परंपरागत रूप से मनाई गई धन्वंतरि जयंती

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  • परंपरागत रूप से मनाई गई धन्वंतरि जयंती


सोनभद्र। जनपद मुख्यालय रॉबर्ट्सगंज में संचालित श्री बैधनाथ आयुर्वेद भवन एंव कानोडिया औषघालय के संयुक्त तत्वाघान मे श्री घनवन्तरी जयन्ती परंपरागत रूप से मनाई गई।

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इस अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार एवं रामायण कलचर मैपिंग योजना के डिस्ट्रिक्ट कोऑर्डिनेटर दीपक कुमार केसवानी ने कहा कि-धन्वंतरि जी को भगवान विष्णु का रूप कहा जाता है जिनकी चार भुजायें हैं। उपर की दोंनों भुजाओं में शंख और चक्र धारण किये हुये हैं। जबकि दो अन्य भुजाओं मे से एक में जलूका और औषध तथा दूसरे मे अमृत कलश लिये हुये हैं। इनका प्रिय धातु पीतल माना जाता है।

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इसीलिये धनतेरस को पीतल आदि के बर्तन खरीदने की परम्परा भी है। इन्‍हे आयुर्वेद की चिकित्सा करनें वाले वैद्य आरोग्य का देवता कहते हैं। इन्होंने ही अमृतमय औषधियों की खोज की थी। इनके वंश में दिवोदास हुए जिन्होंने ‘शल्य चिकित्सा’ का विश्व का पहला विद्यालय काशी में स्थापित किया जिसके प्रधानाचार्य सुश्रुत बनाये गए थे।

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सुश्रुत दिवोदास के ही शिष्य और ॠषि विश्वामित्र के पुत्र थे। उन्होंने ही सुश्रुत संहिता लिखी थी। सुश्रुत विश्व के पहले सर्जन (शल्य चिकित्सक) थे। दीपावली के अवसर पर कार्तिक त्रयोदशी-धनतेरस को भगवान धन्वन्तरि की पूजा करते हैं। त्रिलोकी के व्योम रूपी समुद्र के मंथन से उत्पन्न विष का महारूद्र भगवान शंकर ने विषपान किया, धन्वन्तरि ने अमृत प्रदान किया और इस प्रकार काशी कालजयी नगरी बन गयी।

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आयुर्वेदाचार्य डॉ केके सिंह विचार व्यक्त करते हुए कहा कि-“श्री धन्वन्तरि हिन्दू मान्यता के अनुसार ये भगवान विष्णु के अवतार हैं जिन्होंने आयुर्वेद प्रवर्तन किया। इनका पृथ्वी लोक में अवतरण समुद्र मन्थन के समय हुआ था। शरद पूर्णिमा को चन्द्रमा, कार्तिक द्वादशी को कामधेनु गाय, त्रयोदशी को धन्वन्तरि, चतुर्दशी को काली माता और अमावस्या को भगवती महालक्ष्मी जी का सागर से प्रादुर्भाव हुआ था। इसीलिये दीपावली के दो दिन पूर्व धनतेरस को भगवान धन्वन्तरि का अवतरण धनतेरस के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन इन्होंने आयुर्वेद का भी प्रादुर्भाव किया था।

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आचार्य कृपाशंकर पांडे ने धनतेरस की आध्यात्मिक व्याख्या करते हुए कहा कि-“सुश्रुत का मत है कि ब्रह्माजी ने पहली बार एक लाख श्लोक के आयुर्वेद का प्रकाशन किया था जिसमें एक सहस्र अध्याय थे। उनसे प्रजापति ने पढ़ा। तदुपरान्त उनसे अश्विनी कुमारों ने पढ़ा और उन से इन्द्र ने पढ़ा। इन्द्रदेव से धन्वन्तरि ने पढ़ा और उन्हें सुन कर सुश्रुत मुनि ने आयुर्वेद की रचना की। भावप्रकाश के अनुसार आत्रेय आदि मुनियों ने इन्द्र से आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त कर उसे अग्निवेश तथा अन्य शिष्यों को दिया।

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इसके उपरान्त अग्निवेश तथा अन्य शिष्यों के तन्त्रों को संकलित तथा प्रतिसंस्कृत कर चरक द्वरा ‘चरक संहिता’ के निर्माण का भी आख्यान है। वेद के संहिता तथा ब्राह्मण भाग में धन्वंतरि का कहीं नामोल्लेख भी नहीं है। महाभारत तथा पुराणों में विष्णु के अंश के रूप में उनका उल्लेख प्राप्त होता है। उनका प्रादुर्भाव समुद्रमन्थन के बाद निर्गत कलश से अण्ड के रूप मे हुआ। समुद्र के निकलने के बाद उन्होंने भगवान विष्णु से कहा कि लोक में मेरा स्थान और भाग निश्चित कर दें।

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इस पर विष्णु ने कहा कि यज्ञ का विभाग तो देवताओं में पहले ही हो चुका है अत: यह अब सम्भव नहीं है। देवों के बाद आने के कारण तुम (देव) ईश्वर नहीं हो। अतः तुम्हें अगले जन्म में सिद्धियाँ प्राप्त होंगी और तुम लोक में प्रसिद्ध होगे। तुम्हें उसी शरीर से देवत्व प्राप्त होगा और द्विजातिगण तुम्हारी सभी तरह से पूजा करेंगे। तुम आयुर्वेद का अष्टांग विभाजन भी करोगे। द्वितीय द्वापर युग में तुम पुनः जन्म लोगे इसमें कोई सन्देह नहीं है।

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श्री बैद्यनाथ आयुर्वेद भवन नई दिल्ली के सीनियर मैनेजर रितेश कुमार ने धनतेरस की महत्व पर चर्चा करते हुए कहा कि-धनवंतरी महाराज को आयुर्वेद का जनक माना जाता है और इससे संबंधित अनेकों कथाएं भारतीय ग में उल्लेखित है एक अन्य कथा के अनुसार पुत्रकाम काशिराज धन्व की तपस्या से प्रसन्न हो कर अब्ज भगवान ने उसके पुत्र के रूप में जन्म लिया और धन्वन्तरि नाम धारण किया। धन्व काशी नगरी के संस्थापक काश के पुत्र थे।

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वे सभी रोगों के निवराण में निष्णात थे। उन्होंने भरद्वाज से आयुर्वेद ग्रहण कर उसे अष्टांग में विभक्त कर अपने शिष्यों में बाँट दिया। इसी आयुर्वैदिक ज्ञान परंपरा के आधार पर और श्री वैधनाथ आयुवेद भवन विश्व की सबसे प्राचीन आयुर्वेद कम्पनी गुण वत्ता युक्त दवाई का निमाण करती है |

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समाजसेवी पंकज कनोडिया ने कहा कि-वैदिक काल में जो महत्व और स्थान अश्विनी को प्राप्त था वही पौराणिक काल में धन्वन्तरि को प्राप्त हुआ। जहाँ अश्विनी के हाथ में मधुकलश था वहाँ धन्वन्तरि को अमृत कलश मिला, क्योंकि विष्णु संसार की रक्षा करते हैं अत: रोगों से रक्षा करने वाले धन्वन्तरि को विष्णु का अंश माना गया। विषविद्या के सम्बन्ध में कश्यप और तक्षक का जो संवाद महाभारत में आया है, वैसा ही धन्वन्तरि और नागदेवी मनसा का ब्रह्मवैवर्त पुराण में आया है। उन्हें गरुड़ का शिष्य कहा गया है। इस समय आयुर्वद के प्रति लोगो का काफी रुझान बढा है।

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कार्यक्रम का शुभारंभ आचार्य कृपा शंकर पाण्डे द्वारा विधिवत पूजन प्रतिष्ठIन के आधिष्ठाता विजय कानोडिया द्वारा कराया गया ।
श्री बैद्यनाथ आयुर्वेद भवन प्राइवेट लिमिटेड नई दिल्ली के एरिया मैनेजर रितेश कुमार जायसवाल नेआये हुए सभी अतिथियो का स्वागत किया।

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कार्यक्रम मे कम्पनी के एस०ओ० इन्द्र कुमार दूबे, इन्देसेन सिंह, अशोक पाण्डे, प्रशान्त शुक्ला, बालेशवर सिह, डॉ संजय सिह, वैघ चक्रधारी शुक्ला, सुयश कानोडिया, विनोद कानोडिया, अनिल सिंह, संस्कार, रविन्द्र सिंह, बालेश्वर सिंह आदि आयुर्वेद चिकित्सक, समाजसेवी, पत्रकार उपस्थित थे। कार्यक्रम के अंत में कंपनी से आए हुए एवं कनोडिया औषधालय के अधिष्ठाता विजय कुमार कनोडिया सहयोगी पंकज कनोडिया ने उपस्थित अतिथियों को उपहार भेंट किया।

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संस्कृति LIVE द्वारा प्रकाशित

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