पुलिस क्षेत्राधिकारी व तहसीलदार ने छठ घाटों का किया औचक निरीक्षण

संस्कृति लाइव संवाददाता, दुद्धी (सोनभद्र): दुद्धी के प्राचीन शिवाजी तालाब, कैलाश कुंज मल्लदेवा, लौआ नदी स्थित ग्राम बीडर छठ घाटों का पुलिस क्षेत्राधिकारी, नवागत तहसीलदार सहित एसएसआई बालेंद्र यादव,व पुलिसकर्मियों ने सूर्य देवता का महापर्व छठ त्यौहार के मद्देनजर आसपास के छठ घाटों का निरीक्षण कर व्यवस्थाओं का जायजा लिया।

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शांति सुरक्षा व्यवस्था और भक्तों को पूजा पद्धति में किसी प्रकार की कोई व्यवधान उत्पन्न ना हो सके इसके मद्देनजर शासन के निर्देश पर चाक-चौबंद व्यवस्था को लेकर उच्चाधिकारियों का त्यौहार के पूर्व निरीक्षण करने के लिए आम जनों ने प्रशासन के कार्यों की सराहना भी कर रहे है। वही दिनांक 10 नवंबर व 11 नवंबर 2021 को त्यौहार पूर्ण आस्था के साथ मनाया जाना है। जिसको लेकर पुलिस क्षेत्राधिकारी व तहसीलदार दुद्धी द्वारा घाटों का निरीक्षण किया गया।

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मध्य प्रदेश के कैबिनेट मंत्री अखिलेश्वर आनंद गिरि का चोपन में हुआ भव्य स्वागत

संस्कृति लाइव संवाददाता, चोपन (सोनभद्र): मध्य प्रदेश कैबिनेट मंत्री व गो सरंक्षण संवर्धन के अध्यक्ष महामण्डलेश्वर स्वामी अखिलेश्वरानंद गिरी भोपाल से शक्तिपुंज एक्सप्रेस ट्रेन द्वारा चोपन पहुंचे। जहां पर विस्व हिन्दू परिषद के प्रान्त प्रमुख धर्म प्रसारनर सिंह त्रिपाठी काशी प्रान्त के नेतृत्व में दर्जनों गाड़ियों का काफिला उनके स्वागत के लिए चोपन रेलवे स्टेटशन पर पहुँचा।

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इसके बाद अखिलेश्वरा नंद का काफिला चोपन स्व० देवेंद्र शाश्त्री रिसोर्ट पहुँचा जहाँ उनका भब्य स्वागत किया गया जिसके बाद तय कार्यक्रम के अनुशार चोपन सड़क मार्ग से होकर घोरावल के लिए प्रस्थान कर गए।

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नरसिंह त्रिपाठी द्वारा बताया गया कि घोरावल से देर शाम पुनः चोपन के लिए वापसी होगी और उसके बाद कल प्रातः चोपन रेलवे स्टेशन से ही शक्तिपुंज एक्सप्रेस द्वारा ही भोपाल के लिए रवाना होंगे।

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कार्यक्रम के दौरान विद्याशंकर पाण्डेय उर्फ बबलू पाण्डेय , संतोष सिंह उर्फ डम्पू सिंह ,संजीव त्रिपाठी,प्रदीप अग्रवाल, जनार्दन ,पारस तिवारी, सुरज तिवारी,मनीष त्रिपाठी, रिंकू मोदनवाल , केदार सिंह ,शोनु मोदनवाल, अनील पाठक, बिरेंद्र तिवारी,दिनेश रावत,समेत अन्य दर्जनों लोग रहे मौजूद।

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प्रेस क्लब चोपन कार्यकारिणी का हुआ गठन

• मनोज चौबे की अध्यक्षता में सभी पदों के पदाधिकारियों की चयन प्रक्रिया हुई संपन्न

संस्कृति लाइव संवाददाता,(सोनभद्र): शनिवार को प्रेस क्लब चोपन की बैठक नगर स्थित काली मंदिर के प्रांगण में मनोज चौबे की अध्यक्षता में आयोजित की गई। बैठक में सर्वसम्मति से कार्यकारिणी का गठन किया गया। इस दौरान सभी पदों के पदाधिकारियों का चयन प्रक्रिया संपन्न हुआ।

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क्लब के सदस्यों के आपसी विचार-विमर्श से बैठक में विभिन्न पदों के चुनाव प्रक्रिया को अंतिम रूप देते हुए सभी पदों की घोषणा की गई। जिसमे उपाध्यक्ष पद के लिए अमलेश सोनकर एवं विनीत शर्मा, महामंत्री, सद्दाम कुरैशी,मंत्री प्रमोद कुमार एवं त्रिभुवन सिंह , कोषाध्यक्ष राहुल शर्मा, सचिव अरविंद दुबे ,मीडिया प्रभारी मुकेश मोदनवाल, कैलाश नाथ प्रजापति प्रवक्ता एवं सत्यदेव पाण्डेय को संगठन की जिम्मेदारी सौंपी गई।

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वहीं विधि सलाहकार के लिए एडवोकेट अमित सिंह को जिम्मेदारी दी गई। सदस्य के रूप में राजेश अग्रहरी, विनित पाण्डेय, कामेश्वर विश्वकर्मा, विजय साहनी, धनश्याम पाण्डेय, कृपाशंकर पाण्डेय, श्यामनारायण दुबे, सन्तोष मिश्रा अनुज जयसवाल एवं अशोक मधेशिया उपस्थित रहे |

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भाइयों की दीर्घायु के लिए बहनों ने किया भैयादूज की पूजा

हर्षवर्धन केसरवानी

रॉबर्ट्सगंज (सोनभद्र): कार्तिक शुक्ल द्वितीया को स्त्रियों द्वारा भैया दूज का पर्व बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया गया।
इस अवसर पर बहनों ने अपने भाई के लिए व्रत रखा और सार्वजनिक का स्थान, आंगन, पोखरा, तालाब, नदी के किनारे खुले स्थान पर गोबर से जमीन पर अलंकरण बनाया, इस अलंकरण में मुख्य रूप से गोदना और उसके पुत्र की आकृति होती है, इन चित्रों में गोवर्धन भगवान
गोपिया, ६ नारायण, सूरज, चांद अन्य प्राकृतिक दृश्य स्त्रियां गोबर से करती है इसके साथ-साथ चौकीदार, ओखली मे गोबर से बने एक अलंकृत चौकियां बनाई जाती है जो सफेद रूई तथा सिंदूर से बनता है इससे संबंधित कहानियां कहती हैं, लोकगीत गाती हैं और एक विचित्र परंपरा है कि अपने प्रिय को सकती हैं भैया खाऊं आदि गालियां देती है।

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ऐसी मान्यता है कि आज के दिन जिसको जितना सरापा जाएगा उसकी उतनी ही उम्रअधिक होगी वह अपने भाइयों का नाम का नाम लेकर उनके चिरायु होने तथा भाभी के सौभाग्य की कामना करती हैं, अलंकरण के मध्य में एक मूर्ति बनाती हैं,इसे गोधन कहते हैं, गोदना बनाने से जो गोबर बच जाता है उसे सभी बांट दिया जाता है स्त्रियां उस गोबर का गोल गोल पिंड बनाकर अपने घर ले जाती हैं तथाअनाज भंडार में उसे रखी है ऐसी मान्यता है कि इससे अनाज बढ़ता है, खराब नहीं होता।

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इस पर्व पर अनेकों प्रकार की लोक कथाएं लोकगीत कहने, गाने की परंपरा हैभाई दूज से जुड़ी पौराणिक कथा: मान्यताओं अनुसार इस दिन मृत्यु के देवता यमराज अपनी बहन यमुना के अनेकों बार बुलाने के बाद उनके घर गए थे। यमुना ने यमराज को भोजन कराया और तिलक कर उनके खुशहाल जीवन की प्रार्थना की। प्रसन्न होकर यमराज ने बहन यमुना से वर मांगने को कहा। यमुना ने कहा आप हर साल इस दिन मेरे घर आया करो और इस दिन जो बहन अपने भाई का तिलक करेगी उसे आपका भय नहीं रहेगा। यमराज ने यमुना को आशीष प्रदान किया। कहते हैं इसी दिन से भाई दूज पर्व की शुरुआत हुई।

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एक कथा के अनुसार भैया दूज वाले दिन यमुना अपने भाई से मिलने गई थी और यमराज ने उनसे प्रसन्न होकर उसे वर दिया था कि जो व्यक्ति इस दिन यमुना में स्नान करेगा, वह यमलोक नहीं जाएगा है।
लोक कथा के अनुसार नरक चतुर्दशी एवं भैया दूज यमराज से संबंधित त्यौहार है और इस दिन यमराज को प्रसन्न करने के लिए पूजा पाठ हवन इत्यादि श्रद्धालुओं द्वारा किया जाता है। भारतीय लोक में यम के पूजा का विधि विधान है जो अपने आप में लोकजीवन, लोक कला, लोक साहित्य, लोक धर्म में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

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भारतीय मृत्यु के देवता यमराज की पूजा करते हैं यह परंपरा सिर्फ हमारे देश में ही कायम है और अनंत काल तक कायम रहेगी। दूज का पर्व भाई-बहन के प्यार का प्रतीक है। इस त्योहार को भाई टीका, यम द्वितीया आदि नामों से भी जाना जाता है। ये पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है। इस दिन बहनें अपने भाइयों को तिलक लगाकर उनकी लंबी उम्र और सुखी जीवन की कामना करती हैं।

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मान्यता है कि इस दिन मृत्यु के देवता यम अपनी बहन यमुना के बुलावे पर उनके घर भोजन के लिए आये थे।
बिहार में भाई दूज पर एक अनोखी परंपरा निभाई जाती है। इस दिन बहनें भाइयों को डांटती हैं और उन्हें भला बुरा कहती हैं और फिर उनसे माफी मांगती हैं। दरअसल यह परंपरा भाइयों द्वारा पहले की गई गलतियों के चलते निभाई जाती है। इस रस्म के बाद बहनें भाइयों को तिलक लगाकर उन्हें मिठाई खिलाती हैं।

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भाई दूज से जुड़ी भगवान श्री कृष्ण और सुभद्रा की कथा
एक पौराणिक कथा के अनुसार भाई दूज के दिन भगवान श्री कृष्ण नरकासुर राक्षस का वध कर द्वारिका लौटे थे। इस दिन भगवान कृष्ण की बहन सुभद्रा ने फल,फूल, मिठाई और अनेकों दीये जलाकर उनका स्वागत किया था। सुभद्रा ने भगवान श्री कृष्ण के मस्तक पर तिलक लगाकर उनकी दीर्घायु की कामना की थी।

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इस अवसर पर बहनों ने रोली, फल, फूल, सुपारी, चंदन और मिठाई की थाली सजाई। और चावल के मिश्रण से एक चौक तैयार कर किया जाता है-चावन से बने इस चौक पर भाई को शुभ मुहूर्त में बहनो ने भाई को तिलक लगा कर गोला, पान, बताशे, फूल, काले चने और सुपारी दिया और भाई की आरती उतारी उपहार भेंट किया।
और यमराज के नाम का चौमुखा दीपक जलाकर घर की दहलीज के बाहर रख कर दिन की मंगल कामना किया।

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चित्रगुप्त पूजा का हुआ आयोजन

हर्षवर्धन केसरवानी

रॉबर्ट्सगंज (सोनभद्र): चित्रगुप्त जयंती के अवसर पर जनपद मुख्यालय रॉबर्ट्सगंज में स्थित चित्रगुप्त मन्दिर में पूजा का अयोजन किया गया। इसी के अंतर्गत सोनभद्र जनपद के हैनीमैन कहे जाने वाले होम्योपैथ चिकित्सक, समाजसेवी डॉक्टर जयराम लाल श्रीवास्तव के आवास जय निवास पर चित्रगुप्त जयंती का आयोजन बड़ी हर्षोल्लास के साथ संपन्न हुआ। इस अवसर पर उपस्थित होम्योपैथ चिकित्सक डॉक्टर कुसमाकर श्रीवास्तव, दिवाकर श्रीवास्तव, प्रभाकर श्रीवास्तव, साधना श्रीवास्तव, विनीता श्रीवास्तव लक्ष्मी, श्रीवास्तव शुभम श्रीवास्तव, कुसंग श्रीवास्तव, डॉक्टर कृति, श्रीवास्तव, पंखुड़ी प्रभाकर, नितिशा श्रीवास्तव, दिव्यांशी श्रीवास्तव, समर्थ श्रीवास्तव सहित अन्य सजातीय बंधुओं, स्त्रियों, पुरुषों, बच्चों ने भाग लिया और भगवान चित्रगुप्त के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलित कर पूजा, पाठ, हवन इत्यादि का कार्यक्रम आयोजित हुआ।

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लोक मान्यताओं के अनुसार कायस्थ बंधु दीपावली के दिन अपनी कलम का प्रयोग बंद कर देते हैं और दीपावली के लगभग 24 घंटे बाद यमराज के लेखाकार चित्रगुप्त की पूजा अर्चना करते हैं इसके साथ-साथ कलम दवात की पूजा करते हुए लेखन कार्य करते हैं।

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जानकारी के अनुसार सोनभद्र नगर में चित्रगुप्त पूजा का आरंभ डॉ० जयराम लाल श्रीवास्तव, राजा शारदा महेश इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य रूद्र प्रसाद श्रीवास्तव, ललित मोहन श्रीवास्तव सहित अन्य कायस्थ बंधुओं ने मिलकर चित्रगुप्त पूजा का आरंभ किया था, तब से यह पूजा अनवरत रूप से चला आ रहा है, इस पूजा में कायस्थ बंधुओं के अलावा अन्य जाति, समुदाय के लोग शामिल हुए और भगवान चित्रगुप्त की पूजा, अर्चना, आरती इत्यादि में श्रद्धा पूर्वक भाग लिया।

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चित्रगुप्त पृथ्वी वासियों के अच्छे बुरे कर्मों का हिसाब रखने वाले हैं और मृत्यु के पश्चात उनके लेखनी अनुसार ही पृथ्वी वासियों का परलोक तय होता है और वही स्वर्ग और नर्क का निर्णय लेते हैं, चित्रगुप्त जयंती के अवसर पर लोगों ने एक दूसरे से मिलकर शुभकामनाएं दी और और लोक कल्याण सुख समृद्धि खुशहाली के लिए भगवान चित्रगुप्त से प्रार्थना किया।

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गोवर्धन पूजा का हुआ आयोजन

संस्कृति लाइव संवाददाता, सोनभद्र। जनपद मुख्यालय रॉबर्ट्सगंज में स्थिति बांके बिहारी मंदिर में गोवर्धन पूजा का भव्य आयोजन मथुरा वृंदावन के तर्ज पर किया गया ,इस अवसर पर बांके बिहारी जी को 56 प्रकार का भोग, मेवा, मिश्री, दही, दूध, मक्खन इत्यादि का भोग लगाया गया और उनकी विधिवत पूजा, आरती श्रद्धालुओं द्वारा किया गया।

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इस अवसर पर उपस्थित महिला श्रद्धालुओं ने बाके
बिहारी जी के सम्मान में विभिन्न प्रकार के लोकगीत ढोलक की थाप, करताल की ध्वनि पर गाया। ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान गोवर्धन इंद्र का घमंड चूर करने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठाया था और देवराज इंद्र द्वारा बरसाए गए जल से नगर वासियों को बाढ़ की विभीषिका से बचाया था और नागरिकों के जीवन की रक्षा किया था।

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बांके बिहारी मंदिर सहित नगर के राम भक्त हनुमान के मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा महाबली हनुमान को 56 प्रकार का भोग, लड्डू, मिष्ठान आदि का भोग लगाया गया इस अवसर पर संकट से बचने के लिए लोगों ने सुंदरकांड, हनुमान चालीसा का पाठ भी किया।

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गोवर्धन पूजा का आयोजन स्थानीय जनों ने अपने घरों में भी किया इस अवसर पर स्त्रियों ने लोकगीत, लोक कथाएं आदि का वाचन किया किया सोनभद्र नगर में यह परंपरा वर्षों से कायम है और भक्तजन अपनी श्रद्धा पूर्वक पूजा-पाठ के माध्यम से सुख समृद्धि की कामना करते हैं ।

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जनपद में बड़े ही धूमधाम से मनाया गया दीपावली का पर्व

हर्षवर्धन केसरवानी

रॉबर्ट्सगंज (सोनभद्र): दीपावली धन की देवी लक्ष्मी के सम्मान में विगत वर्षों की भांति इस वर्ष भी जनपद सोनभद्र में दीपावली का त्यौहार हर्षोल्लास के साथ मनाया गया।
इस अवसर पर जनपद वासियों ने जहां एक और अपने घरों की सफाई रंग रोगन करके अपने घरों व्यापारिक प्रतिष्ठानों को दीपमाला बिजली के झालरों मोतियों से सजाया वहीं दूसरी ओर उत्साही युवकों युवकों ने पटाखे फोड़कर अपनी खुशी का इजहार किया और मंदिरों में दीप प्रज्वलित कर आध्यात्मिक, सुख, शांति, स्वास्थ्य, दीर्घायु होने की मंगल कामना किया।

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भक्तजनों ने शुभ मुहूर्त में मां लक्ष्मी गणेश कुबेर मां काली की विधिवत पूजा पाठ किया।
पंच दिवसीय पर्व के अंतर्गत पंचांग के अनुसार अमावस्या यह दिन इस पर्व को मनाए जाने के संदर्भ में अनेकों की मिथक, पौराणिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, लोक कथाएं इत्यादि प्रचलित है।
इतिहासकार दीपक कुमार केसरवानी के अनुसार-“प्राचीन हिंदू ग्रन्थ रामायण में बताया गया है कि दीपावली को 14 साल के वनवास पश्चात भगवान राम व पत्नी सीता और उनके भाई लक्ष्मण अयोध्या लौटने की खुशी दीपावली पर्व का आयोजन अयोध्या वासियों द्वारा किया गया था तब से लेकर आज तक यह पर्व संपूर्ण विश्व रूप से मनाया जा रहा है।

महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महाकाव्य महाभारत अनुसार दीपावली को 12 वर्षों के वनवास व 1 वर्ष के अज्ञातवास के बाद पांडवों की वापसी के प्रतीक रूप बनाया जाता है।
लोक मान्यताओं के अनुसार-” दीपावली को भगवान विष्णु की पत्नी तथा उत्सव, धन और समृद्धि की देवी लक्ष्मी से जुड़ा हुआ हैं।

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दीपावली का पांच दिवसीय महोत्सव देवताओं और राक्षसों द्वारा सागर के मंथन से पैदा हुई लक्ष्मी के जन्म दिवस से शुरू होता है। दीपावली की रात वह दिन है जब लक्ष्मी ने अपने पति के रूप में विष्णु को चुना और फिर उनसे शादी की। लक्ष्मी के साथ-साथ भक्त बाधाओं को दूर करने के प्रतीक गणेश; संगीत, साहित्य की प्रतीक सरस्वती; और धन प्रबंधक कुबेर को प्रसाद अर्पित करते हैं।
लोक मान्यताओं के अनुसार दीपावली को विष्णु की वैकुण्ठ में वापसी के दिन के रूप में मनाते है। इस दिन लक्ष्मीजी प्रसन्न रहती हैं इनके पूजन से भक्तजन वर्ष भर मानसिक, शारीरिक दुखों से दूर सुखी रहते हैं।

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भारत के पूर्वी क्षेत्र उड़ीसा और पश्चिम बंगाल में लक्ष्मी की जगह काली की पूजा करते हैं, और इस त्योहार को काली पूजा कहते हैं। मथुरा और उत्तर मध्य क्षेत्रों में इसे भगवान कृष्ण से जुड़ा मानते हैं। अन्य क्षेत्रों में, गोवर्धन पूजा (या अन्नकूट) की दावत में कृष्ण के लिए 56 या 108 विभिन्न व्यंजनों का भोग लगाया जाता है और सांझे रूप से स्थानीय समुदाय द्वारा मनाया जाता है।

भारत के पश्चिम और उत्तरी भागों में दीवाली का त्योहार नये हिन्दू वर्ष की शुरुआत का प्रतीक हैं।

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दीप जलाने की प्रथा के पीछे अलग-अलग कारण या कहानियाँ हैं। राम भक्तों के अनुसार दीवाली वाले दिन अयोध्या के राजा राम लंका के अत्याचारी राजा रावण का वध करके अयोध्या लौटे थे। उनके लौटने कि खुशी में आज भी लोग यह पर्व मनाते है। कृष्ण भक्तिधारा के लोगों का मत है कि इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने अत्याचारी राजा नरकासुर का वध किया था। इस नृशंस राक्षस के वध से जनता में अपार हर्ष फैल गया और प्रसन्नता से भरे लोगों ने घी के दीए जलाए। एक पौराणिक कथा के अनुसार विंष्णु ने नरसिंह रूप धारणकर हिरण्यकश्यप का वध किया था।तथा इसी दिन समुद्रमंथन के पश्चात लक्ष्मी व धन्वंतरि प्रकट हुए।

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जैन धर्म की मान्यताओं के अनुसार-” चौबीसवें तीर्थंकर, महावीर स्वामी को इस दिन मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। इसी दिन उनके प्रथम शिष्य, गौतम गणधर को केवल ज्ञान प्राप्त हुआ था।

जैन समाज द्वारा दीपावली, महावीर स्वामी के निर्वाण दिवस के रूप में मनाई जाती है। महावीर स्वामी (वर्तमान अवसर्पिणी काल के अंतिम तीर्थंकर) को इसी दिन (कार्तिक अमावस्या) को मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। इसी दिन संध्याकाल में उनके प्रथम शिष्य गौतम गणधर को केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। अतः अन्य सम्प्रदायों से जैन दीपावली की पूजन विधि पूर्णतः भिन्न है।
सिख धर्म की मान्यताओं के अनुसार-“सिक्खों के लिए दीवाली महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसी दिन ही अमृतसर में 1577 में स्वर्ण मन्दिर का शिलान्यास हुआ था । इसके अलावा 1619 में दीवाली के दिन सिक्खों के छठे गुरु हरगोबिन्द सिंह जी को जेल से रिहा किया गया था।

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दीपावली पर्व को लेकर हिंदू धर्म विविध प्रकार की मान्यताएं हैं।
मुख्य रूप से यह त्यौहार भगवती लक्ष्मी के आगमन एवं लोक जन में सुख, समृद्धि, ऐश्वर्या की वृद्धि को लेकर मनाया जाता है और यह भी मान्यता है कि मां लक्ष्मी के आगमन के पश्चात घरों में दुख विपत्ति के प्रतीक दरिद्र को घर के बाहर खेदने(निकालने) का नियम है। महिलाएं इस कार्य को बड़े ही मनमोहक ढंग से करती हैं इसके पीछे यह भी मान्यता है कि दीपावली के दिन रात भर लोग अपने घरों, प्रतिष्ठानों को मां लक्ष्मी के आगमन के लिए द्वार खुले रहते हैं, ऐसी स्थिति में चोरी आदि जैसे आर्थिक अपराधों से बचने के लिए दरिद्र खेदने का नियम हमारे पूर्वजों ने बनाया है। इसके साथ ही साथ दीपावली की रात्रि में काजल पारने की परंपरा भी कायम है और इस दिन बनाए हुए काजल में औषधि गुण होते हैं जिससे आंखों की ज्योति बढ़ती है।

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दीपावली पर्व की शुभकामनाएं देने का दौर इंटरनेट पर पहले से ही शुरू हो गया था लेकिन नगरों, कस्बों, ग्रामीण इलाकों में दीपावली के दिन लोगों ने एक दूसरे के घर जाकर गले मिलकर दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं दिया और स्वादिष्ट मिष्ठान व्यंजनों का स्वाद लिया।

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विश्व का महापर्व दीपावली

दीपावली (संस्कृत : दीपावलिः = दीप + अवलिः = दीपकों की पंक्ति, या पंक्ति में रखे हुए दीपक) शरद ऋतु (उत्तरी गोलार्द्ध) में हर वर्ष मनाया जाने वाला एक प्राचीन सनातन त्यौहार है। दीपावली कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है दीपावली भारत के सबसे बड़े और सर्वाधिक महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। दीपावली दीपों का त्योहार है। आध्यात्मिक रूप से यह ‘अन्धकार पर प्रकाश की विजय’ को दर्शाता है।

भारतवर्ष में मनाए जाने वाले सभी त्यौहारों में दीपावली का सामाजिक और धार्मिक दोनों दृष्टि से अत्यधिक महत्त्व है। इसे दीपोत्सव भी कहते हैं। ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ अर्थात (हे भगवान!) मुझे अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाइए। यह उपनिषदों की आज्ञा है। इसे सिख, बौद्ध तथा जैन धर्म के लोग भी मनाते हैं। जैन धर्म के लोग इसे महावीर के मोक्ष दिवस के रूप में मनाते हैं[ तथा सिख समुदाय इसे बन्दी छोड़ दिवस के रूप में मनाता है।

माना जाता है कि दीपावली के दिन अयोध्या के राजा राम अपने चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात लौटे थे। अयोध्यावासियों का हृदय अपने परम प्रिय राजा के आगमन से प्रफुल्लित हो उठा था। श्री राम के स्वागत में अयोध्यावासियों ने घी के दीपक जलाए। कार्तिक मास की सघन काली अमावस्या की वह रात्रि दीयों की रोशनी से जगमगा उठी। तब से आज तक भारतीय प्रति वर्ष यह प्रकाश-पर्व हर्ष व उल्लास से मनाते हैं। भारतीयों का विश्वास है कि सत्य की सदा जीत होती है झूठ का नाश होता है। दीपावली यही चरितार्थ करती है- असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय।

दीपावली स्वच्छता व प्रकाश का पर्व है। कई सप्ताह पूर्व ही दीपावली की तैयारियाँ आरंभ हो जाती हैं। लोग अपने घरों, दुकानों आदि की सफाई का कार्य आरंभ कर देते हैं। घरों में मरम्मत, रंग-रोगन, सफेदी आदि का कार्य होने लगता है। लोग दुकानों को भी साफ-सुथरा कर सजाते हैं। बाजारों में गलियों को भी सुनहरी झंडियों से सजाया जाता है। दीपावली से पहले ही घर-मोहल्ले, बाजार सब साफ-सुथरे व सजे-धजे नज़र आते हैं।

फिजी
फिजी में, दीपावली एक सार्वजनिक अवकाश है और इस धार्मिक त्यौहार को हिंदुओं (जो फिजी की आबादी का करीब एक तिहाई भाग का गठन करते है) द्वारा एक साथ मनाया जाता है, और सांस्कृतिक रूप से फिजी के दौड़ के सदस्यों के बीच हिस्सा लेते है और यह बहुत समय इंतजार करने के बाद साल में एक बार आता है। यह मूल रूप से 19 वीं सदी के दौरान फिजी के तत्कालीन कालोनी में ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय उपमहाद्वीप से आयातित गिरमिटिया मजदूरों द्वारा मनाया है, सरकार की कामना के रूप में फिजी के तीन सबसे बड़े धर्मों, यानि, ईसाई धर्म, हिंदू धर्म और इस्लाम के प्रत्येक की एक अलग से धार्मिक सार्वजनिक छुट्टी करने की स्थापना के लिए यह 1970 में स्वतंत्रता पर एक छुट्टी के रूप में स्थापित किया गया था।

फिजी में, भारत में दीपावली समारोह से एक बड़े पैमाने पर मनाया जाने के रूप में दीपावली पर अक्सर भारतीय समुदाय के लोगों द्वारा विरोध किया जाता है, आतिशबाजी और दीपावली से संबंधित घटनाओं को वास्तविक दिन से कम से कम एक सप्ताह शुरू पहले किया जाता है। इसकी एक और विशेषता है कि दीपावली का सांस्कृतिक उत्सव (अपने पारंपरिक रूप से धार्मिक उत्सव से अलग), जहां फिजीवासियों भारतीय मूल या भारत-फिजीवासियों, हिंदू, ईसाई, सिख या अन्य सांस्कृतिक समूहों के साथ मुस्लिम भी फिजी में एक समय पर दोस्तों और परिवार के साथ मिलने और फिजी में छुट्टियों के मौसम की शुरुआत का संकेत के रूप में दीपावली का जश्न मनाते है। व्यावसायिक पक्ष पर, दीपावली कई छोटे बिक्री और मुफ्त विज्ञापन वस्तुएँ के लिए एक सही समय है। फिजी में दीपावली समारोह ने, उपमहाद्वीप पर समारोह से स्पष्ट रूप से अलग, अपने खुद के एक स्वभाव पर ले लिया है।

समारोह के लिए कुछ दिन पहले नए और विशेष कपड़े, साथ साड़ी और अन्य भारतीय कपड़ों में ड्रेसिंग के साथ सांस्कृतिक समूहों के बीच खरीदना, और सफाई करना, दीपावली इस समय का प्रतिक होता है। घरों को साफ करते हैं और तेल के लैंप या दीये जलाते हैं। सजावट को रंगीन रोशनी, मोमबत्तियाँ और कागज लालटेन, साथ ही धार्मिक प्रतीकों का उपयोग कर रंग के चावल और चाक से बाहर का एक रंगीन सरणी साथ गठन कर के घर के आसपास बनाते है। परिवार, दोस्तों और पड़ोसियों और घरों के लिए बनाए गये निमंत्रण पत्र खुल जाते है। उपहार बनते हैं और प्रार्थना या पूजा हिन्दुओं द्वारा किया जाता है। मिठाई और सब्जियों के व्यंजन अक्सर इस समय के दौरान खाया जाता है और आतिशबाजी दिवाली से दो दिन पहले और बाद तक में जलाए जाते है।

मॉरिशस
अफ्रीकी हिंदू बहुसंख्यक देश मॉरिशस में यह एक अधिकारिक सार्वजनिक अवकाश है।

रीयूनियन
रियूनियन में, कुल जनसंख्या का एक चौथाई भाग भारतीय मूल का है और संयुक्त राज्य अमेरिका

संयुक्त राज्य अमेरिका में कई शहरों में दीवाली की घटनाओं और समारोहों का आयोजन किया जाता है।
2003 में दीवाली को व्हाइट हाउस में पहली बार मनाया गया और पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज वॉकर बुश द्वारा 2007 में संयुक्त राज्य अमेरिका कांग्रेस द्वारा इसे आधिकारिक दर्जा दिया गया।2009 में बराक ओबामा, व्हाइट हाउस में व्यक्तिगत रूप से दीवाली में भाग लेने वाले पहले राष्ट्रपति बने। संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति के रूप में भारत की अपनी पहली यात्रा की पूर्व संध्या पर, ओबामा ने दीवाली की शुभकामनाएं बांटने के लिए एक आधिकारिक बयान जारी किया।

2009 में काउबॉय स्टेडियम में, दीवाली मेला में 100,000 लोगों की उपस्थिति का दावा किया था। 2009 में, सैन एन्टोनियो आतिशबाजी प्रदर्शन सहित एक अधिकारिक दीवाली उत्सव को प्रायोजित करने वाला पहला अमेरिकी शहर बन गया; जिसमे 2012 में, 15,000 से अधिक लोगों ने भाग लिया था।वर्ष 2011 में न्यूयॉर्क शहर, पियरे में, जोकि अब टाटा समूह के ताज होटल द्वारा संचालित हैं, ने अपनी पहली दीवाली उत्सव का आयोजन किया। संयुक्त राज्य अमेरिका में लगभग 3 लाख हिंदू हैं।

ब्रिटेन

लीसेस्टर, यूनाइटेड किंगडम में दीवाली की सजावट।[56]
ब्रिटेन में भारतीय लोग बड़े उत्साह के साथ दिवाली मनाते हैं। लोग अपने घरों को दीपक और मोमबत्तियों के साथ सजाते और स्वच्छ करते हैं। दीया एक प्रकार का प्रसिद्ध मोमबत्ति हैं। लोग लड्डू और बर्फी जैसी मिठाइयो को भी एक दूसरे में बाटते है, और विभिन्न समुदायों के लोग एक धार्मिक समारोह के लिए इकट्ठा होते है और उसमे भाग लेते हैं। भारत में परिवार से संपर्क करने और संभवतः उपहार के आदान प्रदान के लिए भी यह एक बहुत अच्छा अवसर है।

व्यापक ब्रिटिश के अधिक गैर-हिंदु नागरिकों को सराहना चेतना के रूप में दीपावली के त्योहार की स्वीकृति मिलना शुरू हो गया है और इस अवसर पर वो हिंदू धर्म का जश्न मानते है। हिंदुओ के इस त्यौहार को पूरे ब्रिटेन भर में मनाना समुदाय के बाकी लोगों के लिए विभिन्न संस्कृतियों को समझने का अवसर लाता है। पिछले दशक के दौरान प्रिंस चार्ल्स जैसे राष्ट्रीय और नागरिक नेताओं ने ब्रिटेन के में स्थित स्वामीनारायण मंदिर जैसे कुछ प्रमुख हिंदू मंदिरों में दीवाली समारोह में भाग लिया है, और ब्रिटिश जीवन के लिए हिंदू समुदाय के योगदान की प्रशंसा करने के लिए इस अवसर का उपयोग किया। वर्ष 2013 में प्रधानमंत्री डेविड कैमरन और उनकी पत्नी, दीवाली और हिंदू नववर्ष अंकन Annakut त्योहार मनाने के लिए Neasden में बीएपीएस स्वामीनारायण मंदिर में हजारों भक्तों के साथ शामिल हो गए।] 2009 के बाद से, दीवाली हर साल ब्रिटिश प्रधानमंत्री के निवास स्थान, 10 डाउनिंग स्ट्रीट, पर मनाया जा रहा है। वार्षिक उत्सव, गॉर्डन ब्राउन द्वारा शुरू करना और डेविड कैमरन द्वारा जारी रखना, ब्रिटिश प्रधानमंत्री द्वारा की मेजबानी की सबसे प्रत्याशित घटनाओं में से एक है।

लीसेस्टर (en:Leicester) भारत के बाहर कुछ सबसे बड़ी दीपावली समारोह के लिए मेजबान की भूमिका निभाता है।

न्यूज़ीलैंड
न्यूजीलैंड में, दीपावली दक्षिण एशियाई प्रवासी के सांस्कृतिक समूहों में से कई के बीच सार्वजनिक रूप से मनाया जाता है। न्यूजीलैंड में एक बड़े समूह दिवाली मानते हैं जो भारत-फ़ीजी समुदायों के सदस्य हैं जोकि प्रवासित हैं और वहाँ बसे हैं। दिवाली 2003 में, एक अधिकारिक स्वागत के बाद न्यूजीलैंड की संसद पर आयोजित किया गया था।[65] दीवाली हिंदुओं द्वारा मनाया जाता है। त्योहार अंधकार पर प्रकाश, अन्याय पर न्याय, अज्ञान से अधिक बुराई और खुफिया पर अच्छाई, की विजय का प्रतीक हैं। लक्ष्मी माता को पूजा जाता है। लक्ष्मी माता प्रकाश, धन और सौंदर्य की देवी हैं। बर्फी और प्रसाद दिवाली के विशेष खाद्य पदार्थ हैं।

नेपाल

नेपाल में, कई जानवरों को दीवाली उत्सव में शामिल किया जाता है। कौआ, कुत्ता (ऊपर), गाय और बैल को अपने त्योहार तिहार के दौरान खिलाया और सजाया भी जाता है।
दीपावली को “तिहार” या “स्वन्ति” के रूप में जाना जाता है। यह भारत में दीपावली के साथ ही पांच दिन की अवधि तक मनाया जाता है। परन्तु परम्पराओं में भारत से भिन्नता पायी जाती है। पहले दिन ‘काग तिहार’ पर, कौए को परमात्मा का दूत होने की मान्यता के कारण प्रसाद दिया जाता है। दूसरे दिन ‘कुकुर तिहार’ पर, कुत्तों को अपनी ईमानदारी के लिए भोजन दिया जाता है। काग और कुकुर तिहार के बाद ‘गाय तिहार’ और ‘गोरु तिहार’ में, गाय और बैल को सजाया जाता है। तीसरे दिन लक्ष्मी पूजा की जाती है। इस नेपाल संवत् अनुसार यह साल का आखिरी दिन है, इस दिन व्यापारी अपने सारे खातों को साफ कर उन्हें समाप्त कर देते हैं। लक्ष्मी पूजा से पहले, मकान साफ किया और सजाया जाता है; लक्ष्मी पूजा के दिन, तेल के दीयों को दरवाजे और खिड़कियों के पास जलाया जाता।

मलेशिया
दीपावली मलेशिया में एक संघीय सार्वजनिक अवकाश है। यहां भी यह काफी हद तक भारतीय उपमहाद्वीप की परंपराओं के साथ ही मनाया जाता है। ‘ओपन हाउसेस’ मलेशियाई हिन्दू (तमिल,तेलुगू और मलयाली)द्वारा आयोजित किये जाते हैं जिसमें भोजन के लिए अपने घर में अलग अलग जातियों और धर्मों के साथी मलेशियाई लोगों का स्वागत किया जाता है। मलेशिया में दीवाली का त्यौहार धार्मिक सद्भावना और मलेशिया के धार्मिक और जातीय समूहों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों के लिए एक अवसर बन गया है।

सिंगापुर

लिटल इंडिया में दीवाली की सजावट, सिंगापुर में हिंदुओं के लिए यह एक वार्षिक उत्सव है।
दीपावली एक राजपत्रित सार्वजनिक अवकाश है। अल्पसंख्यक भारतीय समुदाय (तमिल) द्वारा इसे मुख्य रूप से मनाया जाता है, यह आम तौर पर छोटे भारतीय जिलों में, भारतीय समुदाय द्वारा लाइट-अप द्वारा चिह्नित किया जाता है। इसके अलावा बाजारों, प्रदर्शनियों, परेड और संगीत के रूप में अन्य गतिविधियों को भी लिटिल इंडिया के इलाके में इस दौरान शामिल किया जाता है। सिंगापुर की सरकार के साथ-साथ सिंगापुर के हिंदू बंदोबस्ती बोर्ड इस उत्सव के दौरान कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन करता है।

श्री लंका
यह त्यौहार इस द्वीप देश में एक सार्वजनिक अवकाश के रूप में तमिल समुदाय द्वारा मनाया जाता है। इस दिन पर लोग द्वारा सामान्यतः सुबह के समय तेल से स्नान करा जाता है , नए कपड़े पहने जाते हैं, उपहार दिए जाते है, पुसै (पूजा) के लिए कोइल (हिंदू मंदिर) जाते हैं। त्योहार की शाम को पटाखे जलना एक आम बात है। हिंदुओं द्वारा आशीर्वाद के लिए व घर से सभी बुराइयों को सदा के लिए दूर करने के लिए धन की देवी लक्ष्मी को तेल के दिए जलाकर आमंत्रित किया जाता है। श्रीलंका में जश्न के अलावा खेल, आतिशबाजी, गायन और नृत्य, व भोज आदि का अयोजन किया जाता है।

ऑस्ट्रेलिया
ऑस्ट्रेलिया के मेलबॉर्न में, दीपावली को भारतीय मूल के लोगों और स्थानीय लोगों के बीच सार्वजनिक रूप से मनाया जाता है। फेडरेशन स्क्वायर पर दीपावली को विक्टोरियन आबादी और मुख्यधारा द्वारा गर्मजोशी से अपनाया गया है। सेलिब्रेट इंडिया इंकॉर्पोरेशन ने 2006 में मेलबोर्न में प्रतिष्ठित फेडरेशन स्क्वायर पर दीपावली समारोह शुरू किया था। अब यह समारोह मेलबॉर्न के कला कैलेंडर का हिस्सा बन गया है और शहर में इस समारोह को एक सप्ताह से अधिक तक मनाया जाता है।

पिछले वर्ष 56,000 से अधिक लोगों ने समारोह के अंतिम दिन पर फेडरेशन स्क्वायर का दौरा किया था और मनोरंजक लाइव संगीत, पारंपरिक कला, शिल्प और नृत्य और यारा नदी पर शानदार आतिशबाज़ीे के साथ ही भारतीय व्यंजनों की विविधता का आनंद लिया।

विक्टोरियन संसद, मेलबोर्न संग्रहालय, फेडरेशन स्क्वायर, मेलबोर्न हवाई अड्डे और भारतीय वाणिज्य दूतावास सहित कई प्रतिष्ठित इमारतों को इस सप्ताह अधिक सजाया जाता है। इसके साथ ही, कई बाहरी नृत्य का प्रदर्शन होता हैं। दीपावली की यह घटना नियमित रूप से राष्ट्रीय संगठनों एएफएल, क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया, व्हाइट रिबन, मेलबोर्न हवाई अड्डे जैसे संगठनों और कलाकारों को आकर्षित करती है। स्वयंसेवकों की एक टीम व उनकी भागीदारी और योगदान से यह एक विशाल आयोजन के रूप में भारतीय समुदाय को प्रदर्शित करता है।

अकेले इस त्योहार के दौरान एक सप्ताह की अवधि में भाग लेने आये लोगों की संख्या के कारण फेडरेशन स्क्वायर पर दिवाली को ऑस्ट्रेलिया में सबसे बड़े उत्सव के रूप में पहचाना जाता है।

ऑस्ट्रेलियाई बाहरी राज्य क्षेत्र, क्रिसमस द्वीप पर, दीपावली के अवसर पर ऑस्ट्रेलिया और मलेशिया के कई द्वीपों में आम अन्य स्थानीय समारोहों के साथ, एक सार्वजनिक अवकाश के रूप में मान्यता प्राप्त है।

भारतीय समाज में दीपावली की परंपरा

रंगोली
दीपावली के दिन भारत में विभिन्न स्थानों पर मेले लगते हैं।[66] दीपावली एक दिन का पर्व नहीं अपितु पर्वों का समूह है। दशहरे के पश्चात ही दीपावली की तैयारियाँ आरंभ हो जाती है। लोग नए-नए वस्त्र सिलवाते हैं। दीपावली से दो दिन पूर्व धनतेरस का त्योहार आता है। इस दिन बाज़ारों में चारों तरफ़ जनसमूह उमड़ पड़ता है। बरतनों की दुकानों पर विशेष साज-सज्जा व भीड़ दिखाई देती है। धनतेरस के दिन बरतन खरीदना शुभ माना जाता है अतैव प्रत्येक परिवार अपनी-अपनी आवश्यकता अनुसार कुछ न कुछ खरीदारी करता है।

इस दिन तुलसी या घर के द्वार पर एक दीपक जलाया जाता है। इससे अगले दिन नरक चतुर्दशी या छोटी दीपावली होती है। इस दिन यम पूजा हेतु दीपक जलाए जाते हैं। अगले दिन दीपावली आती है। इस दिन घरों में सुबह से ही तरह-तरह के पकवान बनाए जाते हैं। बाज़ारों में खील-बताशे, मिठाइयाँ, खांड़ के खिलौने, लक्ष्मी-गणेश आदि की मूर्तियाँ बिकने लगती हैं। स्थान-स्थान पर आतिशबाजी और पटाखों की दूकानें सजी होती हैं।

सुबह से ही लोग रिश्तेदारों, मित्रों, सगे-संबंधियों के घर मिठाइयाँ व उपहार बाँटने लगते हैं। दीपावली की शाम लक्ष्मी और गणेश जी की पूजा की जाती है। पूजा के बाद लोग अपने-अपने घरों के बाहर दीपक व मोमबत्तियाँ जलाकर रखते हैं। चारों ओर चमकते दीपक अत्यंत सुंदर दिखाई देते हैं। रंग-बिरंगे बिजली के बल्बों से बाज़ार व गलियाँ जगमगा उठते हैं। बच्चे तरह-तरह के पटाखों व आतिशबाज़ियों का आनंद लेते हैं। रंग-बिरंगी फुलझड़ियाँ, आतिशबाज़ियाँ व अनारों के जलने का आनंद प्रत्येक आयु के लोग लेते हैं। देर रात तक कार्तिक की अँधेरी रात पूर्णिमा से भी से भी अधिक प्रकाशयुक्त दिखाई पड़ती है।

दीपावली से अगले दिन गोवर्धन पर्वत अपनी अँगुली पर उठाकर इंद्र के कोप से डूबते ब्रजवासियों को बनाया था। इसी दिन लोग अपने गाय-बैलों को सजाते हैं तथा गोबर का पर्वत बनाकर पूजा करते हैं। अगले दिन भाई दूज का पर्व होता है।भाई दूज या भैया द्वीज को यम द्वितीय भी कहते हैं। इस दिन भाई और बहिन गांठ जोड़ कर यमुना नदी में स्नान करने की परंपरा है। इस दिन बहिन अपने भाई के मस्तक पर तिलक लगा कर उसके मंगल की कामना करती है और भाई भी प्रत्युत्तर में उसे भेंट देता है।

जेडदीपावली के दूसरे दिन व्यापारी अपने पुराने बहीखाते बदल देते हैं। वे दूकानों पर लक्ष्मी पूजन करते हैं। उनका मानना है कि ऐसा करने से धन की देवी लक्ष्मी की उन पर विशेष अनुकंपा रहेगी। कृषक वर्ग के लिये इस पर्व का विशेष महत्त्व है। खरीफ़ की फसल पक कर तैयार हो जाने से कृषकों के खलिहान समृद्ध हो जाते हैं। कृषक समाज अपनी समृद्धि का यह पर्व उल्लासपूर्वक मनाता हैं।

अंधकार पर प्रकाश की विजय का यह पर्व समाज में उल्लास, भाई-चारे व प्रेम का संदेश फैलाता है। यह पर्व सामूहिक व व्यक्तिगत दोनों तरह से मनाए जाने वाला ऐसा विशिष्ट पर्व है जो धार्मिक, सांस्कृतिक व सामाजिक विशिष्टता रखता है। हर प्रांत या क्षेत्र में दीवाली मनाने के कारण एवं तरीके अलग हैं पर सभी जगह कई पीढ़ियों से यह त्योहार चला आ रहा है। लोगों में दीवाली की बहुत उमंग होती है।

लोग अपने घरों का कोना-कोना साफ़ करते हैं, नये कपड़े पहनते हैं। मिठाइयों के उपहार एक दूसरे को बाँटते हैं, एक दूसरे से मिलते हैं। घर-घर में सुन्दर रंगोली बनायी जाती है, दिये जलाए जाते हैं और आतिशबाजी की जाती है। बड़े छोटे सभी इस त्योहार में भाग लेते हैं। अंधकार पर प्रकाश की विजय का यह पर्व समाज में उल्लास, भाई-चारे व प्रेम का संदेश फैलाता है। हर प्रांत या क्षेत्र में दीवाली मनाने के कारण एवं तरीके अलग हैं पर सभी जगह कई पीढ़ियों से यह त्योहार चला आ रहा है। लोगों में दीवाली की बहुत उमंग होती है।

दीपावली पूजा

सबसे पहले चौकी पर लाल कपड़ा बिछाये लाल कपडे के बीच में गणेश जी और लक्ष्मी माता की मूर्तियां रखे। लक्ष्मी जी को ध्यान से गणेश जी के दाहिने तरफ ही बिढाये और दोनों मूर्तियों का चेहरा पूरब या पश्चिम दिशा की तरफ रखे। अब दोनों मूर्तियों के आगे थोड़े रुपए इच्छा अनुसार सोने चांदी के आभुश्ण और चांदी के 5 सिक्के भी रख दे। यह चांदी के सिक्के ही कुबेर जी का रूप है। लक्ष्मी जी की मूर्ति के दाहिनी ओर अछत से अष्टदल बनाएं यानी कि आठ दिशाएं उंगली से बनाए बीच से बाहर की ओर फिर जल से भरे कलश को उस पर रख दे। कलश के अंदर थोड़ा चंदन दुर्व पंचरत्न सुपारी आम के या केले के पत्ते डालकर मौली से बंधा हुआ नारियल उसमें रखें। पानी के बर्तन यानि जल पात्र में साफ पानी भरकर उसमें मौली बांधे और थोड़ा सा गंगाजल उसमें मिलाएं।

इसके बाद चौकी के सामने बाकी पूजा सामग्री कि थालीया रखे। दो बडे दिये मे देसी घी डालकर और ग्यारह छोटे दिये मे सरसो का तेल भर तैयार करके रखे। घर के सभी लोगों के बैठ्ने के लिए चौकी के बगल आसन बना ले। ध्यान रखें ये सभी काम शुभ मुहुरत शुरू होने से पहले ही करने होगे। शुभ मुहुरत शुरू होने से पहले घर के सभी लोग नहा कर नए कपड़े पहन कर तैयार हो जाएं और आसन ग्रह्ण करें।

दीपावली का पर्व बराहो राशि के जातकों के लिए लाभकारी होगा



मेष राशि

मेष राशि के जातकों को दिवाली पर चांदी के बर्तन खरीदने चाहिए। यह उनके लिए बहुत ही लाभकारी होगा। आज के दिन मेष राशि के जातक अगर कोई प्रॉपर्टी खरीदना चाहते हैं तो इनके लिए बहुत शुभ रहेगा।

वृष राशि

वृष राशि के जातकों को दिवाली पर सोने, चांदी या हीरे के वस्तु या आभूषण खरीदना बहुत ही शुभ है। इनमें यदि आप हीरे के आभूषण लेते हैं तो विशेष लाभ प्राप्त होगा। वृष राशि का स्वामी ग्रह शुक्र है जो सुख, संपन्नता और वैभव का प्रतिनिधित्व करते हैं।

मिथुन राशि

मिथुन राशि के जातकों को सोने के आभूषण खरीदने चाहिए। वे हरे रंग का कोई घर का सामान भी ले सकते हैं। यदि आप चांदी के गणपति खरीदकर लाते हैं तो उनके लिए धन संपदा के मार्ग खुल जाते हैं। ऐसा करने से घर में सुख- संपत्ति आती है।


कर्क राशि

कर्क राशि के जातक चांदी का श्रीयंत्र दिवाली के दिन ले सकते हैं। इस साल उन पर देवी महालक्ष्मी की कृपा बनी रहेगी। यदि वे चांदी के कलश या चांदी की शिव पार्वती की मूर्ति लेते हैं तो उनके लिए अत्यंत मंगलकारी रहेगा।

सिंह राशि

सिंह राशि के जातकों के लिए सोना खरीदना अति उत्तम माना जाता है। दिवाली पर सोने की वस्तु जैसे सोने के सिक्के, सोने के गहने और सोने के बर्तन खरीदना अत्यंत शुभ रहेगा। यदि जातक सोने के सामान नहीं खरीद सकते हैं तो वे तांबे के बर्तन इस दिन अवश्य खरीदें। इससे आपको अत्यंत लाभ होगा।

कन्या राशि

कन्या राशि के जातक कांसे या हाथी-दांत से बनी चीजों की खरीद करें। इन वस्तुओं की खरीदारी करने से धन में वृद्धि होगी। आप दुर्गा मां के लिए चांदी के छत्र अपने घर ला सकते हैं। इससे घर में धन की कमी नहीं होगी और घर में खुशहाली आएगी।

तुला राशि

इस दिवाली को शुभ और फलदायी बनाने के लिए तुला राशि के जातक सौंदर्य से संबंधित वस्तुएं खरीदें। आप इत्र, सोने-चांदी के आभूषण खरीद सकते हैं। आप अपने या परिवार के किसी सदस्य के लिए गुलाबी रंग के वस्त्र खरीद सकते हैं। आप मां लक्ष्मी के लिए श्रृंगार का सामान भी खरीद सकते हैं। इससे आपको सुख- समृद्धि की प्राप्ति होगी और माता लक्ष्मी की कृपा आप पर बनी रहेगी।

वृश्चिक राशि

वृश्चिक राशि वालों को दिवाली पर सोने के गहने और सिक्के या फिर तांबे के बर्तन खरीदने चाहिए। इसके अलावा आप हनुमानजी के लिए चांदी का गदा या चांदी का वर्क भी ला सकते हैं। इससे आपको बहुत लाभ होगा।

धनु राशि

धनु राशि के जातक दिवाली के दिन वाहन खरीद सकते हैं। चांदी धनु राशि वालों के लिए अत्यंत शुभ मानी गई है। इस दिन आप चांदी के आभूषण, बर्तन, चांदी के सिक्के भी खरीद सकते हैं इससे घर में संपन्‍नता आएगी।

मकर राशि

मकर राशि के जातकों के लिए दिवाली के दिन वाहन और सजावट की चीजें खरीदना शुभ रहेगा। आप चांदी और स्टील के बर्तन भी खरीद सकते हैं।

कुंभ राशि

कुंभ राशि का स्वामी शनि है। ऐसे में आपके लिए चांदी और स्टील के बर्तन की खरीद करना शुभ और अत्यधिक फलदायी होगा। आज आप मां कालिका के लिए चांदी के मांग टीका भी खरीद सकते हैं। इससे अत्यंत लाभ प्राप्त होगा।

मीन राशि

मीन राशि का स्वामी ग्रह गुरु है। मीन राशि के जातक इस दिवाली चांदी के बर्तन या आभूषण खरीदें। चांदी मीन राशि वालों के लिए अत्यंत शुभ मानी गई है। आज के दिन आप अपने या परिवार के किसी सदस्य की लिए पीले वस्त्र सकते हैं। विष्णु भगवान को आप पीले प्रसाद चढ़ाएं इससे भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होगा।

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