ग्रामवासी जी और आंदोलन

    दीपक कुमार केसरवानी (इतिहासकार )

    सोनभद्र। ग्रामवासी जी का संबंध सोनभद्र जनपद से पराधीनता काल से रहा है।
    आज का सोनभद्र कल के मिर्जापुर का दक्षिणांचल के नाम से जाना जाता था और इस क्षेत्र में रॉबर्ट्सगंज एवं दुद्धी तहसील कायम थी, सन 1942 में जब पूरे देश की महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन की धूम मची हुई थी उस समय हमारा मिर्जापुर जनपद अंग्रेजो के खिलाफ आंदोलित हो उठा।

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    उस समय इस जनपद में निवास करने वाले देशभक्त भारत माता की स्वतंत्रता की वेदी पर अपना सिर कटाने के लिए कफन बांधकर अंग्रेजो के खिलाफ लोहा लेने के लिए निकल पड़े थे।
    इसी वर्ष जनपद में स्वतंत्रता की अलख जगाने के लिए जिला कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, ग्रामवासी साप्ताहिक समाचार पत्र के संस्थापक संपादक, निडर, निर्भीक, जेलयात्री ब्रज भूषण दास मिश्र “ग्रामवासी”जिला कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष चुने गये।
    मई सन 1942 में जिला कांग्रेस कमेटी की बैठक इनकी अध्यक्षता में आयोजित हुई‌।

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    इस बैठक में आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र दुद्धी से किस्मत राम, शनिचर राम खरवार, रामेश्वर राम खरवार 150 मील की पदयात्रा कर दुद्धी क्षेत्र की व्यथा- कथा सुनाने आए थे।
    इस क्षेत्र में भुखमरी, बेकारी, पुलिस, साहूकारों, अंग्रेजों के नुमाइंदों द्वारा आदिवासियों की जमीन जायजात को जबरदस्ती हड़प लेना, आदिवासी महिलाओं का यौन शोषण,लाह के ठेकेदारो लूटपाट उस समय यहां पर एक विदेशी कंपनी काफी समय से लाह का कारोबार करती थी, लाह की छिलाई में लगे हुए मजदूरों को बहुत कम मजदूरी दी जाती थी, जब वह एतराज करते थे तो कंपनी के कर्मचारियों द्वारा मजदूरों के साथ मारपीट की जाती थी, महिला श्रमिकों के साथ यौन शोषण के साथ-साथ उनसे रात भर लाह की छिलाई 2-4 पैसे मजदूरी में कराई जाती थी। चार पैसे में मजदूरों से 12 कोस लाह की ढुलाई कराई जाती थी।
    दुद्धी अंग्रेजों का बफर स्टेट था और यहां के तहसीलदार को जिला अधिकारी का प्रतिनिधि माना जाता था।

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    80 किलोमीटर क्षेत्रफल वाले दुद्धी तहसील में मात्र दो मिडिल स्कूल, गहरवार, दुद्धी में थाना कायम था। अस्पताल का तो नामोनिशान नहीं था और इस क्षेत्र में अंधविश्वास इतना ज्यादा व्याप्त था कि बीमार होने पर झाड़-फूंक, जादू- टोना, ओझाई- भुताई कर बीमारी का इलाज करते थे, कुछ लोगों का इलाज ओझा मरीजों को दाग कर करते थे। इन आदिवासियों के मध्य अंधविश्वास इस कदर व्याप्त था कि नई बहू के आने पर अगर ससुराल में कोई घटना घटित हो जाती थी तो बहू को भूतही, टोनहींन मानकर उसको प्रताड़ित किया जाता था और उसके बदन को गोद कर उसके खून से चावल रंगा जाता था उसका बाल मुंडवा कर उसके सिर पर मुर्गा बिठाकर चावल रखकर मुर्गे से चुराते थे, लोहे की जंजीर से उसकी पिटाई करते थे, कभी-कभी इस प्रताड़ना से बहुएं मर जाती थी।

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    दुद्धी प्रतिनिधियों की करूंण कहानी सुनकर ग्रामवासी दादा द्रवित हो उठे और उन्होंने दुद्धी यात्रा करने का निश्चय किया, बद्रीनाथ के समान कठिन दुद्धी यात्रा
    आदिवासियों के उद्धार, समस्याओं को सरकार तक पहुंचाने दुद्धी की यात्रा आवश्यक हो गई थी और इसी सभा में ग्राम वासी दद्दा के नेतृत्व में सेनानियों की एक टोली बनाई गई।
    विंध्य संस्कृति शोध समिति उत्तर प्रदेश ट्रस्ट के निदेशक दीपक कुमार केसरवानी द्वारा लिए गए साक्षात्कार में ग्रामवासी दादा ने बताया था कि-” जून महीने की चिलचिलाती धूप में पैदल पदयात्रा करना, जंगली पहाड़ों के बीच बिना सड़क और रास्ते पर चलना आसान काम नहीं था, अकाल पड़ जाने की वजह से लोग दाने पानी को मोहताज थे, मिर्जापुर मुख्यालय से 150 मील जंगली हिंसक, पशुओं, घने जंगलों से भरा था, दुद्धी के रास्ते में 9 कोसवा 16 कोसवा घना जंगल जहां पर सूर्य की रोशनी भूमि पर नहीं पड़ती थी, जंगली पशु शेर, बाघ, भालू, चीता, भेड़िया, सूअर आदि हिंसक जानवरों का बोलबाला था, इसके अलावा हिरण, सांभर, चीतल, खरगोश, पशुओं एवं विषैले जीव- जंतुओं से यह जंगल भरा पड़ा था,इसके अलावा जंगल महुआ, कोहरा, महुआ का बीज, मकई, घास रस्सी बनाने के लिए, कोडरया(लकड़ी का खिलौना बनाने के लिए) धवली पत्ती (चमडा पकाने के लिए) जानवरों की हड्डी, सिंह, नाखून विविध प्रकार की जंगली जड़ी-बूटी बैल गाड़ियों पर लादकर झुंड में अहरौरा मंडियों में लाते थे और अपनी जीविका चलाते थे।

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    L दुद्धी पदयात्रा के अलावा दूसरा जाने का मार्ग था रेल मिर्जापुर से गढ़वा वहां से बस द्वारा बिल्ढमगंज तक पहुंचा जा सकता था, मैंने निर्धारित तिथि पर इसी मार्ग से दुद्धी यात्रा का संकल्प लिया।
    मेरी इस यात्रा के बारे में न जाने कैसे बने ब्रिटिश सरकार भनक लग गई और उसने मेरे पीछे दो कांस्टेबल को लगा दिये। यह दोनों कांस्टेबल मुझे बिल्ढमगंज में मिले और सारी यात्रा के दौरान यह मेरे साथ लगे रहे और सारी रिपोर्ट सरकार को भेजते रहें।
    दुद्धी पहुंचने पर मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि मैं किसी दूसरी दुनिया में आ गया हूं, जहां पर जंगल, पहाड़, नंग- धड़ंग, आदिवासी काली- काली सूरत नंगे बदन कमर में एक रस्सी बांधकर बी विहटी लगाएं, मोटे होंठ, चपटी नाक वाली पुरुष, काली- काली महिलाएं गर्दन के नीचे से घुटने तक मोटी गाढ़े की धोती लपेटे कांधे पर उल्टा पल्ला डालें, देहभर में गोदना गोदवाये बिखरे बाल ऐसी सूरत यदि रात में अचानक सामने आ जाए तो आदमी डर जाए। ऐसे आदिमानव के वंश धरो का दर्शन पहली बार मुझे पगपग पर हो जाता था।
    गढ़वा रोड से बिल्ढम गंज की दूरी लगभग 30 किलोमीटर की है और रास्ते भर में आंखें फाड़ फाड़कर आदिवासियों को देखते, निहारते कड़ी धूप में पहाड़ों- नदियों से होते हुए मैं अपने साथियों के साथ चल रहा था हमारी टोली के साथ कुछ स्थानीय निवासी भी थे उन्होंने बताया कि बिल्ढमगंज का प्राचीन नाम मूडीसेमर है और आज भी इसी नाम से इसे पुकारा जाता है, यहां पर स्थानीय निवासी व्यापार या कारोबार में नहीं है बल्कि पड़ोसी राज्य बिहार से आए हुए बनिए और व्यापारी सारा धंधा करते थे। इस शहर को मिर्जापुर के जिलाधिकारी पी०बिल्ढम ने बसाया था और उस समय बिहार के लोगों को बुलाकर इस नगर में बसाया था, यहा पर बसे हुए लोग छोटा-मोटा व्यापार करके अपना जीविकोपार्जन करते थे और स्थानीय जंगली उपजो अहरौरा मंडी में बेच कर वहां से अपने दैनिक प्रयोग की वस्तुएं खरीद कर ले आते थे।

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    दुद्धि के प्रतिनिधियों द्वारा जिस मार्मिक परिदृश्य का वर्णन कांग्रेस कमेटी की बैठक में किया गया था, वह दृश्य मुझे रास्ते भर देखने को मिला जब मैं बिल्ढमगंज पहुंचा तो उस दिन बाजार का दिन था गांव से जो भी स्त्री-पुरुष आए थे, उनमें 75% मुझे ऐसे लोग दिखाई पड़े जिनकी मैं कल्पना नहीं कर सकता था, बाजार में लाह, महुआ का ढेर जगह-जगह दिखाई दिया दुकानों पर मोटे अनाज, साग- सब्जी आदि दिखाई दिया। देसी घी तो यहां पर मटका मटका भरा पड़ा था और मैंने एक रुपए का 6 सेर देसी घी खरीदा। दुद्धि में कभी दूध, दही इत्यादि बेचा नहीं जाता था और उत्पादन अधिक होने के कारण निशुल्क उपलब्ध अगर बिकता भी था दो- पैसे चार पैसे सेर, मट्ठा तो इतना होता था कि पशुओं को पिला दिया जाता था। दुद्धी नगर आदिवासी ननकू मांझी द्वारा बसाया गया था, दुद्धी का अर्थ दूध और घी की नदी क्षेत्र में दुग्ध का इतना उत्पादन होता था दूध से बनने वाले घी के नाम पर यहां पर एक नदी का नाम भी घीवही नदी पड़ गया।
    लेकिन दुद्धी क्षेत्र के लोगों का दुर्भाग्य था कि दूध, दही, घी का पर्याप्त उत्पादन निशुल्क उपलब्धता होने के बावजूद भी यहां के लोग इसका उपयोग- उपभोग नहीं करते थे, बल्कि यहां हर आदिवासी के घर में महुआ की शराब बनाने की परंपरा कायम थी। आदिवासी बच्चे, बूढ़े, जवान, महिलाएं सभी महुये की बनी हुई शराब का सेवन करते थे और इसके बाद आपस में मारपीट, लड़ाई- झगड़ा होना स्वाभाविक था।
    शराब की लत होने के कारण यहां के आदिवासियों का जीवन दुखी था रोग व्याधि के इलाज के लिए वह साहूकारों से 10-20 रुपया उधार लेते थे तो उनका चुकता साहूकार कभी अपने खाते में नहीं करता था, इनके घर- द्वार, पशु, बर्तन- भडवा, गहना- गुरिया यहां तक की साहूकारों के यहां इनकी स्त्रियां, बेटियां और बेटे गिरवी रख लिए जाते थे, बंधुआ मजदूरी और यौन शोषण के लिए। खाली कागज और स्टांप पर अंगूठे का ठप्पा लगाने से इनका जीवन पराधीन हो जाता था, यह अपने देश,नगर, घर, खेत-खलिहान में पराधीन थे। इन्हें हमेशा यह डर सताए रहता था कि कब साहूकार वसूली के लिए आ जाए और इनके पशुओं और जायजात को जप्त कर ले।

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    देशवासियों, मिर्जापुर वासियों के त्याग तपस्या, बलिदान के बल पर 15 अगस्त 19 47 को हमारा देश आजाद हो गया और 26 जनवरी 1950 को हमारे देश में संविधान लागू हुआ देश में पूर्ण गणतंत्र की स्थापना हुई ।
    देश में प्रथम हुए चुनाव में दुद्धी और रॉबर्ट्सगंज विधान सभा क्षेत्र की जनता ने ग्रामवासी जी कोअपना रहनुमा, उद्धारक, सेवक मानते हुए विधायक चुना शायद यह मेरे 10 वर्षों के तपस्या का फल जनता ने दिया जो 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन से शुरू हुआ था। जिसका अंत ग्रामवासी जी के विधायक चुने जाने के बाद हुआ। विधायक चुने जाने पर दुद्धि और रॉबर्ट्सगंज की जनता का आभार व्यक्त करने के लिए घर- घर पहुंचे और आश्वस्त किया कि दुद्धी क्षेत्र में जो 10 वर्षों पहले आदिवासियों की समस्या थी उसका निदान हर हाल में होगा विधानसभा के सत्र में दुद्धि की समस्याओं पर ग्रामवासी जी ने विस्तृत प्रकाश डाला।

    तत्कालीन मुख्यमंत्री पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने उन्हेंअलग से बुलाकर दुद्धी क्षेत्र के बारे में जानकारी लिया और आश्वस्त किया कि यहां की समस्याओं का निदान अवश्य होगा इनके प्रयासों के कारण दुद्धी की समस्याओं का समाधान हुआ कई उद्योगों कल कारखानों की स्थापना हुई, इनका कार्यकाल सन 1957 तक रहा।
    ग्रामवासी जी का सोनभद्र से अटूट संबंध था और आजीवन सोनभद्र के विकास के लिए लड़ते रहे।
    1954 ग्रामवासी सेवा आश्रम की स्थापना आदिवासियों और गरीबों के हित में किया, सन 1960 में रिहंद डैम के विस्थापितों को सरकार से उचित मुआवजा दिलाने के लिए तथा पुनर्वास के लिए 13 दिन का अनशन (मई 1960 से 3 जून 1960) तक किया।
    इसके बाद बीना कोयला खदान के कारण निकाले गए किसानों, बीजपुर पावर हाउस के कारण विस्थापित किसानों, अनपरा पावर हाउस के कारण विस्थापित किसानों के मुआवजा, पुनर्वास हेतु 5- 5 दिन अनशन अपने ही सरकार के खिलाफ किया।

    मुलायम सिंह यादव के कार्यकाल में डाला, चुर्क, चुनार सीमेंट फैक्ट्री बेचे जाने की विरोध में दो दिवसीय अनशन, सन 1994 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव द्वारा जनपद सोनभद्र का मुख्यालय रॉबर्ट्सगंज से स्थानांतरित कर कर पिपरी में स्थापित किए जाने के विरोध में ग्रामवासी दद्दा मिर्जापुर से सोनभद्र जनपद मुख्यालय रॉबर्ट्सगंज बस से आए बस स्टेशन के प्रतीक्षालय में उनकी भेंट मेरे पूज्य गुरु डॉक्टर पशुपति नाथ दुबे से हुई और ग्रामवासी दद्दा बड़े ही विनम्रता पूर्वक उनसे कहा कि मुझे पहुंचने में कुछ विलंब हो गया है मैं घोषित मुख्यालय के विरोध में गिरफ्तारी देने आया हूं अनशन पर हूं।ए गुरुजी का घर पास में ही था, जहां पर थोड़ी देर ग्रामवासी दद्दा ने विश्राम किया, चाय नाश्ते से निवृत्त होने के बाद दद्दा संकट मोचन हनुमान मंदिर (अस्पताल के सामने वाले) मंदिर पर पहुंचे, तब तक उनके समर्थकों अनुयायियों को खबर लग चुकी थी, मंदिर परिसर आंदोलन समर्थकों, अनशन कारियों से भर चुका था, जिला प्रशासन धारा 144 लागू कर दिया था, उस समय तहसील मुख्यालय एवं नगर पुलिस चौकी होने के कारण आंदोलनकारियों और जिला प्रशासन के मध्य तनाव की स्थिति कायम हो गई थी, नगर में चारों ओर पुलिस के जवानों का जाल बिछा दिया गया था और बड़ी तनावपूर्ण स्थिति थी। युवा अत्यधिक जोश में थे और वह कुछ भी करने के लिए तैयार थे लेकिन दद्दा ने सबको शांत किया और उन्होंने अपने अनशन व गिरफ्तारी का ऐलान किया एक 95 वर्षीय वयोवृद्ध दुद्धी रॉबर्ट्सगंज के संयुक्त क्षेत्र के पूर्व विधायक, सोनभद्र की भौगोलिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक स्थिति से परिचित, आंदोलनकारी, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, दद्दा के जोश को देखकर उपस्थित जनता भी जोश में आ गई और दद्दा के नेतृत्व में धारा 144 को तोड़ते हुए नगर भ्रमण कर आंदोलनकारियों का जुलूस रॉबर्ट्सगंज कोतवाली पहुंची और दद्दा ने अपनी गिरफ्तारी दी,इनके साथ श्याम नारायण देव पांडे एडवोकेट, तीरथ राज (विधायक) बेचन देव पांडे, मनमोहन पाठक, जगदीश मिश्रा, जितेंद्र चौबे, सरदार गोविंद सिंह, भोला उपाध्याय, श्रवण कुमार, चंद्रकांत देव पांडे, एम ए खान, सीता शरण महाराज, अशोक कुमार केसरी, प्रकाश सोनी, शुभलेंद्र कुमार राय, गोपाल स्वरूप पाठक, हरिशनि, अशोक कुमार शर्मा, अनुराग द्विवेदी, राजीव कुमार तिवारी, विमल तिवारी, प्रमोद पांडे, अशरफी, कन्हैया सोनकर, अवधेश कुमार सिंह, राजेंद्र सिंह, राजकुमार मिश्रा, प्रशांत कुमार, विवेक कुमार, इंद्र बहादुर मुख्यालय के लिए मर- मिटने के लिए तैयार दद्दा के साथ गिरफ्तार हुए।
    गिरफ्तारी के पूर्व 4 जुलाई 1994 के अंक की 40 प्रतियां आंदोलनकारियों में बाटी गई, जिसमें जनपद सोनभद्र के मुख्यालय के स्थानांतरण के विरोध में शासन के विरुद्ध समाचार प्रकाशित था।
    सभी आंदोलनकारियों को जिला कारागार मिर्जापुर भेज दिया गया. दद्दा के स्वास्थ्य को देखते हुए आंदोलनकारियों के अनुनय विनय के बाद दद्दा गिरफ्तारी के चौथे दिन जेल से बाहर आए।
    मुख्यमंत्री मुलायम सिंह के कार्यकाल के समाप्त होने के पश्चात सुबे की मुख्यमंत्री बहन सुश्री मायावती ने रॉबर्ट्सगंज नगर को पुनः जनपद मुख्यालय घोषित करते हुए जिला मुख्यालय का उद्घाटन किया।
    आज ग्रामवासी दद्दा का नश्वर शरीर हमारे समक्ष भले उपस्थित ना हो लेकिन उनके द्वारा जनहित में किए गए कार्य सोनभद्र के स्वर्णिम पृष्ठों में अंकित है।

    यहां के खेत उबड़- खाबड़, पहाड़ी, मिट्टी पथरीली और वर्षा पर निर्भर खेती है, अक्सर इस क्षेत्र में सूखा का प्रकोप रहता है ऐसी स्थिति में मोटा अनाज सावा, कोदो, मेलों,
    मेंझरी, मकई,मकरा, उर्द आदि मोटे और सूखे अनाज ही उत्पन्न होते हैं इन मोटे अनाज के अलावा मीठी कंद, तेंदू, बेर, मकोय, सेमल की छाल, चकोर आदि जंगली फल खाकर गुजारा करते थे। जंगलों में जमा गंदा पानी के कारण मच्छरों की पैदावार काफी संख्या में थी और इसके कारण यहां के लोग अक्सर मलेरिया जैसे रोग से पीड़ित रहते थे, इसके अलावा आदिवासियों में सवैया रोग व्याप्त था और इस रोग से ग्रसित व्यक्ति के हाथ पांव विचित्र हो जाते थे और वह कोई कामकाज करने में असमर्थ हो जाता था, इन रोगियों इलाज के लिए उस समय झाड़-फूंक के अलावा कोई चारा नहीं था, अगर इस क्षेत्र मे अकाल पड़ जाता था तो सरकार की ओर से प्रति परिवार ₹3 50 पैसा सहायता राशि के रूप में दिया जाता था,आदिवासी इस रुपए को भी शराब में उड़ा दिया करते थे।
    ग़ोड, मरिया, माझी, खरवार, घसिया, कोरवा, आदि जाति के लोग इस क्षेत्र में निवास करते है यह सत प्रतिशत निरीह, भोले और बाहरी संसार से अनभिज्ञ लोग है,
    ये लोग झूठ बोलना नहीं जानते और जैसा देखते थे वैसा कहते और सुनते थे।
    आदिवासियों के घर कच्चे खपरैल ऊंचे मिट्टी के बने हुए होते हैं और ये अपने घरों को साफ- सुथरा रखते थे घर के सामने लकड़ी का घेरा बनाकर लंबा- चौड़ा मैदान रखते और इस बाडे का उपयोग वह सब्जियों की खेती के लिए करते हैं।
    आदिवासी जातियों का जीवन अति सामान्य, संघर्षशील हैं। इनके जीवन में करमा का गीत, संगीत, मौज-मस्ती छाई रहती है महुए की शराब इनके सामाजिक, सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न हिस्सा और मुख्य पेय पदार्थ हैं ,जिसके बिना इनके कोई रस्म- रिवाज, विवाह, मृत्यु संस्कार आदि पूरा नहीं होता, अगर इन्हें जिंदा रहना है तो शराब पीना है।
    आदिवासी घर- गृहस्थी बड़ी मितव्ययिता, स्वालंबन के बल पर चलाते है, ढेकी से धान कूटना, कच्चे कुएं से सिंचाई कर लेना, कोल्हू से तेल फेरना, चक्की से अनाज पीस लेना, मिट्टी से लोहा निकालकर घरेलू उपयोग के हंसीआ, कल्छुल, कढ़ाई, तावा चमड़े का जूता,मोठ, पत्ते का बना हैट आदिवासियों के लिए छाते का काम करता है, धूप पानी और उनकी रक्षा करता है मरुआ की लकड़ी बड़े काम की होती थी और इससे कंघी, बैलगाड़ी की चूर बनाई जाती हैं,, मूंगे की माला स्त्रियों को बहुत ही प्रिय थी इससे यहां स्त्री- पुरुष मॉदल, ढोल की ताल पर शराब पीकर झुंड के झुंड एक दूसरे के कमर में हाथ डाल कर करमा शैला नृत्य करती करते थे।
    प्रत्येक जाति के लोग अपनी अपनी जाति के अनुसार व्यवसाय करते थे, जैसे पानिका कपड़ा बुनने का खरवार कत्था बनाने का।
    गाय को लक्ष्मी कह कर संबोधित करते हैं,, वृक्ष को देवी- देवता मानकर पूजते हैं और इनके देवता पहाड़ों, गुफाओं,
    कंदराओ में बसते हैं।
    बहु विवाह का प्रचलन अधिक होने के कारण पारिवारिक क्लेश बना रहता है, वर- वधु के घर विवाह के लिए जाते हैं बात पक्का हो जाने पर वस्त्र व अनाज लड़की के यहां पहुंचाया जाता है बारात आने पर सिणघा और बड़े-बड़े ढोल बजाए जाते हैं, विवाह बैगा कराते हैं।

    ग्रामवासी जी की टोली जब बिल्ढमगंज पहुंची तो यहां के प्रतिनिधि किस्मत राम, सनीचर राम, रामेश्वर राम,इंद्रमणि, भागवत, महादेव गुप्ता आदि कार्यकर्ताओं के नेतृत्व में भारी भीड़ ने हमारा स्वागत सत्कार किया और यहीं पर एक सभा का आयोजन किया गया, मेरे आगमन की सूचना पहले से मिल जाने के कारण यहां भीड़ इकट्ठा थी, स्थानीय कार्यकर्ताओं ने ग्रामवासी जी का परिचय सभा में उपस्थित लोगों से कराया उन्हें एक मसीहा, उद्धारक, जन नेता केछ रूप में जनता के सामने प्रस्तुत किया गया। गरीबी, पिछड़ापन, नंगा बदन, बाहरी संसार से अनभिज्ञ, भोली- भाली जनता ऐसा लगा कि कोई देवता मनुष्य उनके बीच आया है और उनकी समस्याओं का समाधान तत्काल कर देगा, यद्यपि ग्रामवासी जी के भाषण से जनता को विश्वास हो गया कि दुद्धि की समस्याओं का समाधान अवश्य होगा।
    वे अपने साथियों के साथ बिल्ढमगंज में ही रुक गया और रात को यहां के कुछ लोगों और साहूकारों से मिले और जनता की समस्याओं से रूबरू हुए ग्रामवासी जी के हृदय में शोषित, पीड़ित, दमित आदिवासीजनों के प्रति कौतूहल पैदा होता गया रात में ही टोली ने दौरे का कार्यक्रम तय कर लिया और दूसरे दिन सुबह हम सभी लोग टोली के साथ भ्रमण प्रारंभ किया जैसे हम बिल्डमगंज के बाहर निकले वैसे हमें एक बड़ा गोदाम, लाह के कारखाना देखने को मिला जिसमें स्त्री- पुरुष लाह की छिलाई कर रहे थे, यह विदेशी कंपनी का गोदाम था, इसके बाद शराब की भठ्ठी मिली, जहां मैंने देखा कि गोल बनाकर एक- एक परिवार के बच्चे, स्त्री- पुरुष महुआ के पत्ते का दोना बनाकर शराब पी रहे थे, बहुत से लोगों को मैंने शराब पीकर जमीन पर लौटते वक्त करते हुए देखा। इस दुखद परिदृश्य को देखते,समझते हुए हम महुली गांव पहुंचे महुली गांव झोपड़ियों का गांव था, यहां के लोग मुझे ठीक-ठाक लगे। महुली से चलकर कनहर नदी पैदल पार करके हम लोग जाबर गांव किसके घर आए यहां पर थकान मिटाने भोजन पानी के बाद हम अपने कार्यकर्ताओं के साथ दुद्धि बाजार पहुंचे, दुद्धी में भारी भीड़ इकट्ठा थी और इस भीड़ ने हमारा स्वागत किया यहां पर भी सभा हुई, लेकिन जो परिदृश्य विंढमगंज में था, वहीं दृश्य दुद्धी में भी मुझे देखने को मिला, कई गरीब आदिवासियों के घरों में जाकर हम लोगों ने उनकी घर गृहस्थी को देखा और देख कर ऐसा लगा कि बड़ी गरीबी में जीवन बिता रहे
    है।

    इस प्रकार हम लोगों ने प्रतिदिन लगभग 15 किलोमीटर की पदयात्रा करके जगह-जगह में सभाएं करके वहां की समस्याओं को जाना परखा दुद्धि के बाद हम गोंहडा गांव अयोध्या खरवार के घर पहुंचे यहां पर हमारा अच्छा अतिथि सत्कार हुआ, इसके बाद हम बजिया, बमहनी गांव पहुंचकर सभाएं की।

    उदारतावश कार्यकर्ताओं ने ग्रामवासी जी को एक टट्टू पर बैठा दिया रास्ते में हम एक गांव में रात गुजारा यहां पर हमारे टट्टू को ना चारा मिला और ना हम लोगों को खाना।
    यहां से टोली सिंगरौली गहरवार,कोटा, बांसी आदि गांव का दौरा किया वहां से लौटते हुए हम लोग रिहंद नदी पार कर महरी गांव मैं उत्साही कार्यकर्ता सरदार केशव सिंह यहां रात गुजारी इनके यहां भी रात भर दुद्धि के आदिवासियों के उत्थान पर काफी देर तक चर्चा होती रही। यहां से धनोरा गांव होते हुए हम बिल्ढमगंज होते हुए मुख्यालय मिर्जापुर पहुंचे।
    12 दिन की कुल 1 सौ 50 मील की यात्रा ने टोली के लोगों की आंखें खोल दी और यात्रा से लौटने के बाद भी हमें सहसा अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ कि इतनी गरीबी, दरिद्रता की अवस्था में हमारी जनपद के लोग जी रहे हैं ‌।
    दुद्धी की जनता को यह विश्वास हो गया कि कोई मसीहा हमारे क्षेत्र में आया था और हमारी सभी समस्याएं हल होंगी। ग्रामवासी दादा की यात्रा सन 1942 के बाद तमाम आंदोलनों के सिलसिले में दुद्धी और रॉबर्ट्सगंज के तहसीलों का कई बार दौरा किया और यह संकल्प लिया कि मुझे अगर अवसर प्राप्त होगा तो मैं इस क्षेत्र के लोगों को समस्याओं से मुक्ति दिलाउगा।

    संस्कृति LIVE द्वारा प्रकाशित

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