कुशाग्र कौशल शर्मा
इस बार भारत अपना 78 वां स्वतंत्रता दिवस मनाने की दिशा में अग्रसर है। जब लॉर्ड माउंटबेटन ने पहली बार भारत की स्वतंत्रता अर्थात यह कहे कि भारत के अपने संविधान होने की इच्छा जताई थी तब भारत आर्थिक रूप से कमजोर अविकसित, टूटा-फूटा, जरूरतमंद देश था।

भारत को अपने स्वतंत्रता के बाद कई मुद्दों का सामना करना पड़ा जिसमें अशिक्षा ,गरीबी ,भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता अपने चरम सीमा पर थी। हालांकि स्वतंत्रता सेनानियों ने उस समय में मौजूद संसाधनों के माध्यम से अपने लेखों से और समाचार पत्रों से लोगों को जागरूक करने की कोशिश की थी और बहुत हद तक सफलता भी हासिल कर ली थी।

लेकिन जिस शिक्षित भारत का सपना लिए हमारे स्वतंत्रता सेनानी चले थे वह अभी भी हमारी पहुंच से कोसो दूर था। प्राचीन काल से ही भारत शिक्षा का केंद्र रहा था ।नालंदा विश्वविद्यालय भारत के प्राचीनतम विश्वविद्यालय में से एक विद्यालय था जहां देश-विदेश के छात्र-छात्राएं भारत के प्राचीनतम शिक्षा प्रणाली का विधि और ध्यान पूर्वक अध्ययन करते थे। इस बात से हमें यह ज्ञात होता है कि भारत में शिक्षा को प्राचीन काल से अत्यधिक महत्व दिया गया है।

भारत में आजादी के बाद से अशिक्षा को दूर करने के लिए अलग-अलग सरकारों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हमारे संविधान के नीति निर्माताओं ने शिक्षा को विशेष महत्व देते हुए हमारे संविधान के राज्य के नीति निर्देशक तत्व के अनुच्छेद 45 में यह निर्धारित किया था कि सरकार को संविधान के लागू होने के 10 वर्षों के भीतर 14 वर्ष की आयु के सभी बच्चों के लिए निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए। बाद में अनुच्छेद 45 को संशोधित करते हुए आयु सीमा को 10 से घटाकर 6 वर्ष तक के आयु के बच्चों के लिए कर दिया गया।

1947 में भारत की जनसंख्या 340 मिलियन थी और साक्षरता दर सिर्फ 12% थी ।आज जनसंख्या लगभग 1.4 बिलियन है और साक्षरता दर 74.04 प्रतिशत है। यद्यपि भारत ने साक्षरता दर के मामले में उल्लेखनीय प्रगति की है । यहां सवाल यह उठता है की मात्र साक्षरता दर का बढ़ जाना ही भारत के युवाओं का भविष्य सुनिश्चित करता है। इधर कुछ वर्षों से पेपर लीक गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है पिछले 7 वर्षों में 70 पेपर लीक की घटनाएं सामने आई है।

जिससे स्वतंत्र भारत के युवाओं के भविष्य पे आकाशीय बादल मंडराते नजर आ रहे हैं। आज भी भारत में युवाओं के बीच सरकारी नौकरी पाने की एक ओढ़ सी मची हुई है और लीक होता पेपर उन्हें आर्थिक ,मानसिक और शारीरिक तौर पर दुर्बलता की ओर धकेल रहा है। राजनीतिक संबंध रखने वाले संगठित अपराधियों द्वारा नकल को बढ़ावा दिया जाता है जिसमें कानून को लागू करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

जिससे कि छात्रों का परीक्षाओं की निष्पक्षता और विश्वसनीय पर भरोसा कम होता नजर आ रहा है। परीक्षा परिणाम पर विवाद और विरोध ध्यान दिलाते हैं कि परीक्षा प्रणाली में आ रही समस्याओं का प्रभावी रूप से समाधान किया जाना चाहिए। हाल ही में इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए सरकार द्वारा लोक परीक्षा (कदाचार रोकथाम) विधेयक 2024 को लोकसभा में पेश किया गया जिसका उद्देश्य लोक परीक्षा प्रणाली में अधिक पारदर्शिता निष्पक्षता एवं विश्वसनीय लाने के लिए अनुचित साधनों को रोकना था।

प्राचीन काल में दुनिया का शिक्षा का केंद्र होने से लेकर आज दुनिया का आईटी केंद्र बनने तक भारत ने एक लंबा सफल तय किया है। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर हमें शिक्षा में समानता का अधिकार, पारदर्शिता और जिम्मेदारी के महत्व को याद रखना चाहिए तभी हम भ्रष्टाचार के बंधनों से स्वतंत्र हो सकते हैं और सही मायनो में इस देश के छात्रों के सपनों को स्वतंत्रता से आसमान की ऊंचाइयों को छूता देख सकते हैं।































