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- तकनीकी शिक्षा छोड़ किसान मान सिंह ने शुरू की ड्रैगन फ्रूट की खेती: 4 एकड़ में उगाया ‘लाल सोना’, सालाना 36 टन उत्पादन से लिखी सफलता की नई इबारत

सोनभद्र। यदि कृषि क्षेत्र में कुछ नया और नवाचार करने का मजबूत जुनून हो, तो बंजर जमीन भी समृद्धि और कमाई का नया रास्ता खोल सकती है। इसका जीवंत उदाहरण जिले के कुशी डोर निवासी युवा किसान मान सिंह पटेल ने पेश किया है। पॉलिटेक्निक की पढ़ाई पूरी करने के बाद वर्ष 2021 में उन्होंने पारंपरिक खेती की लीक से हटकर महज एक एकड़ जमीन पर ड्रैगन फ्रूट यानी ‘कमलम’ की खेती की शुरुआत की थी।

शुरुआती दौर में उनका यह प्रयोग बेहद सफल रहा, जिससे उनका हौसला बढ़ा और देखते ही देखते उन्होंने खेती का दायरा बढ़ाकर चार एकड़ तक पहुंचा दिया। वर्तमान में उनके कृषि फार्म में ड्रैगन फ्रूट की छह उन्नत किस्में लहलहा रही हैं और करीब 7,200 पौधों से प्रतिवर्ष औसतन 36 टन (36 हजार किलोग्राम) तक बंपर उत्पादन हो रहा है।

मान सिंह पटेल ने अपनी इस प्रगतिशील यात्रा के बारे में बताया कि शुरुआत में उन्हें कई तरह की तकनीकी और व्यावहारिक चुनौतियों से जूझना पड़ा, लेकिन जिला उद्यान विभाग सोनभद्र से मिले निरंतर मार्गदर्शन, तकनीकी सहयोग और अपने कुशल प्रबंधन के बल पर उन्होंने इस खेती को सफलतापूर्वक विस्तार दिया।

आज उनके खेत में वियतनाम रेड, सी-टाइप, जम्बो रेड और एलो वैरायटी जैसी छह प्रमुख किस्मों की वैज्ञानिक पद्धति से खेती की जा रही है। उन्होंने बताया कि एक एकड़ क्षेत्र में कंक्रीट के लगभग 450 पोल लगाए जाते हैं और प्रत्येक पोल के सहारे चार पौधे रोपे जाते हैं। इस तरह एक एकड़ में 1,800 और चार एकड़ में कुल 1,800 पोल के सहारे 7,200 पौधे फल दे रहे हैं। सही देखभाल और संतुलित पोषण मिलने पर प्रति पोल औसतन 20 किलोग्राम तक गुणवत्तापूर्ण फल प्राप्त हो जाता है।

बाजार दरों की बात करें तो किसान को थोक मंडी में गुणवत्ता और मांग के आधार पर 125 से 250 रुपये प्रति किलोग्राम तक का मूल्य मिल जाता है, जबकि खुदरा बाजार में यह सुपरफूड 200 से 400 रुपये प्रति किलोग्राम तक बिकता है। इस लिहाज से चार एकड़ का यह उत्पादन लाखों रुपये के टर्नओवर की संभावना पैदा करता है, हालांकि शुद्ध मुनाफा लागत और परिवहन पर निर्भर करता है।
पोषक तत्वों, फाइबर, विटामिन और एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर यह फल सेहत के लिए बेहद फायदेमंद माना जाता है। मान सिंह का कहना है कि अब सबसे बड़ी चुनौती स्थानीय स्तर पर पर्याप्त बाजार और सुगम परिवहन व्यवस्था की कमी है, क्योंकि सोनभद्र में इसकी खपत सीमित होने के कारण उपज को बड़े शहरों में भेजना पड़ता है। यदि जिले में बेहतर विपणन सुविधाएं विकसित हों, तो सोनभद्र के अन्य किसानों के लिए भी यह ‘लाल सोना’ आय का एक सशक्त जरिया बन सकता है।

























































