चारे व प्रेम का संदेश फैलाता है। यह पर्व सामूहिक व व्यक्तिगत दोनों तरह से मनाए जाने वाला ऐसा विशिष्ट पर्व है जो धार्मिक, सांस्कृतिक व सामाजिक विशिष्टता रखता है। हर प्रांत या क्षेत्र में दीवाली मनाने के कारण एवं तरीके अलग हैं पर सभी जगह कई पीढ़ियों से यह त्योहार चला आ रहा है। लोगों में दीवाली की बहुत उमंग होती है।
लोग अपने घरों का कोना-कोना साफ़ करते हैं, नये कपड़े पहनते हैं। मिठाइयों के उपहार एक दूसरे को बाँटते हैं, एक दूसरे से मिलते हैं। घर-घर में सुन्दर रंगोली बनायी जाती है, दिये जलाए जाते हैं और आतिशबाजी की जाती है। बड़े छोटे सभी इस त्योहार में भाग लेते हैं। अंधकार पर प्रकाश की विजय का यह पर्व समाज में उल्लास, भाई-चारे व प्रेम का संदेश फैलाता है। हर प्रांत या क्षेत्र में दीवाली मनाने के कारण एवं तरीके अलग हैं पर सभी जगह कई पीढ़ियों से यह त्योहार चला आ रहा है। लोगों में दीवाली की बहुत उमंग होती है।
दीपावली पूजा
सबसे पहले चौकी पर लाल कपड़ा बिछाये लाल कपडे के बीच में गणेश जी और लक्ष्मी माता की मूर्तियां रखे। लक्ष्मी जी को ध्यान से गणेश जी के दाहिने तरफ ही बिढाये और दोनों मूर्तियों का चेहरा पूरब या पश्चिम दिशा की तरफ रखे। अब दोनों मूर्तियों के आगे थोड़े रुपए इच्छा अनुसार सोने चांदी के आभुश्ण और चांदी के 5 सिक्के भी रख दे। यह चांदी के सिक्के ही कुबेर जी का रूप है। लक्ष्मी जी की मूर्ति के दाहिनी ओर अछत से अष्टदल बनाएं यानी कि आठ दिशाएं उंगली से बनाए बीच से बाहर की ओर फिर जल से भरे कलश को उस पर रख दे। कलश के अंदर थोड़ा चंदन दुर्व पंचरत्न सुपारी आम के या केले के पत्ते डालकर मौली से बंधा हुआ नारियल उसमें रखें। पानी के बर्तन यानि जल पात्र में साफ पानी भरकर उसमें मौली बांधे और थोड़ा सा गंगाजल उसमें मिलाएं।
इसके बाद चौकी के सामने बाकी पूजा सामग्री कि थालीया रखे। दो बडे दिये मे देसी घी डालकर और ग्यारह छोटे दिये मे सरसो का तेल भर तैयार करके रखे। घर के सभी लोगों के बैठ्ने के लिए चौकी के बगल आसन बना ले। ध्यान रखें ये सभी काम शुभ मुहुरत शुरू होने से पहले ही करने होगे। शुभ मुहुरत शुरू होने से पहले घर के सभी लोग नहा कर नए कपड़े पहन कर तैयार हो जाएं और आसन ग्रह्ण करें।
मेष राशि के जातकों को दिवाली पर चांदी के बर्तन खरीदने चाहिए। यह उनके लिए बहुत ही लाभकारी होगा। आज के दिन मेष राशि के जातक अगर कोई प्रॉपर्टी खरीदना चाहते हैं तो इनके लिए बहुत शुभ रहेगा।
वृष राशि
वृष राशि के जातकों को दिवाली पर सोने, चांदी या हीरे के वस्तु या आभूषण खरीदना बहुत ही शुभ है। इनमें यदि आप हीरे के आभूषण लेते हैं तो विशेष लाभ प्राप्त होगा। वृष राशि का स्वामी ग्रह शुक्र है जो सुख, संपन्नता और वैभव का प्रतिनिधित्व करते हैं।
मिथुन राशि
मिथुन राशि के जातकों को सोने के आभूषण खरीदने चाहिए। वे हरे रंग का कोई घर का सामान भी ले सकते हैं। यदि आप चांदी के गणपति खरीदकर लाते हैं तो उनके लिए धन संपदा के मार्ग खुल जाते हैं। ऐसा करने से घर में सुख- संपत्ति आती है।
कर्क राशि
कर्क राशि के जातक चांदी का श्रीयंत्र दिवाली के दिन ले सकते हैं। इस साल उन पर देवी महालक्ष्मी की कृपा बनी रहेगी। यदि वे चांदी के कलश या चांदी की शिव पार्वती की मूर्ति लेते हैं तो उनके लिए अत्यंत मंगलकारी रहेगा।
सिंह राशि
सिंह राशि के जातकों के लिए सोना खरीदना अति उत्तम माना जाता है। दिवाली पर सोने की वस्तु जैसे सोने के सिक्के, सोने के गहने और सोने के बर्तन खरीदना अत्यंत शुभ रहेगा। यदि जातक सोने के सामान नहीं खरीद सकते हैं तो वे तांबे के बर्तन इस दिन अवश्य खरीदें। इससे आपको अत्यंत लाभ होगा।
कन्या राशि
कन्या राशि के जातक कांसे या हाथी-दांत से बनी चीजों की खरीद करें। इन वस्तुओं की खरीदारी करने से धन में वृद्धि होगी। आप दुर्गा मां के लिए चांदी के छत्र अपने घर ला सकते हैं। इससे घर में धन की कमी नहीं होगी और घर में खुशहाली आएगी।
तुला राशि
इस दिवाली को शुभ और फलदायी बनाने के लिए तुला राशि के जातक सौंदर्य से संबंधित वस्तुएं खरीदें। आप इत्र, सोने-चांदी के आभूषण खरीद सकते हैं। आप अपने या परिवार के किसी सदस्य के लिए गुलाबी रंग के वस्त्र खरीद सकते हैं। आप मां लक्ष्मी के लिए श्रृंगार का सामान भी खरीद सकते हैं। इससे आपको सुख- समृद्धि की प्राप्ति होगी और माता लक्ष्मी की कृपा आप पर बनी रहेगी।
वृश्चिक राशि
वृश्चिक राशि वालों को दिवाली पर सोने के गहने और सिक्के या फिर तांबे के बर्तन खरीदने चाहिए। इसके अलावा आप हनुमानजी के लिए चांदी का गदा या चांदी का वर्क भी ला सकते हैं। इससे आपको बहुत लाभ होगा।
धनु राशि
धनु राशि के जातक दिवाली के दिन वाहन खरीद सकते हैं। चांदी धनु राशि वालों के लिए अत्यंत शुभ मानी गई है। इस दिन आप चांदी के आभूषण, बर्तन, चांदी के सिक्के भी खरीद सकते हैं इससे घर में संपन्नता आएगी।
मकर राशि
मकर राशि के जातकों के लिए दिवाली के दिन वाहन और सजावट की चीजें खरीदना शुभ रहेगा। आप चांदी और स्टील के बर्तन भी खरीद सकते हैं।
कुंभ राशि
कुंभ राशि का स्वामी शनि है। ऐसे में आपके लिए चांदी और स्टील के बर्तन की खरीद करना शुभ और अत्यधिक फलदायी होगा। आज आप मां कालिका के लिए चांदी के मांग टीका भी खरीद सकते हैं। इससे अत्यंत लाभ प्राप्त होगा।
मीन राशि
मीन राशि का स्वामी ग्रह गुरु है। मीन राशि के जातक इस दिवाली चांदी के बर्तन या आभूषण खरीदें। चांदी मीन राशि वालों के लिए अत्यंत शुभ मानी गई है। आज के दिन आप अपने या परिवार के किसी सदस्य की लिए पीले वस्त्र सकते हैं। विष्णु भगवान को आप पीले प्रसाद चढ़ाएं इससे भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होगा।
घोरावल (सोनभद्र): साहित्य,कला, संस्कृति की उर्वरा भूमि सोनभद्र जनपद के घोरावल तहसील निवासी मनोजधर द्विवेदी को फरीदाबाद कचहरी में आयोजित सम्मान समारोह में न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा अंगवस्त्रम, स्मृति चिन्ह, प्रशंसा पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया।
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ज्ञातव्य हो कि श्री द्विवेदी वर्तमान समय में फरीदाबाद में एक समाचार पत्र के ब्यूरो चीफ के पद पर कार्यरत हैं। मनोज धर द्विवेदी को पत्रकारिता के क्षेत्र में सम्मानित किए जाने पर सोनभद्र के पत्रकार समुदाय ने खुशी जाहिर करते हुए उन्हें बधाई दी है। बधाई देने वालों में वरिष्ठ पत्रकार मिथिलेश प्रसाद द्विवेदी, राकेश शरण मिश्र, विवेक कुमार पांडेय, विजय अग्रहरी, अनुराग पांडेय, संतोष कुमार नागर,राम अनुज धर द्विवेदी, प्रमोद गुप्ता आदि प्रमुख रहे।
• गुप्त स्थानों पर करते हैं तांत्रिक सिद्धि की प्राप्ति।
• दीपावली पर आयोजित होता है करमा नृत्य।
• त्रेता युग में भगवान श्री राम लंका पर चढ़ाई के लिए गए थे इसी मार्ग से।
• आदिवासी समाज में प्रचलित है राम कथा।
हर्षवर्धन केसरवानी
रॉबर्ट्सगंज (सोनभद्र): विंध्य पर्वत के दक्षिण में अवस्थित सोनभद्र जनपद में आदिवासी तांत्रिकों की निशा पूजन की तैयारी शुरू हो गई है और यह तांत्रिक दीपावली की रात्रि में अपनी तंत्र सिद्धि प्राप्त करेंगे। आदिवासी संस्कृति के अध्येता ऐसे दीपक कुमार केसरवानी की कृति आदिवासी के अनुसार-“प्राचीन काल से ही वर्तमान जनपद सोनभद्र का भूभाग समय रहस्यमयी गुफाओं,कंदराओ ओबरा, ओबरी, खंदको, जंगलों से भरपूर रहा है। तांत्रिक प्राचीन काल से यहां पर तंत्र सिद्धि प्राप्त करते रहे हैं और आज भी यह प्रथा गुप्त रूप से कायम है, जिसकी चर्चा कभी-कभी आदिवासीजन करते हैं।
दीपावली का पर्व आदिवासी समाज में विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहा है क्रेता युग में भगवान श्री राम, भगवती सीता, अनुज लक्ष्मण के साथ वनवास काल में विंध्य पर्वत को पार करते हुए वर्तमान सोनभद्र के जंगलों में रहने वाले आदिवासी जनों के सहयोग से सीता हरण के पश्चात लंका पर चढ़ाई के लिए इसी स्थल मार्ग से रामेश्वरम पहुंचे थे,जिसका वर्णन महर्षि बाल्मीकि नेअपनी कृति रामायण में किया है।
भगवान श्री राम ने वनवास के 14 साल इन्हीं आदिवासियों, वनवासियों, गिरिवासियों के मध्य रहकर व्यतीत किया था।इन्हीं के सहयोग से पृथ्वी पर उत्पात मचाने वाले राक्षसों और लंकापति रावण के क्षेत्रीय राजाओं का वध कर ऋषियो,मुनियों एवं समाज के अन्य वर्गों को भयमुक्त किया था। इन्हीं जातियों के सहयोग से भगवान श्रीराम ने लंकापति रावण पर विजय प्राप्त कर भगवती सीता को वापस ले आए थे।
वनवास से अयोध्या लौटते समय वनवासियों,आदिवासियों, गिरी वासियों ने इनका स्वागत- सत्कार किया था। अयोध्या पहुंचने के पश्चात संपूर्ण अयोध्या के नागरिकों ने दीप जलाकर भगवान श्री राम के आगमन की खुशी में दीपोत्सव का आयोजन किया था। आदिवासी समाज में भगवान श्रीराम, माता जानकी, अनुज लक्ष्मण सेवक हनुमान विशेष महत्व रहा है इनके वाचिक साहित्य यथा लोककथाओ, लोकगीतों, लोककलाओं में रामायण कथाओं को कहने- सुनने- गुंनने,लोकगीत गाने, लोक चित्र बनाने का प्रचलन रहा है। जो आज भी दृष्टिगोचर होता है।
आज भी आदिवासी समाज के लोग तीर- धनुष जैसे प्राचीन हथियारों का प्रयोग अपने आत्म रक्षार्थ हेतु करते हैं इन्हीं हथियारों के बल पर भगवान श्री राम ने लंका पर विजय प्राप्त किया था। आदिवासी समाज के लोगों का जीवन प्रकृति पर आधारित रहा है और यह प्राकृतिक शक्तियों की पूजा आदिकाल से करते चले आ रहे हैं। आदिवासी समाज के बैगा जाति के लोग जिन्हें आदिवासी समाज में पुरोहित का स्थान प्राप्त है ये अपनी तांत्रिक क्रियाओं के माध्यम से विभिन्न प्रकार की विपत्तियों, परेशानियों, रोग, बीमारी आदि व्यक्तिगत समस्याओं को दूर करते हैं।
तांत्रिकों के लिए अमावस्या के दिन पडने वाले दीपावली का पर्व सिद्धि प्राप्ति का दिन होता है जिसका इंतजार यह तांत्रिक साल भर तक करते हैं। दीपावली पर्व साधारणतया आदिवासी समाज में हर्ष उल्लास का पर्व माना गया है, इस पर्व को हंसी खुशी मनाने के लिए आदिवासी समाज में कर्म देव को प्रसन्न करने के लिए करमा नृत्य की परंपरा कायम है, तैयारी आदिवासी धनतेरस पर उसे शुरू कर देते हैं।
कर्म देव की स्थापना, पूजन, अनुष्ठान के साथ कर्मा का पर्व शुरू होता है और रात्रि में आदिवासी स्त्री- पुरुष मंडलकार होकर करम देव की पूजा- अर्चना करते हुए करमा नृत्य करते हैं। यह कार्यक्रम 3 दिन तक चलता है, अंतिम दिन कर्मदेवता को नदी में प्रवाहित कर आदिवासी जन अगले वर्ष आगमन की प्रार्थना करते हैं। आदिवासी समाज के लिए सुख समृद्धि, उपासना का पर्व है जिसका उन्हें वर्ष भर इंतजार रहता है।
घोरावल (सोनभद्र): श्री सिद्धेश्वर महादेव सेवा संस्थान महुआंव पाण्डेय ने हनुमान जयंती के अवसर पर विगत वर्षों की भांति इस वर्ष भी कार्यक्रम का आयोजन किया गया। सोनभद्र घोरावल तहसील अंतर्गत महुआंव पाण्डेय में विगत वर्षों की भांति इस वर्ष भी श्री सिद्धेश्वर महादेव व श्री संकट मोचन मंदिर में बहुत ही धूमधाम से हनुमान जयंती के अवसर पर भक्ति में कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
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इस अवसर पर हनुमान जी का पूजन यजमान प्रेरितधर द्विवेदी व प्रज्ज्वल धर द्विवेदी ने किया। वहीं पूजन मुख्य पुजारी नारायण धर द्विवेदी के देखरेख में आचार्य गण पवनधर द्विवेदी, श्यामधर द्विवेदी,ओमकारधर द्विवेदी ने सविधि मंत्रोच्चार के साथ पूजन कराकर हनुमान चालीसा, सुन्दर काण्ड का पाठ कर आरती की गई।
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इस अवसर पर कृष्णधर द्विवेदी रामजी धर द्विवेदी, अमरेश पाण्डेय, जगदीश शर्मा, बागेश्वरी धर द्विवेदी, कामेश्वरधर द्विवेदी, बेदान्ती राम पाठक, रविन्द्रधर प्रेम नाथ तिवारी, लोकपति त्रिपाठी, रामजी तिवारी, रविन्द्र धर द्विवेदी, प्रकाशधर द्विवेदी, सहित सिद्धेश्वर महादेव सेवा संस्थान के संस्थापक राम अनुज धर द्विवेदी उपस्थित रहे।
संस्कृति लाइव संवाददाता,रॉबर्ट्सगंज (सोनभद्र): पंचदेव सी दीपावली पर्व के दूसरे दिन छोटी दीपावली यानी नरक चतुर्दशी को मनाने की तैयारी शुरू हो गई है। दिवाली पूजा का शुभ मुहुर्त, पूजा विधि और महत्व – आज के दिन पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 09:02 बजे से अगले दिन सुबह 06:03 बजे तक है। स्नान या अभयंगा स्नान का समय सुबह 5 बजकर 40 मिनट से 6 बजकर तीन मिनट तक रहेगा। मान्यता है कि इस पवित्र स्नान से मनुष्य की आत्मा की शुद्धि होती है और मौत के बाद नरक की यातनाओं से छुटकारा मिलता है।
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नरक चतुर्दशी के दिन लोग भगवान कृष्ण, काली माता, यम और हनुमान जी की पूजा करते हैं। लोक मान्यता है कि इससे आत्मा की शुद्धि होती है और पूर्व में किए गए पापों का नाश होता है। इसके साथ ही नरक में जाने से भी मुक्ति मिलती है। कुछ स्थानों पर छोटी दिवाली के अवसर पर नरकासुर का पुतला दहन किया जात है।
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इतिहासकार कुमार केसरवानी के अनुसार-” नरकासुर ने वैदिक देवी अतिथि के सम्राज को हड़प लिया था। उसने बहुत सी महिलाओं को प्रताड़ित भी किया था। नरकासुर के खिलाफ भगवान कृष्ण और सत्यभागा ने संघर्ष किया और युद्ध में मार गिराया। अन्य इलाकों में यह मान्यता है कि नरकासुर का वध काली देवी ने किया था। यही कारण है कि छोटी दिवाली दिन काली मां की पूजा भी जाती है।
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छोटी दीपावली का यह दिन विभिन्न राशियों के जातकों के लिए अत्यंत ही महत्वपूर्ण है-
मेष राशि – मन में आशा-निराशा के भाव हो सकते हैं। मानसिक शान्ति के लिए प्रयास करें। नौकरी में अफसरों से व्यर्थ के वाद-विवाद से बचें। आत्मविश्वास भरपूर रहेगा, परन्तु बातचीत में संयत रहें। वाहन सुख में वृद्धि हो सकती है। घर-परिवार में धार्मिक कार्यक्रम हो सकते हैं।
वृष राशि – आत्मविश्वास में कमी रहेगी। धर्म के प्रति श्रद्धाभाव बढ़ सकता है। सन्तान के स्वास्थ्य का ध्यान रखें। चिकित्सीय खर्च बढ़ सकते हैं। किसी मित्र का आगमन हो सकता है। वस्त्र उपहार में प्राप्त हो सकते हैं। भाई-बहनों का सहयोग मिलेगा। स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहें।
बुध ने किया तुला में प्रवेश, देखें किस राशि की चमकने वाली है किस्मत, किसे रहना होगा सर्तक
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मिथुन राशि – मन परेशान भी हो सकता है। आत्मसंयत रहें। नौकरी में परिवर्तन के अवसर मिल सकते हैं। क्रोध के अतिरेक से बचें। नौकरी में तरक्की के मार्ग प्रशस्त होंगे। किसी दूसरे स्थान पर भी जाना हो सकता है। व्यापार में तरक्की के योग बन रहे हैं। आत्मविश्वास भरपूर रहेगा।
कर्क राशि- कार्यों के प्रति जोश एवं उत्साह रहेगा। माता के स्वास्थ्य का ध्यान रखें। रहन-सहन अव्यवस्थित रहेगा। वाहन सुख में कमी आ सकती है। संतान की ओर से सुखद समाचार मिल सकता है। बातचीत में संतुलित रहें। मित्रों का सहयोग मिलेगा। स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहें।
सिंह राशि- मन में निराशा एवं असन्तोष रहेगा। कारोबार में वृद्धि होगी। परिश्रम अधिक रहेगा। लाभ के अवसर भी मिलेंगे। मित्रों का सहयोग मिलेगा। पठन-पाठन में रुचि तो रहेगी, परन्तु शैक्षिक कार्यों में व्यवधान भी आ सकते हैं। सन्तान को स्वास्थ्य विकार हो सकते हैं।
कन्या राशि- मन में प्रसन्नता के भाव रहेंगे। बातचीत में सन्तुलित रहें। बौद्धिक कार्यों से धनार्जन के साधन बन सकते हैं। दिनचर्या अव्यवस्थित हो सकती है। माता को स्वास्थ्य विकार रहेंगे। कार्यक्षेत्र में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। भाइयों से विवाद हो सकता है।
तुला राशि- मन परेशान हो सकता है। आत्मसंयत रहें। परिवार के साथ किसी धार्मिक स्थान की यात्रा पर जा सकते हैं। मित्रों का सहयोग मिलेगा। कला एवं संगीत के प्रति रुझान बढ़ेगा। वाणी में सौम्यता रहेगी,परन्तु स्वभाव में चिड़चिड़ापन भी रहेगा। खर्चों की अधिकता रहेगी।
मेष से लेकर मीन राशि तक, आज कर लें ये उपाय, सालभर नहीं रहेगा धन का अभाव
वृश्चिक राशि- स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहें। परिवार की समस्याओं पर ध्यान दें। आय में कमी एवं खर्च अधिक की स्थिति रहेगी। भाइयों से वैचारिक मतभेद रहेंगे। नौकरी में परिवर्तन के योग बन रहे हैं। किसी दूसरे स्थान पर जा सकते हैं। संतान के स्वास्थ्य को लेकर चिंतित रहेंगे।
धनु राशि – आत्मविश्वास में कमी रहेगी। मन परेशान रहेगा। मानसिक शान्ति के लिए प्रयास करें। किसी मित्र के सहयोग से आय में वृद्धि हो सकती है। परिवार की समस्याओं के निस्तारण में पिता का साथ मिल सकता है। खर्चों की अधिकता से मन परेशान हो सकता है। विवाद हो सकते हैं।
मकर राशि – मन प्रसन्न रहेगा। आत्मविश्वास भरपूर रहेगा। पारिवारिक जीवन सुखमय रहेगा। भवन सुख में वृद्धि हो सकती है। आशा-निराशा के मिश्रित भाव मन में रहेंगे। कार्यक्षेत्र में प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। उच्चााधिकारियों से विवाद की स्थिति बन सकती है।
कुंभ राशि- कला या संगीत में रुचि बढ़ सकती है। घर-परिवार में धार्मिक-मांगलिक कार्य हो सकते हैं। वस्त्र उपहार में मिल सकते हैं। पारिवारिक जीवन सुखमय रहेगा। किसी मित्र के सहयोग से रोजगार के अवसर मिल सकते हैं। मान-सम्मान की प्राप्ति होगी। आय में वृद्धि होगी।
मीन राशि- मानसिक शान्ति रहेगी। बातचीत में सन्तुलन बनाकर रखें। परिवार की समस्याओं पर ध्यान दें। स्वास्थ्य को लेकर परेशानी हो सकती हैं। आत्मविश्वास में कमी रहेगी। परिवार में धार्मिक कार्यक्रम हो सकते हैं। मित्रों का सहयोग मिलेगा। किसी प्रॉपर्टी से आय के स्रोत बनेंगे। आज के दिन शुभ मुहूर्त में दीपदान यमराज के लिए किया जाता है। मान्यता है कि कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी के दिन प्रातःकाल तेल लगाकर अपामार्ग (चिचड़ी) की पत्तियाँ जल में डालकर स्नान करने से नरक से मुक्ति मिलती है। विधि-विधान से पूजा करने वाले व्यक्ति सभी पापों से मुक्त हो स्वर्ग को प्राप्त करते हैं
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लोकमान्यताएं हैं-“एक कथा के अनुसार आज के दिन ही भगवान श्री कृष्ण ने अत्याचारी और दुराचारी नरकासुर का वध किया था और सोलह हजार एक सौ कन्याओं को नरकासुर के बंदी गृह से मुक्त कर उन्हें सम्मान प्रदान किया था। कथा के अनुसार-‘रन्ति देव नामक एक पुण्यात्मा और धर्मात्मा राजा थे। उन्होंने अनजाने में भी कोई पाप नहीं किया था लेकिन जब मृत्यु का समय आया तो उनके सामने यमदूत आ खड़े हुए। यमदूत को सामने देख राजा अचंभित हुए और बोले मैंने तो कभी कोई पाप कर्म नहीं किया फिर आप लोग मुझे लेने क्यों आए हो क्योंकि आपके यहां आने का मतलब है कि मुझे नर्क जाना होगा। आप मुझ पर कृपा करें और बताएं कि मेरे किस अपराध के कारण मुझे नरक जाना पड़ रहा है। पुण्यात्मा राजा की अनुनय भरी वाणी सुनकर यमदूत ने कहा हे राजन् एक बार आपके द्वार से एक भूखा ब्राह्मण लौट गया यह उसी पापकर्म का फल है। दूतों की इस प्रकार कहने पर राजा ने यमदूतों से कहा कि मैं आपसे विनती करता हूं कि मुझे वर्ष का और समय दे दे। यमदूतों ने राजा को एक वर्ष की मोहलत दे दी। राजा अपनी परेशानी लेकर ऋषियों के पास पहुंचा और उन्हें सब वृतान्त कहकर उनसे पूछा कि कृपया इस पाप से मुक्ति का क्या उपाय है। ऋषि बोले हे राजन् आप कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी का व्रत करें और ब्रह्मणों को भोजन करवा कर उनसे अनके प्रति हुए अपने अपराधों के लिए क्षमा याचना करें।
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राजा ने वैसा ही किया जैसा ऋषियों ने उन्हें बताया। इस प्रकार राजा पाप मुक्त हुए और उन्हें विष्णु लोक में स्थान प्राप्त हुआ। उस दिन से पाप और नर्क से मुक्ति हेतु भूलोक में कार्तिक चतुर्दशी के दिन का व्रत प्रचलित है। इस त्योहार को मनाने का मुख्य उद्देश्य घर में उजाला और घर के हर कोने को प्रकाशित करना है। पदमा देवी के अनुसार-” दीपावली के दिन भगवान श्री राम चन्द्र जी चौदह वर्ष का वनवास पूरा कर अयोध्या आये थे तब अयोध्या वासियों ने अपनी खुशी के दिए जलाकर उत्सव मनाया व भगवान श्री रामचन्द्र माता जानकी व लक्ष्मण का स्वागत किया था। छोटी दीपावली के अवसर पर नरकासुर का वध करने वाली मां काली एवं भगवान श्री राम के सेवक हनुमान जी के मंदिरों पर भक्तजनों ने पूजा- अर्चना किया। इन मंदिरों पर भक्तजनों की काफी भीड़ जुटी हुई थी।
प्रकाश उत्सव के इस पर्व पर जनपद मुख्यालय रॉबर्ट्सगंज सहित जनपद के अन्य कस्बों, एवं ग्रामीण इलाकों में दीपावली पर्व को लेकर लोगों में उत्साह है और लोग इस पर्व को मनाने के लिए मिष्ठान, घर को प्रकाशित करने के लिए मिट्टी के दीए, बिजली के झालर, पूजा-पाठ की सामग्री, एवं खाद्य पदार्थ लाई,चूड़ा, रेवड़ी एवं इस पर्व पर खाई जाने वाली सब्जी के लिए सूरन आदि की खरीदारी कर रहे हैं।
सामानों की बिक्री के लिए जनपद मुख्यालय रॉबर्ट्सगंज के रामलीला मैदान एवं नगर के अन्य क्षेत्रों में दुकाने सजी हुई हैं और यहां पर खरीदारों की काफी भीड़ देखी जा रही है, जिला प्रशासन द्वारा शांति व्यवस्था एवं पर्व को सकुशल मनाए जाने के लिए पूर्ण तैयारी की गई है उप जिला अधिकारी रॉबर्ट्सगंज एवं पुलिस जवान चक्रमण में कर रहे हैं। खरीदारों की भीड़ की वजह से लोगों को जाम का भी सामना करना पड़ रहा है। जाम के झाम में भी फंसे लोग दिवाली की तैयारी बड़ी हंसी खुशी कर रहे हैं।