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- राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ सोनभद्र द्वारा स्वामी विवेकानंद जी की जयंती की पूर्व संध्या पर युवा विद्यार्थी सम्मेलन व युवा व्यावसायी सम्मेलन का भव्य आयोजन कराया गया।

सोनभद्र। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ सोनभद्र द्वारा स्वामी विवेकानंद जी की जयंती की पूर्व संध्या पर रविवार को युवा विद्यार्थी सम्मेलन व युवा व्यावसायी सम्मेलन का आयोजन स्वामी विवेकानंद प्रेक्षागृह सोनभद्र नगर मे आयोजित किया गया।
कार्यक्रम का प्रारंभ भारतमाता व स्वामी विवेकानन्द जी की प्रतिमा पर पुष्प अर्पण व दीप प्रज्ज्वलन से किया गया। कार्यक्रम में मंचासीन जिला संघचालक हर्ष अग्रवाल, प्रान्त कार्यवाह राकेश तिवारी व अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख नरेन्द्र ठाकुर जी रहे।
बौद्धिक उद्बोधन में राष्ट्र निर्माण में युवाओं की भूमिका पर बौद्धिक उद्बोधन मे नरेन्द्र ठाकुर जी ने कहा कि, हमारे सामने भविष्य है। भविष्य में आने वाले सभी दायित्वों का सामना हमें करना है। इसलिए हर युवा को इस पर विचार करना होगा। मन में एक और बात आती है- मैं, परिवार, परिवार का दायित्व । मनुष्य अकेला जीवन नहीं जीता। मनुष्य परिवार के साथ जीवन जीता है।

वह किसी शहर या किसी गाँव में रहता है। उसके जीवन में उतार-चढ़ाव होते हैं। जैसे व्यक्ति के जीवन में उतार-चढ़ाव होते हैं, वैसे ही परिवार के जीवन में भी उतार-चढ़ाव होते हैं। गाँव, जिला ,राज्य ,देश पूरे विश्व में होता है। विश्व में जो कुछ होता है, उसका प्रभाव देश पर पड़ता है।

सही ढंग से जीने के लिए केवल स्वार्थ से काम नहीं चलता। देश के बारे में सोचे बिना जीवन ठीक नहीं चल सकता हैं। इसलिए जब हम देश के बारे में सोचते हैं, तो हम बहुत-सी बातें सोचते हैं- यह होना चाहिए, वह होना चाहिए। तो यह कौन करेगा? राष्ट्र निर्माण किसी एक दिन या एक पीढ़ी का कार्य नहीं होता, बल्कि यह एक सतत प्रक्रिया है, जिसमें धैर्य, निरंतरता और त्याग की आवश्यकता होती है।
इसलिए त्वरित परिणामों की अपेक्षा किए बिना, लंबे समय तक समाज के बीच रहकर काम करने की आवश्यकता है। इसलिए, यदि कुछ ठीक होना है तो हमें स्वयं ठीक होना पड़ेगा। स्वस्थ रहना मतलब केवल शरीर से स्वस्थ रहना नहीं है। देश के बारे में सोचना भी एक आवश्यक कार्य है।

दूसरा अर्थ यह है कि मुझे अपने आप को इस योग्य बनाना होगा कि मैं देश के लिए उपयोगी हो सकूँ। हमें शारीरिक रूप से सक्षम होना चाहिए। फिर हमें बुद्धि, ज्ञान, विवेक चाहिए। यदि बुद्धि गलत हो जाए, तो मनुष्य गलत मार्ग में फंस जाता है। यदि विवेक ठीक नहीं है, तो सब कुछ नष्ट हो जाता है। भाग्य से ही मनुष्य को सब कुछ नहीं मिलता, साथ-साथ परिश्रम करना पड़ता है। हम लोग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर चुके है।

हमें स्वयं को सुधारना होगा- बुद्धि से भी और मन से भी। यदि मैं ठीक रहना चाहता हूँ, तो मेरा परिवार, गाँव, जिला, राज्य ठीक रखना है, यदि देश को ठीक रखना है, तो यह अकेले व्यक्ति का काम नहीं है। कार्य हमें मिल-जुलकर करना होगा। और मिल-जुलकर करने के लिए हमें साथ चलना सीखना होगा, सबके साथ रहना सीखना होगा। हमें ऐसा स्वभाव बनाना होगा।

इसके लिए प्रशिक्षण आवश्यक है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यही प्रशिक्षण देता है- अकेलेपन में नहीं जीना, स्वार्थ से ऊपर उठकर जीना सिखाता है। निस्वार्थ बुद्धि से जीना इसका अर्थ यह नहीं है कि हम सब कुछ छोड़ दें। सबका कल्याण हो- पर सबसे पहले देश का कल्याण। फिर अपने क्षेत्र का, फिर अपने समाज का। सबसे अंत में मेरा। अंग्रेज़ों से पहले भी कई आक्रमण हुए थे, और अंग्रेज़ों के बाद भी यदि हम सावधान नहीं रहे तो फिर से दास बन सकते हैं। अब हमें जागना होगा।

इसलिए फिर से कुछ करना होगा। केवल क्रांति से देश नहीं बदलेगा। डॉ॰ हेडगेवार जी ने कहा कि समाज को बदले बिना देश नहीं बदलेगा। इसलिए उन्होंने ऐसा संगठन बनाने का निश्चय किया जो मनुष्य का निर्माण करे। इसका उद्देश्य था- चरित्रवान नागरिक बनाना। हम कौन हैं ? – पहले हमें यह जानना आवश्यक है। भारत को जानो। राष्ट्र क्या ? -राष्ट्र कोई अमूर्त विचार नहीं, बल्कि अपने आसपास का समाज ही राष्ट्र है, राष्ट्र केवल भौगोलिक सीमा नहीं है, बल्कि वह एक सांस्कृतिक और नैतिक चेतना है,

जो पीढ़ी दर पीढ़ी प्रवाहित होती रहती है। इस चेतना को जीवित रखने का दायित्व किसी एक सरकार का नहीं, बल्कि पूरे समाज का है। इस सामूहिक दायित्वबोध को जगाना आवश्यक है। समाज को बदलने के लिए सत्ता की नहीं, बल्कि संस्कारों की आवश्यकता होती है। इसलिए ऐसे नागरिक जो जहाँ भी रहें, जिस भी क्षेत्र में कार्य करें, वहाँ राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखें।

व्यक्ति – निर्माण – अनुशासन, समय पालन, सहयोग, सेवा और देशभक्ति छोटे-छोटे काम (जो बिना सरकारी सहायता के, बिना पैसे हो सकते हैं) ट्यूशन, रोजगार आदि । वास्तविक राष्ट्रभक्ति का अर्थ है देश की भलाई के लिए अपने समय, शक्ति और संसाधनों का योगदान देना। इस योगदान में अहंकार, अपेक्षा या स्वार्थ का स्थान नहीं होना चाहिए। राष्ट्र की सेवा करना ही सच्ची देशभक्ति है। हमारा लक्ष्य एक सशक्त, समरस और आत्मनिर्भर राष्ट्र का निर्माण करना है।

राष्ट्र की उन्नति केवल भौतिक प्रगति से नहीं मापी जा सकती। आर्थिक विकास आवश्यक है, लेकिन उससे भी अधिक आवश्यक है नैतिकता, सामाजिक उत्तरदायित्व और सांस्कृतिक चेतना। यदि ये तत्व कमजोर पड़ जाएँ, तो कोई भी राष्ट्र लंबे समय तक सशक्त नहीं रह सकता। समाज और राष्ट्र का निर्माण केवल शाब्दिक प्रेरणा से नहीं होता। इसके लिए प्रत्येक नागरिक की सक्रिय भागीदारी और सतत प्रयास की आवश्यकता होती है।

देश का विकास केवल सरकारी नीतियों, दूसरों पर निर्भर रहकर या बाहरी सहायता से नहीं होता, बल्कि प्रत्येक नागरिक के प्रयासों, विचारों और संस्कारों से संभव होता है। इसलिए व्यक्तिगत जिम्मेदारी के साथ-साथ सामाजिक जिम्मेदारी निभाना भी उतना ही आवश्यक है। उन्हें जीवन में लागू करना पड़ता है।
जब व्यक्ति अपने कर्तव्यों और अधिकारों को संतुलित रूप से समझता है,

तभी वह समाज और राष्ट्र के निर्माण में सार्थक योगदान दे सकता है। जो समाज केवल अधिकार मांगने पर निर्भर रहते हैं, वे जल्दी अस्थिर हो जाते हैं। स्थायी परिवर्तन और प्रगति तभी संभव है जब व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन ईमानदारी और लगन से करे। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन ईमानदारी से करता है, तो एक समृद्ध और संगठित समाज की नींव मजबूत होती है।
जीवन में अनुशासन, परिश्रम और नैतिकता के बिना कोई भी राष्ट्र या समाज स्थायी रूप से प्रगति नहीं कर सकता। जब व्यक्ति अपने घर, परिवार, गाँव और समाज में सही कार्य करता है, तभी देश सच्चे अर्थों में मजबूत बनता है। “व्यक्ति का विकास, समाज का विकास और राष्ट्र का विकास आपस में जुड़े हुए हैं। घर से शुरू होकर पूरे देश तक जिम्मेदारी निभाना हमारा कर्तव्य है।
“उन्होंने पंचपरिवर्तन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि,स्व आधारित जीवन स्वदेशी स्वावलंबन,आत्मनिर्भरता – Job seekar नहीं Job provider बनें। स्वभाषा, वेषभूषा, हस्ताक्षर, जन्मदिन मनाने की पद्धति ,भोजन आदि। संगठित समाज – आज छुआछूत, अस्पृश्यता, भेदभाव – इन सबका अंत। क्योंकि राष्ट्र तभी मजबूत होगा जब समाज समरस होगा।
मंदिर, पानी, श्मशान में कोई भेदभाव न हो। । जब समाज में सद्भाव, समरसता होगी तभी राष्ट्र सशक्त बनेगा। कर्तव्यबोध – आदर्श नागरिक कैसा होता है – कर्तव्यनिष्ठ, अनुशासित और समाज के प्रति संवेदनशील। हर व्यक्ति अपने जीवन के छोटे-छोटे कर्तव्यों को ईमानदारी और निष्ठा से निभाए, तो वही मिलकर बड़े परिवर्तन का आधार बनते हैं।
यदि प्रत्येक नागरिक का कर्तव्यबोध जाग्रत होगा, तभी राष्ट्र सशक्त बनेगा। परिवार संस्कार परंपरा जीवन मूल्य समाज के लिए कुछ करना। भोजन अपना साथ में करना। पर्यावरण संरक्षण पेड़ लगाना, पानी बचाना ,प्लास्टिक से मुक्ति स्वच्छता आदि। किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसके आज के युवाओं के चरित्र, सोच और संस्कारों पर निर्भर करता है।

युवाओं में आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता और समाज के प्रति उत्तरदायित्व का भाव होना चाहिए। उपस्थित लोगों ने कर्तव्य,दायित्व के संबंध में जिज्ञासा प्रश्न पूछे जिनका नरेन्द्र ठाकुर जी ने समुचित उत्तर दिया। सभी उपस्थित लोगों ने भारत माता की आरती सामूहिक रूप से किया। कार्यक्रम का सफल संचालन मोहित ने किया।
कार्यक्रम में प्रांत प्रचारक रमेश, जिला प्रचारक राहुल, कार्यक्रम संयोजक रंजीत,जिला कार्यवाह दिनेश,नगर संघचालक संगम गुप्ता,कीर्तन सिंह,महेश शुक्ला, नीरज सिंह,नगर प्रचारक हरेंद्र, संतोष चौबे,मनोज जालान, जे0बी सिंह ,रामलगन,अवध,नंदलाल,कृष्ण प्रताप,आशीष शुक्ला, आलोक चौबे,आशुतोष , विवेक ,मृगांक , कुंवर ,शशांक शेखर,धनंजय आदि उपस्थित रहे।




























