गुरमुरा में छठव्रतियों ने उगते भगवान भास्कर को अर्घ्यं देकर व्रत का किया समापन

डाला,सोनभद्र। गुरमुरा में चार दिवसीय छठ महापर्व के अनुष्ठानों की छठव्रतियों ने उगते भगवान भास्कर को अर्घ्यं देकर छठ वर्तियों ने पूजा का समापन किया। छठ घाटस्थल पर पूरी व्यवस्था हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी छठ पूजा सेवा समिति के द्वारा किया गया था। छठ व्रतियों को कोई परेशानी न हो। समिति के कार्यकर्ताओं में गजब का उत्साह देखने को मिला। छठ पूजा सेवा समिति के तरफ से बुधवार की शाम को फल वितरण किया गया और बृहस्पतिवार को सुबह अर्घ्य के लिए कच्चा दूध और छठव्रतियों के लिए चाय की व्यवस्था की गई थी। छठव्रतियों एवं श्रद्धालुओं की भीड़ भारी संख्या में उमड़ी थी।

छठ पूजा व्रत रही व्रती महिलाओं ने भोर से ही पानी में खड़ा होकर भगवान भास्कर देव का उगने का इंतजार करती रही और वह समय आया कि भगवान भास्कर देव उदयमान हुए और इसके साथ ही व्रतियों ने भगवान सूर्यदेव को अर्घ्यं देकर परिवार में सुख-शांति व समृद्धि की कामना किया।

छठ पूजा सेवा समिति के अध्यक्ष मनोज जायसवाल ने कहा कि छठ मैया का मान्यता है कि छठ पर्व में सूर्योपासना करने से छठ माता प्रसन्न होती हैं और परिवार को सुख, शांति व धन-धान्य से परिपूर्ण करती हैं।
समिति के उपाध्यक्ष परमहंस पटेल उर्फ मनोज पटेल ने कहा कि भगवान सूर्यदेव के प्रिय तिथि पर पूजा, अनुष्ठान करने से अभीष्ट फल मिलता है। इनकी उपासना कर असाध्य रोग से मुक्ति, कष्ट व शत्रु का नाश, सौभाग्य तथा संतान प्राप्ति की कामना की जाती है।

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समिति के रामचन्द्र जायसवाल ने कहा कि यह महापर्व छठ पूजा चार दिवसीय महाव्रत हैं। इस महापर्व छठ पूजा की महिमा अपरम्पार हैं। छठ पूजा पर्व में कोई भेद भाव नही है। चाहे वह किसी जाति का हो, चाहे गरीब हो या अमीर सभी एक जगह बैठ कर पूजा करते हैं।

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गुरुवार को छठ पर्व के चौथे एवं अंतिम दिन अहले सुबह व्रती नदी, तालाब या कृत्रिम घाट से उदीयमान भगवान सूर्यदेव को दूध तथा जल से अर्घ्य देकर इस महाव्रत का समापन किया गया। इसके साथ ही 36 घंटे से चला आ रहा निर्जला उपवास भी पूर्ण हुआ। व्रती अन्य श्रद्धालुओं और अपने पारिवारिक सदस्यों को आशीर्वाद देकर पारण किया गया।
मौके पर मनोज जायसवाल, परमहंस पटेल (मनोज पटेल), रामचन्द्र जायसवाल, राजाराम गोड़, विनोद, सोनू जायसवाल, उज्ज्वल पटेल, नन्दलाल गोड़ (वार्ड सदस्य) राजकुमार पनिका एवं इत्यादि कार्यकर्ता मौजूद रहे।

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दुद्धी में उगते सूर्य को अर्ध्य देकर सूर्योपासना के महान पर्व पर हुई लोक मंगल की कामना

• जेबीएस, नगर पंचायत एवं सामाजिक संगठनों ने निभाई जिम्मेदारी।


संस्कृति लाइव संवाददाता, दुद्धी (सोनभद्र): छठ पूजा की चार दिवसीय कठिन अनुष्ठान का त्यौहार गुरुवार की प्रातः उगते सूर्य को अर्ध्य देकर,लोक मंगल की कामना के साथ सम्पन्न हुआ। बुधवार की शाम से ही क्षेत्र की सभी सरोवर-तालाब एवं नदियों के घाट पर ब्रतधारी श्रद्धालुओं का जमावड़ा लगने लगा था।

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परिवार की सुख-समृद्धि एवं मनोवांछित फल प्रदान करने वाले इस महापर्व पर श्रद्धालुओं ने बुधवार की शाम डूबते हुए भगवान भाष्कर को अर्ध्य दिया और पूरी रात जागरण कर छठ मैया की सुरीली गीतों से घाटों को गुलजार रखा। कुछ श्रद्धालु महिलाएं अपनी मनोकामना को पूर्ण करने के लिए कड़कड़ाती ठंड में सरोवर में खड़े होकर, चार से पांच घंटे तक भगवान भाष्कर की आराधना में लीन व ध्यानमग्न रहीं। गुरुवार की प्रातः सूर्योदय होते ही घाटों पर एक बार फिर श्रद्धालुओं द्वारा आराध्य देव को अर्ध्य देने का सिलसिला शुरू हुआ, जो घंटो चला।इस दौरान ब्रतधारियों द्वारा पुत्र, पति, ब्राम्हण आदि परिजनों से दूध का अर्ध्य लेकर,भगवान सूर्य की उपासना की गयी और इसी के साथ महापर्व का समापन हुआ। घाट से निकल रहे ब्रतधारियों द्वारा महाप्रसाद वितरण का दौर चलता रहा। उधर पूरी रात पंचदेव मंदिर दुर्गा पूजा समिति के तत्वावधान में अध्यक्ष मोनू सिंह एवं सचिव सुजीत कुमार की अगुवाई में देवी जागरण का भव्य आयोजन किया गया।जिसमें श्रोता पूरी रात भक्तिरस की गंगा में डुबकी लगाते रहे।

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शिवा जी घाट पर होने वाली ऐतिहासिक भीड़ का व्यवस्थापन जिम्मेदारी जेबीएस उठाती चली आ रही है, जिसका सहयोग नगर पंचायत, रामलीला कमेटी,दुर्गा पूजा समिति आदि सामाजिक एवं धार्मिक संगठनें कंधा से कंधा मिलाकर करती हैं।इसके अतिरिक्त मां काली सेवा समिति एवं जय हिंद क्लब द्वारा खीर एवं प्रसाद वितरण तथा विकास क्लब द्वारा घाट की साज सज्जा में फूल-मालाओं का विशेष सहयोग दिया गया। इसके अलावा क्षेत्र के बीड़र, कनहर, जाबर,रजखड़, खजुरी समेत दर्जनों स्थानों के घाटों पर धूमधाम से छठ मनाया गया।सुरक्षा की जिम्मेदारी कोतवाल राघवेंद्र सिंह ने संभाल रखी थी।

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एसडीएम रमेश कुमार एवं सीओ रामआशीष यादव घाटों पर चक्रमण कर व्यवस्था पर नजर रखे रहे। विधायक हरीराम चेरो ने घाट पर पहुंचकर दर्शन पूजन किया और 21000 रुपये की सहयोग राशि की घोषणा करते हुए आयोजन कमेटी को बधाई दी। कार्यक्रम में जेबीएस अध्यक्ष कन्हैया लाल अग्रहरि, सचिव सुरेंद्र कुमार गुप्ता,चेयरमैन राजकुमार अग्रहरि,ईओ भारत सिंह,कमल कानू, पंकज कुमार बुल्लू, अनिल कुमार, दीपक शाह,प्रदीप कुमार, पवन सिंह समेत सभी धार्मिक संस्थाओं के पदाधिकारियों ने अपना अमूल्य योगदान दिया। कंट्रोल रूम का संचालन रामपाल जौहरी व आलोक कुमार अग्रहरि ने संयुक्त रूप से किया।

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छठव्रतियों ने उगते हुए भगवान भास्कर को अर्घ्यं देकर व्रत को किया सम्पन्न

डाला,सोनभद्र। गुरमुरा में चार दिवसीय छठ महापर्व के अनुष्ठानों की छठव्रतियों ने उगते भगवान भास्कर को अर्घ्यं देकर छठ वर्तियों ने पूजा का समापन किया। छठ घाटस्थल पर पूरी व्यवस्था हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी छठ पूजा सेवा समिति के द्वारा किया गया था। छठ व्रतियों को कोई परेशानी न हो। समिति के कार्यकर्ताओं में गजब का उत्साह देखने को मिला। छठ पूजा सेवा समिति के तरफ से बुधवार की शाम को फल वितरण किया गया और बृहस्पतिवार को सुबह अर्घ्य के लिए कच्चा दूध और छठव्रतियों के लिए चाय की व्यवस्था की गई थी। छठव्रतियों एवं श्रद्धालुओं की भीड़ भारी संख्या में उमड़ी थी।

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छठ पूजा व्रत रही व्रती महिलाओं ने भोर से ही पानी में खड़ा होकर भगवान भास्कर देव का उगने का इंतजार करती रही और वह समय आया कि भगवान भास्कर देव उदयमान हुए और इसके साथ ही व्रतियों ने भगवान सूर्यदेव को अर्घ्यं देकर परिवार में सुख-शांति व समृद्धि की कामना किया।

छठ पूजा सेवा समिति के अध्यक्ष मनोज जायसवाल ने कहा कि छठ मैया का मान्यता है कि छठ पर्व में सूर्योपासना करने से छठ माता प्रसन्न होती हैं और परिवार को सुख, शांति व धन-धान्य से परिपूर्ण करती हैं।
समिति के उपाध्यक्ष परमहंस पटेल उर्फ मनोज पटेल ने कहा कि भगवान सूर्यदेव के प्रिय तिथि पर पूजा, अनुष्ठान करने से अभीष्ट फल मिलता है। इनकी उपासना कर असाध्य रोग से मुक्ति, कष्ट व शत्रु का नाश, सौभाग्य तथा संतान प्राप्ति की कामना की जाती है।

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समिति के रामचन्द्र जायसवाल ने कहा कि यह महापर्व छठ पूजा चार दिवसीय महाव्रत हैं। इस महापर्व छठ पूजा की महिमा अपरम्पार हैं। छठ पूजा पर्व में कोई भेद भाव नही है। चाहे वह किसी जाति का हो, चाहे गरीब हो या अमीर सभी एक जगह बैठ कर पूजा करते हैं।
गुरुवार को छठ पर्व के चौथे एवं अंतिम दिन अहले सुबह व्रती नदी, तालाब या कृत्रिम घाट से उदीयमान भगवान सूर्यदेव को दूध तथा जल से अर्घ्य देकर इस महाव्रत का समापन किया गया। इसके साथ ही 36 घंटे से चला आ रहा निर्जला उपवास भी पूर्ण हुआ। व्रती अन्य श्रद्धालुओं और अपने पारिवारिक सदस्यों को आशीर्वाद देकर पारण किया गया।

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मौके पर मनोज जायसवाल, परमहंस पटेल (मनोज पटेल), रामचन्द्र जायसवाल, राजाराम गोड़, विनोद, सोनू जायसवाल, उज्ज्वल पटेल, नन्दलाल गोड़ (वार्ड सदस्य) राजकुमार पनिका एवं इत्यादि कार्यकर्ता मौजूद रहे।

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एनटीपीसी सिंगरौली,शक्तिनगर में छठ पूजा का आयोजन

शक्तिनगर, सोनभद्र। आम जन हेतु एनटीपीसी सिंगरौली, शक्तिनगर में छठ पूजा का भव्य आयोजन किया गया। आम जन को सुविधा प्रदान करने की दृष्टि से चिल्काझील की विधिवत सफाई कराई गई। श्रद्धालुओं के दृष्टिगत अतिरिक्त रोशनी, सजावटी लाईट, पेय जल, प्रसाधन की सुचारु व्यवस्था की गई। सुरक्षा को चाक-चौबन्द करने के लिए प्रयाप्त मात्रा में सी.आई.एस.एफ सुरक्षा कर्मी, पुलिस कर्मी एवं निजी गार्ड की तैनाती की गई थी। इसके अलावा पूरे क्षेत्र को सी.सी.टी.वी कैमरे की निगरानी में रखा गया ताकि किसी प्रकार की अवांक्षनीय घटना को रोका सके।

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छठ वर्तियों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए कंट्रोल रूम के माध्यम से निरंतर आवश्यक सूचना प्रदान की गई एवं खोये हुए परिवार जनों को मिलाया गया। छठ घाट के चारों ओर किसी भी प्रकार के दुर्घटना से आम जन को बचाने के लिए सुरक्षा तैराक तैनात किए गए थे एवं नाव के माध्यम से भी झील में प्रवेश करने वाले लोगों को सुरक्षा प्रदान की गई। झील में प्रवेश करने वाले व्यक्तियों हेतु सुरक्षा की दृष्टि से रस्सी एवं हुक की भी व्यवस्था की गई थी।

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एनटीपीसी द्वारा की गई सुरक्षा व्यवस्था,आवगमन के रास्ते की साफ-सफाई, घाट की साफ-सफाई, सुरक्षा बैनर, कोरोना से बचाव संबंधी जागरूकता बैनर सहित विभिन्न आवश्यक व्यवस्था की वजह से आम जन लाभान्वित हुए तथा छठ पूजा विधिवत सम्पन्न हुई,साथ ही किसी भी प्रकार की अप्रिय घटना से बचा जा सके। इस वृहद आयोजन में सहयोग प्रदान करने के लिए सभी छठ पूजा के श्रद्धालुगण,पुलिस प्रशासन, सी.आई.एस.एफ, निजी गार्ड, यूनियन एवं एसोशिएशन के सदस्य गण एवं आयोजन समिति के सदस्यों के प्रति धन्यवाद व्यक्त किया गया।

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गैंग लीडर पिंटू बैगा समेत तीन को गैंगस्टर एक्ट के तहत दो-दो वर्ष की कैद की सजा


• 5-5 हजार रुपये अर्थदंड, न देने पर 10-10 दिन की अतिरिक्त कैद भुगतनी होगी

• जेल में बितायी अवधि सजा में समाहित की जाएगी

राजेश पाठक

सोनभद्र। अपर सत्र न्यायाधीश(एफटीसी)/ विशेष न्यायाधीश गैंगेस्टर एक्ट आसुतोष कुमार सिंह की अदालत ने वृहस्पतिवार को सुनवाई करते हुए गैंगेस्टर एक्ट के मामले में दोषसिद्ध पाकर दोषियों गैंग लीडर पिंटू बैगा, विशाल कुमार बैगा व फक्कड़ उर्फ बाबू उर्फ पंकज बैगा को दो-दो वर्ष की कैद एवं 5-5 हजार रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई।

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अर्थदंड न देने पर 10-10 दिन की अतिरिक्त कैद भुगतनी होगी। जेल में बितायी अवधि सजा में समाहित होगी।
अभियोजन पक्ष के मुताबिक बीजपुर थाने के इंस्पेक्टर 31 जुलाई 2018 को पुलिस बल के साथ देखभाल क्षेत्र में निकले थे कि पता चला बेलहवा टोला डोड़हर गांव निवासी गैंग लीडर पिंटू बैगा का एक सक्रिय गिरोह है जो इस क्षेत्र में कार्य करता है।

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अपने लाभ के लिए एवं सक्रिय सदस्यों के लाभ के लिए गैर कानूनी कार्य करता रहता है। इनका क्षेत्र में वर्चस्व कायम है। इनके विरुद्ध कोई भी शिकायत करने एवं गवाही देने की हिम्मत नहीं जुटा पाता है। डीएम से अनुमोदन कराने के बाद गैंग चार्ट दाखिल किया गया है। मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं के तर्कों को सुनने, गवाहों के बयान एवं पत्रावली का अवलोकन करने पर दोषसिद्ध पाकर गैंग लीडर पिंटू बैगा, विशाल कुमार बैगा व फक्कड़ उर्फ बाबू उर्फ पंकज बैगा को दो-दो वर्ष की कैद एवं 5-5 हजार रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई। अर्थदंड न देने पर 10-10 दिन की अतिरिक्त कैद भुगतनी होगी। अभियोजन पक्ष की ओर से सरकारी वकील धनंजय कुमार शुक्ला ने बहस की।

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गुरु सिंह सभा के सदस्य निकाल रहे प्रभात फेरी

रेणुकूट, सोनभद्र। नगर में सिंह सभा गुरुद्वारा साहिब के समस्त संगत द्वारा प्रभात फेरी निकाली जा रही है। कमेटी प्रबंधक जगजीत सिंह जी ने बताया कि प्रकाश पर्व हर साल कार्तिक मास की पूर्णिमा तिथि के दिन गुरु नानक जयंती मनाई जाती है, गुरु नानक देव जी ने ही सिख धर्म की स्थापना की थी इस दिन सिख समुदाय के लिए लोग सुबह प्रभात फेरी निकालते हैं गुरुद्वारे जाकर मत्था टेकते हैं, वाहेगुरु का जाप करते हैं और भजन-कीर्तन करते हैं। उन्होंने बताया 15 तारीख को नगर कीर्तन पर रेणुकूट गुरुद्वारे से ग्रासिम केमिकल तक निकाली जाएगी और 19 तारीख को गुरु पर्व मनाया जाएगा।

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यातायात जागरूकता कार्यक्रम का हुआ आयोजन

राम अनुज धर द्विवेदी

ओबरा, सोनभद्र। राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय ओबरा मे बृहस्पतिवार को यातायात माह नवंबर 2021 के अंतर्गत यातायात जागरूकता कार्यक्रम का शानदार आयोजन किया गया। कार्यक्रम के संयोजक डॉo संतोष कुमार सैनी ने कार्यक्रम में पधारे सभी अतिथियों का स्वागत किया एवं सभी को, दिन-प्रतिदिन बढ़ती हुई दुर्घटनाओं को देखते हुए यातायात के नियमों का पालन करने के लिए यातायात के नियमों की जानकारी प्रदान किया।

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साथ ही बताया कि यातायात जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन करना आज की बड़ी आवश्यकता है क्योंकि इसमें युवा शक्ति की महत्वपूर्ण भूमिका है। कार्यक्रम के रिसोर्स पर्सन राजेश सिंह उप निरीक्षक यातायात ने यातायात एवं सड़क सुरक्षा से संबंधित सभी नियमों की बिंदुवार जानकारी देते हुए सभी से यातायात के नियमों का पालन करने की अपील की।

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कार्यक्रम के मुख्य अतिथि अभय कुमार सिंह,थाना प्रभारी ओबरा ने उदाहरणों के माध्यम से यातायात नियमों,उनसे संबंधित छात्र-छात्राओं द्वारा पूछे गए प्रश्नों के उत्तर एवं मोटर व्हीकल एक्ट के विषय में बहुत ही रुचिकर अंदाज में सरल शब्दों में जानकारी दी तथा वाहन चलाने से पूर्व हमें क्या क्या सावधानियां बरतनी चाहिए एवं वाहन चलाते समय क्या नहीं करना चाहिए से संबंधित सावधानियों वाला पंपलेट भी छात्र-छात्राओं एवं सभागार में उपस्थित सभी लोगों को वितरित किया ।

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कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ प्रमोद कुमार जी ने बहुत ही सारगर्भित तरीके से यातायात एवं सड़क सुरक्षा से संबंधित सभी नियमों पर प्रकाश डाला तथा वाहन चलाते समय नशीले पदार्थों का सेवन न करने,हेलमेट लगाने,सीट बेल्ट का प्रयोग करने,वाहन चलाते समय मोबाइल से बात ना करने इत्यादि सावधानियां रखना , के बारे में विस्तार से बताया।

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डॉo अमूल्य कुमार सिंह ने द्वारा सभी अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त व्यक्त किया गया। कार्यक्रम के अंत में सभागार में उपस्थित सभी लोगों को यातायात के नियमों का पालन करने की शपथ दिलाई गई ।उक्त यातायात जागरूकता कार्यक्रम में डॉ सुनील कुमार,डॉ उपेंद्र कुमार ,डॉ विकास कुमार,डॉ राजेश प्रसाद,डॉ विनोद बहादुर सिंह,डॉ रंजीत सिंह, डॉ विभा पाण्डेय,डॉ महीप कुमार,डॉ बीना यादव,डॉ विजय यादव इत्यादि प्राध्यापक गणों के साथ-साथ प्रमोद कुमार केशरी,विकास मौर्य ,महेश पाण्डेय, राहुल,शरफुद्दीन इत्यादि कर्मचारी गण व भारी संख्या में छात्र-छात्राएं मौजूद रहे।

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आई पी एफ ने सौंपा ज्ञापन

राम अनुज धर द्विवेदी

सोनभद्र। आईपीएफ तहसील संयोजक श्रीकांत सिंह ने गुरुवार को एसडीएम, वन विभाग को ज्ञापन सौंपा।आईपीएफ़ नेता श्रीकांत सिंह ने कहा कि घोरावल इलाके में जमीन का सवाल बहुत पुराना है। यहां के मूल निवासी आदिवासी वनवासी गिरीवासी के जीवन जीने का एक मात्र साधन भूमि है। जिसे जोत कोड़ कर वह अपना जिविकोपार्जन करते हैं।

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इस इलाके के आदिवासी और अन्य परंपरागत जातियों का उत्पीड़न लंबे समय से जारी है। जिसको लेकर हमारा संगठन आदिवासियों का जीवन बचाने के लिए लगातार संघर्ष करता आ रहा है। वर्ष 2009 से लेकर आज तक वनाधिकार कानून का दावा प्रपत्र शासन प्रशासन के दिशा निर्देश पर चार बार ग्रामीणों ने दावा प्रपत्र तैयार कर ग्राम समिति के माध्यम से तहसील कार्यालय में जमा किया।

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लेकिन हर बार निराशा ही मिली। आदिवासियों वनवासियों का मौलिक अधिकार देने के लिए वनाधिकार कानून दिखावा बनकर रह गया है। उक्त बाते उपजिलाधिकारी घोरावल, रेंज कार्यालय घोरावल, ग्राम पंचायत अध्यक्ष शिवद्वार के नाम ग्राम पंचायत में दोबारा ग्राम समिति का गठन कराने के लिए सूचना पत्र दिया गया है। गुरुवार को एसडीएम की अनुपस्थिति में पत्र उनके स्टेनो को दिया गया। इस मौके पर संतलाल बैगा, प्रीतलाल बैगा, शिव शंकर गोड़, फुलवंत कोल, परमिला बैगा आदि लोग मौजूद रहे।

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उदितमान सूर्य को अर्घ्य देकर व्रती महिलाओं ने छठ पूजा किया सम्पन्न

हर्षवर्धन केसरवानी

सोनभद्र। बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ राज्य की सीमाओं से घिरा हुआ उत्तर प्रदेश के अंतिम छोर पर अवस्थित सोनभद्र जनपद के दुद्धी, घोरावल, रॉबर्ट्सगंज तहसील के नगरी, ग्रामीण, कस्बाई इलाकों में सूर्य उपासना का महापर्व छठ के चौथे दिन व्रतियों ने उदितमान होते सूर्य को अघ्र्य देकर लोक मंगल की कामना किया।
दूद्धी के शिवाजी तालाब, जनपद मुख्यालय रॉबर्ट्सगंज नगर के राम सरोवर तालाब, बढौली गांव के तालाब, नहर पर, घोरावल के पोखरा तालाब एवं नहर पर काफी संख्या में स्त्रियों ने जल में खड़ा होकर उदितमान होते भगवान सूर्य को अर्घ्य दिया।

इतिहासकार दीपक कुमार केसरवानी के अनुसार- “हमारी संस्कृति में उगते हुए सूर्य को अर्घ देने की परंपरा सदियों से कायम है कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की षष्ठी को ढलते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।
लोक मान्यता है कि-सुबह, दोपहर और शाम तीन समय सूर्य देव विशेष रूप से प्रभावी होते हैं।
सुबह के वक्त सूर्य की आराधना से सेहत के लिए बेहतर होता है। दोपहर में सूर्य की आराधना से नाम और यश बढ़ता है. शाम के समय सूर्य की आराधना से जीवन में संपन्नता आती है।शाम के समय सूर्य अपनी दूसरी पत्नी प्रत्यूषा के साथ रहते हैं। इसलिए प्रत्यूषा को अर्घ्य देना तुरंत लाभ देता है.जो डूबते सूर्य की उपासना करते है,अस्त होते सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा इंसानी जिंदगी हर तरह की परेशानी दूर करने की शक्ति रखती है। फिर समस्या सेहत से जुड़ी हो या निजी जिंदगी से। ढलते सूर्य को अर्घ्य देकर कई मुसीबतों से छुटकारा पाया जा सकता है। जो लोग बिना कारण मुकदमे में फंस गए हों,जिन लोगों का कोई काम सरकारी विभाग में अटका हो। जिन लोगों की आँखों की रौशनी घट रही हो,जिन लोगों को पेट की समस्या लगातार बनी रहती हो,जो विद्यार्थी बार-बार परीक्षा में असफल हो रहे हों।

इस व्रत में सूर्य देवता की पूजा की जाती है, जो प्रत्‍यक्ष दिखते हैं और सभी प्राणियों के जीवन के आधार हैं… सूर्य के साथ-साथ षष्‍ठी देवी या छठ मैया की भी पूजा की जाती है।
छठ पूजा को षष्ठी देवी माता को कात्यायनी माता के नाम से भी जाना जाता है। नवरात्रि के दिन में हम षष्ठी माता की पूजा करते हैं षष्ठी माता कि पुजा घर परिवार के सदस्यों के सभी सदस्यों के सुरक्षा एवं स्वास्थ्य लाभ के लिए करते हैं षष्ठी माता की पूजा, सुरज भगवान और मां गंगा की पूजा देश में एक लोकप्रिय पूजा है। यह प्राकृतिक सौंदर्य और परिवार के कल्याण के लिए की जाने वाली एक महत्वपूर्ण पूजा है। इस पुजा में गंगा स्थान या नदी तालाब जैसे जगह होना अनिवार्य हैं यही कारण है कि छठ पूजा के लिए सभी नदी तालाब कि साफ सफाई किया जाता है और नदी तालाब को सजाया जाता है प्राकृतिक सौंदर्य में गंगा मैया या नदी तालाब मुख्य स्थान है।

छठ का व्रत रखने वाली मंजू देवी के अनुसार-“
सृष्‍ट‍ि की अधिष्‍ठात्री प्रकृति देवी के एक प्रमुख अंश को देवसेना कहा गया है। प्रकृति का छठा अंश होने के कारण इन देवी का एक प्रचलित नाम षष्‍ठी है।
षष्‍ठी देवी को ब्रह्मा की मानसपुत्री भी कहा गया है। पुराणों में इन देवी का एक नाम कात्‍यायनी भी है। इनकी पूजा नवरात्र में षष्‍ठी तिथि को होती है। षष्‍ठी देवी को ही स्‍थानीय बोली में छठ मैया कहा गया है, जो नि:संतानों को संतान देती हैं और सभी बालकों की रक्षा करती हैं।
शास्‍त्रों में भगवान सूर्य को गुरु भी कहा गया है। ये अत्‍यंत दयालु हैं, वे उपासक को आयु, आरोग्‍य, धन-धान्‍य, संतान, तेज, कांति, यश, वैभव और सौभाग्‍य देते हैं,वे सभी को चेतना देते हैं। सूर्य की उपासना करने से मनुष्‍य को सभी तरह के रोगों से छुटकारा मिल जाता है। जो सूर्य की उपासना करते हैं, वे दरिद्र, दुखी, शोकग्रस्‍त और अंधे नहीं होते।
सूर्य को ब्रह्म का ही तेज बताया है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, इन चारों पुरुषार्थों को देने वाले हैं, साथ ही पूरे संसार की रक्षा करने वाले हैं।
सूर्य की पूजा में उन्‍हें जल से अर्घ्‍य देने का विधान है। पवित्र नदियों के जल से सूर्य को अर्घ्‍य देने और स्‍नान करने का विशेष महत्‍व बताया गया है। हालांकि यह पूजा किसी भी साफ-सुथरी जगह पर की जा सकती है।

आम बोलचाल की भाषा में इसे ‘कष्‍टी देना’ कहते हैं। ज्‍यादातर मामलों में ऐसा तब होता है, जब किसी ने इस तरह की कोई मन्नत मानी हो।

मान्यता है कि छठ पूजा मुख्य तौर पर संतान प्राप्ति और संतान की लंबी उम्र के लिए होती है. साथ ही घर की सुख—शांति और समृद्धि के लिए भी यह पूजा की जाती है।

साहित्यकार प्रतिभा देवी के अनुसार-“छठ से जुड़ी पौराणिक लोक कथाएँ भारतीय लोक में बहु प्रचलित है -“
रामायण के अनुसार लंका विजय के बाद रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की। सप्तमी को सूर्योदय के समय पुनः अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया था।
महाभारत के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। सूर्यपुत्र कर्ण ने सूर्यदेव की पूजा शुरू की। कर्ण भगवान सूर्य के परम भक्त थे। वह प्रतिदिन घण्टों कमर तक पानी में ख़ड़े होकर सूर्यदेव को अर्घ्य देते थे। सूर्यदेव की कृपा से ही वे महान योद्धा बने थे। आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही पद्धति प्रचलित है।

कुछ कथाओं में पांडवों की पत्नी द्रौपदी द्वारा भी सूर्य की पूजा करने का उल्लेख है। वे अपने परिजनों के उत्तम स्वास्थ्य की कामना और लम्बी उम्र के लिए नियमित सूर्य पूजा करती थीं।
एक कथा के अनुसार राजा प्रियवद को कोई संतान नहीं थी, तब महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराकर उनकी पत्नी मालिनी को यज्ञाहुति के लिए बनायी गयी खीर दी। इसके प्रभाव से उन्हें पुत्र हुआ परन्तु वह मृत पैदा हुआ। प्रियवद पुत्र को लेकर श्मशान गये और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे। उसी वक्त ब्रह्माजी की मानस कन्या देवसेना प्रकट हुई और कहा कि सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूँ। हे! राजन् आप मेरी पूजा करें तथा लोगों को भी पूजा के प्रति प्रेरित करें। राजा ने पुत्र इच्छा से देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई।

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एक कथा के अनुसार छठी मैया को ब्रह्मा की मानसपुत्री और भगवान सूर्य की बहन माना जाता है. छठी मैया की पूजा करने से निसंतानों को संतान की प्राप्ति होती है. यह भी कहा जाता है कि महाभारत के युद्ध के बाद अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रहे बच्चे का वध कर दिया था तब उसे बचाने के लिए उत्तरा को भगवान श्रीकृष्ण ने षष्ठी व्रत यानि छठ पूजा करने की सलाह दी थी।
रुप से ॠषियो द्वारा लिखी गई ऋग्वेद मे सूर्य पूजन, उषा पूजन और आर्य परंपरा के अनुसार बिहार मे यहा पर्व मनाया जाता हैं।

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एक कथा के अनुसार प्रथम देवासुर संग्राम में जब असुरों के हाथों देवता हार गये थे, तब देव माता अदिति ने तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति के लिए देवारण्य के देव सूर्य मंदिर में छठी मैया की आराधना की थी। तब प्रसन्न होकर छठी मैया ने उन्हें सर्वगुण संपन्न तेजस्वी पुत्र होने का वरदान दिया था। इसके बाद अदिति के पुत्र हुए त्रिदेव रूप आदित्य भगवान, जिन्होंने असुरों पर देवताओं को विजय दिलायी। कहा जाता हैं कि उसी समय से देव सेना षष्ठी देवी के नाम पर इस धाम का नाम देव हो गया और छठ का चलन भी शुरू हो गया
*लोकगीत गायिका शकुंतला देवी के अनुसार* –“लोकपर्व छठ के विभिन्न अवसरों पर जैसे प्रसाद बनाते समय, खरना के समय, अर्घ्य देने के लिए जाते हुए, अर्घ्य दान के समय और घाट से घर लौटते समय अनेकों सुमधुर और भक्ति-भाव से पूर्ण लोकगीत गाये जाते हैं।केलवा जे फरेला घवद से, ओह पर सुगा मेड़राय
काँच ही बाँस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए’
सेविले चरन तोहार हे छठी मइया। महिमा तोहर अपार।
उगु न सुरुज देव भइलो अरग के बेर।
निंदिया के मातल सुरुज अँखियो न खोले हे।
चार कोना के पोखरवा
हम करेली छठ बरतिया से उनखे लागी।
इस गीत में एक ऐसे तोते का जिक्र है जो केले के ऐसे ही एक गुच्छे के पास मंडरा रहा है। तोते को डराया जाता है कि अगर तुम इस पर चोंच मारोगे तो तुम्हारी शिकायत भगवान सूर्य से कर दी जाएगी जो तुम्हें नहीं माफ करेंगे, पर फिर भी तोता केले को जूठा कर देता है और सूर्य के कोप का भागी बनता है। पर उसकी भार्या सुगनी अब क्या करे बेचारी? कैसे सहे इस वियोग को? अब तो सूर्यदेव उसकी कोई सहायता नहीं कर सकते, उसने आखिर पूजा की पवित्रता जो नष्ट की है।

केरवा जे फरेला घवद से ओह पर सुगा मेड़राय

उ जे खबरी जनइबो अदिक (सूरज) से सुगा देले जुठियाए

उ जे मरबो रे सुगवा धनुक से सुगा गिरे मुरछाये

उ जे सुगनी जे रोये ले वियोग से आदित होइ ना सहाय देव होइ ना सहाय

काँच ही बाँस के बहँगिया, बहँगी लचकति जाए… बहँगी लचकति जाए… बात जे पुछेले बटोहिया बहँगी केकरा के जाए? बहँगी केकरा के जाए? तू त आन्हर हउवे रे बटोहिया, बहँगी छठी माई के जाए… बहँगी छठी माई के जाए… काँच ही बाँस के बहँगिया, बहँगी लचकति जाए… बहँगी लचकति जाए…

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केरवा जे फरेला घवद से ओह पर सुगा मेंड़राय… ओह पर सुगा मेंड़राय… खबरी जनइबो अदित से सुगा देले जूठियाय सुगा देले जूठियाय… ऊ जे मरबो रे सुगवा धनुष से सुगा गिरे मुरछाय… सुगा गिरे मुरछाय… केरवा जे फरेला घवद से ओह पर सुगा मेंड़राय… ओह पर सुगा मेंड़राय…

पटना के घाट पर नारियर नारियर किनबे जरूर… नारियर किनबो जरूर… हाजीपुर से केरवा मँगाई के अरघ देबे जरूर… अरघ देबे जरुर… आदित मनायेब छठ परबिया वर मँगबे जरूर… वर मँगबे जरूर… पटना के घाट पर नारियर नारियर किनबे जरूर… नारियर किनबो जरूर… पाँच पुतर, अन, धन, लछमी, लछमी मँगबे जरूर… लछमी मँगबे जरूर… पान, सुपारी, कचवनिया छठ पूजबे जरूर… छठ पूजबे जरूर… हियरा के करबो रे कंचन वर मँगबे जरूर… वर मँगबे जरूर… पाँच पुतर, अन, धन, लछमी, लछमी मँगबे जरूर… लछमी मँगबे जरूर… पुआ पकवान कचवनिया सूपवा भरबे जरूर… सूपवा भरबे जरूर… फल-फूल भरबे दउरिया सेनूरा टिकबे जरूर… सेनूरा टिकबे जरुर… उहवें जे बाड़ी छठी मईया आदित रिझबे जरूर… आदित रिझबे जरूर… काँच ही बाँस के बहँगिया, बहँगी लचकति जाए… बहँगी लचकति जाए… बात जे पुछेले बटोहिया बहँगी केकरा के जाए? बहँगी केकरा के जाए? तू त आन्हर हउवे रे बटोहिया, बहँगी छठी माई के जाए… बहँगी छठी माई के जाए..

वैज्ञानिक डॉ मंजू सिंह के अनुसार -“छठ पर्व को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो षष्ठी तिथि (छठ) को एक विशेष खगोलीय परिवर्तन होता है, इस समय सूर्य की पराबैगनी किरणें पृथ्वी की सतह पर सामान्य से अधिक मात्रा में एकत्र हो जाती हैं इस कारण इसके सम्भावित कुप्रभावों से मानव की यथासम्भव रक्षा करने का सामर्थ्य प्राप्त होता है। पर्व पालन से सूर्य (तारा) प्रकाश (पराबैगनी किरण) के हानिकारक प्रभाव से जीवों की रक्षा सम्भव है। पृथ्वी के जीवों को इससे बहुत लाभ मिलता है।
सूर्य के प्रकाश के साथ उसकी पराबैगनी किरण भी चंद्रमा और पृथ्वी पर आती हैं। सूर्य का प्रकाश जब पृथ्वी पर पहुँचता है, तो पहले वायुमंडल मिलता है। वायुमंडल में प्रवेश करने पर उसे आयन मंडल मिलता है। पराबैगनी किरणों का उपयोग कर वायुमंडल अपने ऑक्सीजन तत्त्व को संश्लेषित कर उसे उसके एलोट्रोप ओजोन में बदल देता है। इस क्रिया द्वारा सूर्य की पराबैगनी किरणों का अधिकांश भाग पृथ्वी के वायुमंडल में ही अवशोषित हो जाता है। पृथ्वी की सतह पर केवल उसका नगण्य भाग ही पहुँच पाता है। सामान्य अवस्था में पृथ्वी की सतह पर पहुँचने वाली पराबैगनी किरण की मात्रा मनुष्यों या जीवों के सहन करने की सीमा में होती है।अत: सामान्य अवस्था में मनुष्यों पर उसका कोई विशेष हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता, बल्कि उस धूप द्वारा हानिकारक कीटाणु मर जाते हैं, जिससे मनुष्य या जीवन को लाभ होता है।

खगोल शास्त्रियों के अनुसार -“चंद्रमा और पृथ्वी के भ्रमण तलों की सम रेखा के दोनों छोरों पर) सूर्य की पराबैगनी किरणें कुछ चंद्र सतह से परावर्तित तथा कुछ गोलीय अपवर्तित होती हुई, पृथ्वी पर पुन: सामान्य से अधिक मात्रा में पहुँच जाती हैं। वायुमंडल के स्तरों से आवर्तित होती हुई, सूर्यास्त तथा सूर्योदय को यह और भी सघन हो जाती है।
ज्योतिषीय गणना के अनुसार यह घटना इन कार्तिक तथा चैत्र मास की अमावस्या के छ: दिन उपरान्त आती है। ज्योतिषीय गणना पर आधारित होने के कारण इसका नाम और कुछ नहीं, बल्कि छठ पर्व ही रखा गया है।छठ पर्व किस प्रकार मनाते हैं ?
डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य यानी दूध अर्पण करते हैं। अंतिम दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य चढ़ाते हैं। पूजा में पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है;जिन घरों में यह पूजा होती है, वहाँ भक्तिगीत गाये जाते हैं।अंत में लोगो को पूजा का प्रसाद दिया जाता हैं।

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शिक्षिका तृप्ति केसरवानी के अनुसार छठ पर्व उत्सव का है- छठ पूजा चार दिवसीय उत्सव है। इसकी शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को तथा समाप्ति कार्तिक शुक्ल सप्तमी को होती है। इस दौरान व्रतधारी लगातार 36 घंटे का व्रत रखते हैं। इस दौरान वे पानी भी ग्रहण नहीं करते
पहला दिन जिसे ‘नहाय-खाय’ के नाम से जाना जाता है,उसकी शुरुआत चैत्र या कार्तिक महीने के चतुर्थी कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से होता है ।सबसे पहले घर की सफाई कर उसे पवित्र किया जाता है। उसके बाद व्रती अपने नजदीक में स्थित गंगा नदी,गंगा की सहायक नदी या तालाब में जाकर स्नान करते है। व्रती इस दिन नाखून वगैरह को अच्छी तरह काटकर, स्वच्छ जल से अच्छी तरह बालों को धोते हुए स्नान करते हैं। लौटते समय वो अपने साथ गंगाजल लेकर आते है जिसका उपयोग वे खाना बनाने में करते है । वे अपने घर के आस पास को साफ सुथरा रखते है । व्रती इस दिन सिर्फ एक बार ही खाना खाते है । खाना में व्रती कद्दू की सब्जी ,मुंग चना दाल, चावल का उपयोग करते है . यह खाना कांसे या मिटटी के बर्तन में पकाया जाता है। खाना पकाने के लिए आम की लकड़ी और मिटटी के चूल्हे का इस्तेमाल किया जाता है। जब खाना बन जाता है तो सर्वप्रथम व्रती खाना खाते है उसके बाद ही परिवार के अन्य सदस्य खाना खाते है ।
खरना और लोहंडा
छठ पर्व का दूसरा दिन जिसे खरना या लोहंडा के नाम से जाना जाता है,चैत्र या कार्तिक महीने के पंचमी को मनाया जाता है। इस दिन व्रती पुरे दिन उपवास रखते है . इस दिन व्रती अन्न तो दूर की बात है सूर्यास्त से पहले पानी की एक बूंद तक ग्रहण नहीं करते है। शाम को चावल गुड़ और गन्ने के रस का प्रयोग कर खीर बनाया जाता है। खाना बनाने में नमक और चीनी का प्रयोग नहीं किया जाता है। इन्हीं दो चीजों को पुन: सूर्यदेव को नैवैद्य देकर उसी घर में ‘एकान्त’ करते हैं अर्थात् एकान्त रहकर उसे ग्रहण करते हैं।
पुन: व्रती खाकर अपने सभी परिवार जनों एवं मित्रों-रिश्तेदारों को वही ‘खीर-रोटी’ का प्रसाद खिलाते हैं। इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को ‘खरना’ कहते हैं। चावल का पिठ्ठा व घी लगी रोटी भी प्रसाद के रूप में वितरीत की जाती है। इसके बाद अगले 36 घंटों के लिए व्रती निर्जला व्रत रखते है। मध्य रात्रि को व्रती छठ पूजा के लिए विशेष प्रसाद ठेकुआ बनाती है ।

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व्रती स्मिता केसरी के अनुसार देवी के अनुसार-
छठ पर्व करते छठव्रती
छठ पर्व का तीसरा दिन जिसे संध्या अर्घ्य के नाम से जाना जाता है,चैत्र या कार्तिक शुक्ल षष्ठी को मनाया जाता है। पुरे दिन सभी लोग मिलकर पूजा की तैयारिया करते है। छठ पूजा के लिए विशेष प्रसाद जैसेठेकुआ, चावल के लड्डू जिसे कचवनिया भी कहा जाता है, बनाया जाता है । छठ पूजा के लिए एक बांस की बनी हुयी टोकरी जिसे दउरा कहते है में पूजा के प्रसाद,फल डालकर देवकारी में रख दिया जाता है। वहां पूजा अर्चना करने के बाद शाम को एक सूप में नारियल,पांच प्रकार के फल,और पूजा का अन्य सामान लेकर दउरा में रख कर घर का पुरुष अपने हाथो से उठाकर छठ घाट पर ले जाता है। यह अपवित्र न हो इसलिए इसे सर के ऊपर की तरफ रखते है। छठ घाट की तरफ जाते हुए रास्ते में प्रायः महिलाये छठ का गीत गाते हुए जाती है
नदी या तालाब के किनारे जाकर महिलाये घर के किसी सदस्य द्वारा बनाये गए चबूतरे पर बैठती है। नदी से मिटटी निकाल कर छठ माता का जो चौरा बना रहता है उस पर पूजा का सारा सामान रखकर नारियल चढाते है और दीप जलाते है। सूर्यास्त से कुछ समय पहले सूर्य देव की पूजा का सारा सामान लेकर घुटने भर पानी में जाकर खड़े हो जाते है और डूबते हुए सूर्य देव को अर्घ्य देकर पांच बार परिक्रमा करतीहै।
सामग्रियों में, व्रतियों द्वारा स्वनिर्मित गेहूं के आटे से निर्मित ‘ठेकुआ’ सम्मिलित होते हैं। यह ठेकुआ इसलिए कहलाता है क्योंकि इसे काठ के एक विशेष प्रकार के डिजाइनदार फर्म पर आटे की लुगधी को ठोकर बनाया जाता है। उपरोक्त पकवान के अतिरिक्त कार्तिक मास में खेतों में उपजे सभी नए कन्द-मूल, फलसब्जी, मसाले व अन्नादि यथा गन्ना, ओल, हल्दी, नारियल, नींबू(बड़ा), पके केले आदि चढ़ाए जाते हैं। ये सभी वस्तुएं साबूत (बिना कटे टूटे) ही अर्पित होते हैं। इसके अतिरिक्त दीप जलाने हेतु,नए दीपक,नई बत्तियाँ व घी ले जाकर घाट पर दीपक जलाते हैं। इसमें सबसे महत्वपूर्ण अन्न जो है वह है कुसही केराव के दानें (हल्का हरा काला, मटर से थोड़ा छोटा दाना) हैं जो टोकरे में लाए तो जाते हैं पर सांध्य अर्घ्य में सूरजदेव को अर्पित नहीं किए जाते। इन्हें टोकरे में कल सुबह उगते सूर्य को अर्पण करने हेतु सुरक्षित रख दिया जाता है। बहुत सारे लोग घाट पर रात भर ठहरते है वही कुछ लोग छठ का गीत गाते हुए सारा सामान लेकर घर आ जाते है और उसे देवकरी में रख देते है
चौथे दिन कार्तिक शुक्ल सप्तमी की सुबह उदियमान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। सूर्योदय से पहले ही व्रती लोग घाट पर उगते सूर्यदेव की पूजा हेतु पहुंच जाते हैं और शाम की ही तरह उनके पुरजन-परिजन उपस्थित रहते हैं। संध्या अर्घ्य में अर्पित पकवानों को नए पकवानों से प्रतिस्थापित कर दिया जाता है परन्तु कन्द, मूल, फलादि वही रहते हैं। सभी व्रती लोग इस समय पूरब की ओर मुंहकर पानी में खड़े होते हैं व सूर्योपासना करते हैं। पेजा समाप्तोपरान्त घाट का पूजन होता है। वहाँ उपस्थित लोगों में प्रसाद वितरण करके व्रती घर आ जाते हैं और घर पर भी अपने परिवार आदि को प्रसाद वितरण करते हैं। व्रति घर वापस आकर गाँव के पीपल के पेड़ जिसको ब्रह्म बाबा कहते हैं वहाँ जाकर पूजा करते हैं। पूजा के पश्चात् व्रति कच्चे दूध का शरबत पीकर तथा थोड़ा प्रसाद खाकर व्रत पूर्ण करते हैं जिसे पारण या परना कहते हैं। व्रती लोग खरना दिन से आज तक निर्जला उपवासोपरान्त आज सुबह ही नमकयुक्त भोजन करते हैं। [
ऐसी मान्यता है कि छठ पर्व पर व्रत करने वाली महिलाओं को पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है। पुत्र की चाहत रखने वाली और पुत्र की कुशलता के लिए सामान्य तौर पर महिलाएँ यह व्रत रखती हैं। पुरुष भी पूरी निष्ठा से अपने मनोवांछित कार्य को सफल होने के लिए व्रत रखते हैं।

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छठ पर्व पर उपवास रखने वाली माधुरी देवी के अनुसार
सूर्योपासना की परम्परा
भारत में सूर्योपासना ऋगवेद काल से होती आ रही है। सूर्य और इसकी उपासना की चर्चा विष्णु पुराण, भगवत पुराण, ब्रह्मा वैवर्त पुराण आदि में विस्तार से की गयी है। मध्य काल तक छठ सूर्योपासना के व्यवस्थित पर्व के रूप में प्रतिष्ठित हो गया, जो अभी तक चला आ रहा है।
देवता के रूप में
सृष्टि और पालन शक्ति के कारण सूर्य की उपासना सभ्यता के विकास के साथ विभिन्न स्थानों पर अलग-अलग रूप में प्रारम्भ हो गयी, लेकिन देवता के रूप में सूर्य की वन्दना का उल्लेख पहली बार ऋगवेद में मिलता है। इसके बाद अन्य सभी वेदों के साथ ही उपनिषद् आदि वैदिक ग्रन्थों में इसकी चर्चा प्रमुखता से हुई है। निरुक्त के रचियता यास्क ने द्युस्थानीय देवताओं में सूर्य को पहले स्थान पर रखा है।
मानवीय रूप की कल्पना

उत्तर वैदिक काल के अन्तिम कालखण्ड में सूर्य के मानवीय रूप की कल्पना होने लगी। इसने कालान्तर में सूर्य की मूर्ति पूजा का रूप ले लिया। पौराणिक काल आते-आते सूर्य पूजा का प्रचलन और अधिक हो गया। अनेक स्थानों पर सूर्यदेव के मंदिर भी बनाये गये।
आरोग्य देवता के रूप में
पौराणिक काल में सूर्य को आरोग्य देवता भी माना जाने लगा था। सूर्य की किरणों में कई रोगों को नष्ट करने की क्षमता पायी गयी। ऋषि-मुनियों ने अपने अनुसन्धान के क्रम में किसी खास दिन इसका प्रभाव विशेष पाया। सम्भवत: यही छठ पर्व के उद्भव की बेला रही हो। भगवान कृष्ण के पौत्र शाम्ब को कुष्ठ रोग हो गया था। इस रोग से मुक्ति के लिए विशेष सूर्योपासना की गयी, जिसके लिए शाक्य द्वीप से ब्राह्मणों को बुलाया गया था।

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समाजशास्त्री ओम प्रकाश त्रिपाठी के अनुसार-“ छठ पूजा का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष इसकी सादगी पवित्रता और लोकपक्ष है। भक्ति और आध्यात्म से परिपूर्ण इस पर्व में बाँस निर्मित सूप, टोकरी, मिट्टी के बर्त्तनों, गन्ने का रस, गुड़, चावल और गेहूँ से निर्मित प्रसाद और सुमधुर लोकगीतों से युक्त होकर लोक जीवन की भरपूर मिठास का प्रसार करता है।
सूर्यषष्‍ठी व्रत में लोग उगते हुए सूर्य की भी पूजा करते हैं, डूबते हुए सूर्य की भी उतनी ही श्रद्धा से पूजा करते हैं। इसमें कई तरह के संकेत छिपे हैं। ये पूरी दुनिया में भारत की आध्‍यात्‍म‍िक श्रेष्‍ठता को दिखाता है।
बिहार में सूर्य पूजा सदियों से प्रचलित है। सूर्य पुराण में यहां के देव मंदिरों की महिमा का वर्णन मिलता है। यहां सूर्यपुत्र कर्ण की जन्मस्थली भी है। अत: स्वाभाविक रूप से इस प्रदेश के लोगों की आस्‍था सूर्य देवता में ज्‍यादा है।
सबसे बड़ी खासियत यह है कि मंदिर का मुख्‍य द्वार पश्चिम दिशा की ओर है, जबकि आम तौर पर सूर्य मंदिर का मुख्‍य द्वार पूर्व दिशा की ओर होता है। मान्‍यता है कि यहां के विशेष सूर्य मंदिर का निर्माण देवताओं के शिल्‍पी भगवान विश्‍वकर्मा ने किया था। स्‍थापत्‍य और वास्‍तुकला कला के दृष्‍ट‍िकोण से यहां के सूर्य मंदिर बेजोड़ हैं।
छठ पर्व भारत सहित पुरे विश्व में बड़े ही हर्षोल्लास धार्मिक आस्था और विश्वास के साथ मनाया गया और स्त्रियों और पुरुषों ने अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए इस व्रत को किया। जनपद के सोन नदी के तट पर छठ पर्व पर पूजा इत्यादि का आयोजन किया गया। उपवास
रखने वाली स्त्रियों को कोई परेशानी न हो इसके लिए जिला प्रशासन द्वारा सुरक्षा व्यवस्था एवं नगर पालिका रॉबर्ट्सगंज सहित सभी नगर पंचायतों के अध्यक्षों, समाजसेवियों द्वारा अन्य प्रकार की सुविधाएं उपवासी स्त्रियों को उपलब्ध कराया गया।
कोरोना संक्रमण बचने के लिए कई वर्ती महिलाओ ने घर के आंगन और छत पर छठ पूजा कर ‘मन चंगा, तो कठौती में गंगा’ वाली कहावत को चरितार्थ किया।

लम्बित परियोजनाओं को पूरा करने के लिए समय-सीमा का ध्यान देते हुए गुणवत्तापूर्ण तरीके से पूरा किया जाय: जिलाधिकारी

सोनभद्र। बृहस्पतिवार को जिलाधिकारी टी0के0 शिबू ने कलेक्ट्रेट सभागार में जिला खनिज फाउंडेशन की समीक्षा बैठक की। जिलाधिकारी ने निर्माणाधीन भवनों, सी०सी०रोड, इण्टरलाकिंग आदि कार्यों को निर्धारित समय में पूरा करने के निर्देश सम्बन्धित कार्यदायी संस्थाओं व अधिकारियों को दिया। उन्होंने कहा कि जिला खनिज फाउण्डेशन के धन का सदुपयोग अधिकृत कार्यदायी संस्था द्वारा कराया जायेगा और किसी भी काम का ई टेण्डर अनिवार्य रूप से करने के साथ ही शासन की मंशा के मुताबिक सभी दिशा निर्देशों का अनुपालन सुनिश्चित किया जाय।

इस दौरान जिलाधिकारी ने आवश्यक दिशा निर्देश देते हुए कहा कि जिन कार्यदायी संस्था द्वारा निर्माण कार्य में लापरवाही व शिथिलता बरती जाती है, उनके खिलाफ नियमानुसार कार्यवाही करते हुए ब्लैक लिस्टेट की कार्यवाही भी किया जाय।

इस दौरान उन्होंने संबंधित अधिकारियों को निर्देशित करते हुए कहा कि “शासन की मंशा के अनुरूप जिला खनिज फाउण्डेशन से स्थानीय आवश्यकताओं को पूरा करने का कार्य किया जाय। पहले जरूरी कामों को, जिसकी स्वीकृति मिल चुकी है, वरियता के आधार पर सुविधाएं मुहैया करायी जाय। शिक्षा व चिकित्सा के क्षेत्र में मुख्य रूप से नागरिकों को सुविधा मुहैया कराने के लिए प्राप्त बजट का उपयोग किया जाय।

जिला खनिज निधि से कराये जाने वाले कार्यों के गुणवत्ता पर विशेष ध्यान रखा जाय, निर्माणाधीन कार्यों में तेजी लाकर परियोजनाओं को पूरा किया जाय। जरूरत के मुताबिक धन जारी करने के साथ ही जिला खनिज निधि अनुभाग को प्रभावी व क्रियाशील करने की भी व्यवस्था की जाय।

“जिलाधिकारी ने कहा कि “लम्बित परियोजनाओं को पूरा करने के लिए समय-सीमा का ध्यान देते हुए गुणवत्तापूर्ण तरीके से पूरा किया जाय। सम्पर्क मार्ग, विद्युतीकरण, सौर ऊर्जा, पेयजल, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं को जरूरत के मुताबिक शामिल किया जाय। उन्होंने कहा कि हमारा लक्ष्य है कि जनपद में ज्यादा से ज्यादा लोगों को रोजगार मुहैया कराने के साथ ही जरूरी कामों को जिला खनिज निधि में शामिल किया जाय।” बैठक में अपर जिलाधिकारी राकेश कुमार सिंह, मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ० नेम सिंह, जिला खनन अधिकारी, निर्माण एजेन्सियों के अधिकारीगण सहित अन्य सम्बन्धितगण उपस्थित रहें ।

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