अतीत के आईने में, ऐतिहासिक साबित हुआ था सोन साहित्य संगम का आंचलिक कवि सम्मेलन

अधरों में प्यास लिए दौड़ रहे कूप- कूप—‘मधु गोरखपुरी’ सोनभद्र। ‘अधरों पे प्यास लिए दौड़ रहे कूप- कूप ..,हाय ये ! प्रचंड धूप ! हाय ये प्रचंड धूप ‘ ! वरिष्ठ पत्रकार एवं सोन साहित्य संगम के निदेशक मिथिलेश प्रसाद द्विवेदी ‘मधुर गोरखपुरी’ की यह कालजयी रचना एक दर्शन है, यथार्थ हैं, अनुभव है औरपढ़ना जारी रखें “अतीत के आईने में, ऐतिहासिक साबित हुआ था सोन साहित्य संगम का आंचलिक कवि सम्मेलन”

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