नलराजा मंदिर बनेगा धार्मिक-ऐतिहासिक पहचान, पर्यटन स्थल के रूप में किया जाएगा का विकसित- DM बीएन सिंह

HIGHLIGHTS

  • नलराजा मंदिर बनेगा सोनभद्र की नई धार्मिक-ऐतिहासिक पहचान : बद्री नाथ सिंह जिलाधिकारी
  • राजा नल और रानी दमयंती की अमर प्रेमगाथा का साक्षी नलराजा मंदिर

सोनभद्र। शिवरात्रि के पावन अवसर पर जिलाधिकारी बद्री नाथ सिंह ने सोनभद्र के प्राचीन और चमत्कारी नलराजा मंदिर में विधिवत दर्शन-पूजन कर जनकल्याण की कामना की। यह मंदिर केवल एक शिवस्थल नहीं, बल्कि महाभारत काल की अमर प्रेमगाथा राजा नल और रानी दमयंती के तप, प्रेम, संघर्ष और भक्ति की जीवंत स्मृति है।

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कर्मनाशा नदी के किनारे बसा यह शिवधाम, वर्षों से उपेक्षित रहा, परंतु अब इसके ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व को पुनर्जीवित करने की दिशा में प्रशासन ने ठोस कदम उठाया है। जिलाधिकारी ने मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्रों का निरीक्षण कर इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की योजना प्रस्तुत की, जिसमें सुगम मार्ग, रोशनी, पेयजल, विश्राम शेड और ऐतिहासिक संग्रहालय की व्यवस्था की जाएगी

राजा नल और रानी दमयंती का इतिहास, प्रेम, परीक्षा और भक्ति की गाथा

राजा नल, निषध देश के यशस्वी, धर्मनिष्ठ और अत्यंत सुंदर राजा थे। उनकी ख्याति दूर-दूर तक थी। वहीं दमयंती, विदर्भ नरेश की पुत्री, अनुपम सौंदर्य और बुद्धिमत्ता की प्रतीक थीं। जब दमयंती ने राजा नल का नाम सुना, तो बिना देखे ही उन्हें अपने हृदय में स्थान दे दिया। नल भी दमयंती की बातों और गुणों से आकर्षित हो चुके थे।

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स्वयंवर के समय स्वर्ग के देवता भी दमयंती से विवाह की इच्छा लेकर पहुंचे, परंतु दमयंती ने सभी देवताओं को अस्वीकार कर राजा नल को ही अपना वर चुना। यह निर्णय स्वर्गिक शक्तियों को भी चुनौती देता था।

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उनके विवाह के बाद एक समय ऐसा भी आया जब कलि नामक असुर ने राजा नल के भाग्य को प्रभावित किया। द्यूत (जुए) में धोखा खाकर नल ने अपना सब कुछ खो दिया और पत्नी सहित वन में कष्ट झेलने लगे। भूख, प्यास, दारिद्र्य और विपत्तियों के बीच दमयंती ने भी अपने पति का साथ नहीं छोड़ा।

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यही वह वन क्षेत्र था, जहाँ राजा नल ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की। यह मंदिर उसी तपोभूमि की स्मृति है। कहते हैं कि शिवजी ने प्रसत्र होकर राजा नल को मार्गदर्शन और शक्ति दी, जिससे वह पुनः अपना राज्य प्राप्त कर सके।

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मंदिर का चमत्कार और आस्था

स्थानीय लोगों के अनुसार, नलराजा मंदिर में स्थित शिवलिंग स्वयंभू है, और यहां सच्चे मन से मांगी गई मनोकामनाएं शीघ्र पूरी होती हैं। सावन मास में विशेषकर शिवरात्रि पर यहां हजारों श्रद्धालु जलाभिषेक करने आते हैं। यहां कई श्रद्धालुओं को असाध्य रोगों से मुक्ति, संतान प्राप्ति, मानसिक शांति और जीवन संकटों से उबारने जैसे चमत्कारी अनुभव हुए हैं।

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पर्यटन और सांस्कृतिक धरोहर के रूप में होगा विकास

जिलाधिकारी बद्री नाथ सिंह ने कहा कि यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि प्रेम, संघर्ष और भक्ति की ऐतिहासिक गाथा का प्रतीक है। अब इस स्थल का समग्र विकास कर इसे राष्ट्रीय स्तर के पर्यटन स्थल में बदला जाएगा।

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राजा नल और रानी दमयंती की कथा को संग्रहालय और डिजिटल माध्यम से प्रस्तुत कर युवाओं को उनके जीवन मूल्यों, निष्ठा और विश्वास से जोड़ने का प्रयास होगा। मंदिर परिसर में सांस्कृतिक, धार्मिक और शैक्षिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाएगा।

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नलराजा मंदिर, आस्था, इतिहास और भविष्य की धरोहर

यह प्रयास केवल एक मंदिर के पुनरुद्धार का नहीं, बल्कि एक अद्वितीय सांस्कृतिक पुनर्जागरण का बीज है, जिसमें सोनभद्र न केवल आध्यात्मिक केंद्र बनेगा बल्कि ऐतिहासिक पर्यटन मानचित्र पर भी एक नई पहचान पाएगा।

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संस्कृति LIVE द्वारा प्रकाशित

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