HIGHLIGHTS
- बार कौंसिल के चुने हुए सदस्यों को दुबारा चुनाव लड़ने पर लगे रोक–राकेश शरण मिश्र
- जिले /तहसील की तरह एक कार्यकाल का हो विराम
- चुनाव लड़ने के लिए कम से कम 25 वर्ष की वकालत हो अनिवार्य

सोनभद्र। अधिवक्ता अधिनियम 1961 में संशोधन करते हुए बार कौंसिल से संबद्ध बार संघों पर जो नियम लागू होता है वहीं नियम बार कौंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश के चुनाव प्रक्रिया पर भी लागू होना चाहिए। जिस प्रकार जिला या तहसील के बार संघों में बार कौंसिल द्वारा जारी किया गए मार्डन बाई लाज के अनुसार चुनाव प्रक्रिया की जाती है और एक बार अध्यक्ष बनने के बाद कम से कम एक कार्यकाल का विराम दिया जाता है

वही प्रक्रिया बार कौंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश के चुनाव में भी अपनानी चाहिए और चुने हुए सदस्यों को एक कार्यकाल का विराम देते हुए लगातार दुबारा चुनाव लड़ने पर रोक लगानी चाहिए। उक्त बाते प्रेस को जारी प्रेस विज्ञाप्ति में संयुक्त अधिवक्ता महासंघ के प्रदेश अध्यक्ष एवं बार कौंसिल प्रत्याशी राकेश शरण मिश्र ने कही है।

श्री मिश्र ने जारी प्रेस विज्ञाप्ति में कहा है कि ये बड़ी अजीब बात है कि बार कौंसिल द्वारा जारी मार्डन बाई लाज खुद बार कौंसिल पर बाध्यकारी नहीं है। जब जिले या तहसील के बार संघों के अध्यक्ष पद के लिए कम से कम 25 वर्ष की वकालत अनिवार्य है तो फिर बार कौंसिल के जो 25 सदस्य पूरे प्रदेश से चुने जाते है उनके ऊपर यह नियम लागू क्यों नहीं होता।

उन्होंने कहा है कि पूरे प्रदेश के अधिवक्ताओं का प्रतिनिधित्व करने वाले बार कौंसिल के सदस्य पद हेतु भी कम से कम 25 वर्ष की वकालत बाध्यकारी होनी चाहिए। बार कौंसिल के चुने हुए सदस्य प्रदेश के लाखों अधिवक्ताओं का प्रतिनिधित्व करने के लिए बार कौंसिल में जाते है तो उनके लिए 25 वर्ष की वकालत का नियम लागू क्यों नहीं किया गया।

महासंघ के प्रदेश अध्यक्ष ने कहा है कि एक बार के कार्यकाल के बाद लगातार दूसरे बार चुनाव लड़ने पर रोक लगनी चाहिए तभी बार कौंसिल के चुनाव की पारदर्शिता कायम रह पाएगी और चुनाव में जो लाखों रुपया पानी की तरह बहाया जाता है उस पर भी रोक लगेगी। साथ ही बार कौंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश को हर बार 25 नए सदस्य मिलेंगे जो बार कौंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश सहित प्रदेश के अधिवक्ताओं के हित में कार्य कर सकेंगे।






























