गीता जीवन – संग्राम में शाश्वत विजय का क्रियात्मक प्रशिक्षण है

HIGHLIGHTS

  • गीता जयंती पर जयप्रभा मंडपम में आयोजित हुई गोष्ठी
  • “मानव जीवन में धर्मशास्त्र गीता की उपयोगिता” विषय पर हुआ विचार – मंथन
  • गीता जयंती समारोह समिति सोनभद्र ने किया आयोजन

सोनभद्र। गीता जयंती समारोह समिति सोनभद्र द्वारा गीता जयंती के अवसर पर सोमवार को विचार – गोष्ठी आयोजित की गई। “मानव जीवन में धर्मशास्त्र गीता की उपयोगिता” विषय पर आयोजित गोष्ठी में कहा गया कि गीता जीविका – संग्राम का साधन नहीं अपितु जीवन संग्राम में शाश्वत विजय का क्रियात्मक प्रशिक्षण है।

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इसलिए यह युद्ध – ग्रन्थ है और यह युद्ध कहीं बाहर नहीं होता। यह युद्ध आंतरिक है। यह दैवी और आसुरी संपद, सजातीय एवं विजातीय, सद्गुण एवं दुर्गुणों का संघर्ष कहा गया है, जिसका परिणाम शाश्वत – सनातन परब्रह्म की प्राप्ति है।

वक्ताओं ने कहा कि गीतोक्त पथ पर चलने के पूर्व मनुष्य सांसारिक उपलब्धियों, सुख- समृद्धि को ही महत्वपूर्ण समझता है। पूरा जीवन इन्हीं के लिए खपा देता है। वह कितना भी धन – संपदा अर्जित कर ले, कितने भी बड़े ओहदे पर हो जाये, वह कितना भी सुखी दिखाई देता है किन्तु वह वास्तव में सुखी नहीं होता।

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भौतिक समृद्धि कभी मनुष्य के स्थायी सुख का माध्यम नहीं बन सकती। आत्मिक संपत्ति ही स्थिर संपत्ति होती है, गीता हमें हमारे आत्मिक संपत्ति का ही हमसे परिचय कराती है और उस शाश्वत सुख की ओर अग्रसर कर देती है जिसके परिणामस्वरूप शाश्वत – सनातन परब्रह्म की प्राप्ति संभव हो जाती है।

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साहित्यकार पारस नाथ मिश्र ने कहा कि गीता मनुष्य का उससे वास्तविक साक्षात्कार कराती है कि वह वास्तव में कौन है? गीता के अनुसार मनुष्य परमात्मा का ही विशुद्ध अंश है। उसे परमात्मा का आश्रय ही यथार्थ की उपलब्धि करा सकता है।

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डा0 बी सिंह ने कहा कि गीता का आशय इन्द्रियों के अतीत होने से है। जिसने शरीर रहते मन सहित इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर आत्मा को जान लिया वही सुखी है। आत्मा परमात्मा का विशुद्ध अंश है। इसलिए इस आत्मा को जानना हमारा कर्तव्य है।

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विषय प्रवर्तन करते हुए अरुण कुमार चौबे ने कहा कि संसार के विषयों से मनुष्य को स्थायी सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती। गीतोक्त पथ पर चलते हुए अपनी ही आत्मा का साक्षात्कार कर लेने पर स्थायी सुख की अनुभूति होती है। गीता क्रियात्मक योग है।

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आभार प्रकट करते हुए कवि जगदीश पंथी ने कहा कि गीता साक्षात भगवान के श्रीमुख से नि:सृत वाणी है। यह मानव मात्र का धर्मशास्त्र है। संचालन पत्रकार भोलानाथ मिश्र ने किया।

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इस अवसर पर विजय कनोडिया, सी पी गिरि, रामानुज पाठक, गणेश पाठक, आलोक चतुर्वेदी, नरेंद्र पाण्डेय, विमल चौबे , राज कुमार, चंद्रकांत तिवारी आदि उपस्थित रहे। उपस्थित गीता प्रेमियों ने यह निर्णय लिया कि श्रीमद् भागवत गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करने के लिए राष्ट्रीय- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रयास किया जाएगा।

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