HIGHLIGHTS
- वाराणसी में कबीर प्रकट महोत्सव का भव्य समापन: राष्ट्रीय संगोष्ठी में गूंजा कबीर दर्शन, 50 से अधिक शोधपत्रों का हुआ वाचन

वाराणसी। प्राचीन कबीर प्राकट्य स्थली, पुराना कबीर मठ (लहरतारा) में आयोजित तीन दिवसीय कबीर प्रकट महोत्सव का अंतिम दिन आध्यात्मिक चेतना, लोक संस्कृति, संत परंपरा और अकादमिक विमर्श का अद्भुत संगम बनकर सम्पन्न हुआ। संत कबीर की वाणी, उनके समतामूलक दर्शन और मानवीय मूल्यों को जन-जन तक पहुँचाने के उद्देश्य से आयोजित इस महोत्सव में देश के विभिन्न राज्यों से आए संतों, विद्वानों, शोधार्थियों, कलाकारों एवं श्रद्धालुओं ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की।
दिन का शुभारम्भ प्रातःकालीन आरती के साथ हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं ने सामूहिक रूप से भाग लेकर संत कबीर के प्रति अपनी श्रद्धा अर्पित की। आरती के पश्चात आयोजित सत्संग एवं भजन कार्यक्रम ने सम्पूर्ण वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। इस अवसर पर नई दिल्ली के चाणक्यपुरी स्थित भगवान वाल्मीकि आश्रम से पधारे महामंडलेश्वर विवेक नाथ जी महाराज ने अपने भजन और उद्बोधन के माध्यम से संत परंपरा की समन्वयकारी चेतना को प्रस्तुत करते हुए कहा कि कबीर केवल एक संत नहीं, बल्कि भारतीय समाज की आत्मा हैं।

उनकी वाणी आज भी मनुष्य को जाति, पंथ और ऊँच-नीच के भेदभाव से ऊपर उठकर मानवता के पथ पर चलने की प्रेरणा देती है। इसके बाद विभिन्न राज्यों से आई भजन मंडलियों ने कबीर के पदों और साखियों की संगीतमय प्रस्तुतियां देकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।

कबीर महोत्सव के अंतर्गत “कबीर की विरासत: काशी से मगहर तक—इतिहास, स्मृति और लोक परंपरा” विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी का द्वितीय तकनीकी सत्र भी अत्यंत सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। वरिष्ठ विद्वान एवं साहित्यकार डॉ. रविन्द्र गौतम के कुशल संचालन में हुए इस सत्र में कबीर की वैचारिक प्रासंगिकता और लोकधर्मिता पर गंभीर विमर्श किया गया।

संगोष्ठी के दौरान देशभर से आए विद्वानों ने कुल पचास से अधिक शोधपत्र प्रस्तुत किए, जिनमें कबीर के दर्शन, इतिहास, भाषा, साहित्य, सामाजिक समरसता और समकालीन संदर्भों पर प्रकाश डाला गया। सत्र में साहित्य भूषण सम्मान से सम्मानित प्रख्यात विद्वान डॉ. सुरेश पटेल (इंदौर) ने कबीर साहित्य की लोकग्राह्यता पर विचार रखे, जबकि दयाबस्ती पी.जी. कॉलेज जौनपुर के डॉ. आयुष्मान सिंह ने कबीर के सामाजिक चिंतन और भारतीय लोकतांत्रिक मूल्यों के अंतर्संबंधों को रेखांकित किया।

इसी क्रम में डॉ. मिथिलेश कुमार, चितरंजन मिश्रा, प्रोफेसर अमरेंद्र त्रिपाठी और शहीद हीरा सिंह पी.जी. कॉलेज के प्रतिनिधियों ने कबीर की काव्य परंपरा, लोक स्मृति और आधुनिक मानव जीवन की चुनौतियों के संदर्भ में उनके विचारों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया। विद्वानों ने सर्वसम्मति से इस बात पर बल दिया कि काशी से मगहर तक की कबीर यात्रा केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि भारतीय समाज के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विकास की यात्रा है।

कार्यक्रम में भारतीय जनता पार्टी के वाराणसी क्षेत्रीय अध्यक्ष अशोक चौरसिया ने भी कबीर प्राकट्य स्थल पर दर्शन-पूजन किया और सामाजिक सौहार्द व समरसता को सुदृढ़ करने में ऐसे आयोजनों की भूमिका को सराहा। वहीं, प्राचीन कबीर प्राकट्य स्थली के पीठाधीश्वर महंत गोविंद दास शास्त्री जी महाराज ने अपने प्रेरणादायी उद्बोधन में कबीर साहब की शिक्षाओं को जीवन में उतारने का आह्वान किया।

उन्होंने कहा कि कबीर साहब का संदेश केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और मानवीय चेतना का संदेश है और लहरतारा स्थित यह पावन स्थल सदियों से इस समतामूलक चेतना को संरक्षित किए हुए है। इस सम्पूर्ण भव्य आयोजन के साक्षी दूरदर्शन नई दिल्ली से पधारे वरिष्ठ साहित्यप्रेमी एवं कबीर चिंतक मोहम्मद इसाक़ ख़ान भी रहे, जिनके संत परंपरा के प्रति गहरे अनुराग ने कार्यक्रम की गरिमा को और बढ़ा दिया। समापन सत्र में उपस्थित सभी प्रबुद्ध जनों ने इस संकल्प को दोहराया कि कबीर की विरासत को केवल ग्रंथों तक सीमित न रखकर लोकजीवन, शिक्षा और सामाजिक व्यवहार का हिस्सा बनाया जाना चाहिए, क्योंकि उनकी वाणी आज भी सांप्रदायिक सद्भाव और सामाजिक न्याय की सबसे सशक्त आवाज है।



































