स्मृतियों के झरोखे से
–दीपक कुमार केसरवानी
आपातकाल को लागू हुए 50 वर्ष व्यतीत हो गए लेकिन इन बीती हुई अवधि में राजनेताओं, अधिवक्ताओं, व्यापारियों, छात्रों व अन्य वर्गों पर हुए शासन और प्रशासन की ओर से हुए अत्याचारों की याद अभी भी ताजा है। आपातकाल की याद करके लोकतंत्र सेनानी सिहर उठते हैं, पुलिस की प्रताड़ना, अमानवीय कृत्य, जेल में दुर्व्यवहार एवं प्रशासनिक प्रशासनिक क्षमता का दुरुपयोग ऐसे कार्य थे जिसने देशवासियों को यह बता दिया कि देश में अपनी चुनी हुई सरकार की सत्ता नहीं है, बल्कि एक बार फिर अंग्रेजों का राज कायम हो गया है। कैदियों के प्रति कोई दया कोई माया और कोई सुविधाएं नहीं थी, बस हर तरफ जुल्म की तस्वीरें दिखाई दे रही थी।

आपातकाल के दिनों में पुलिस प्रताड़ना के शिकार, जेलयात्री और लंबे समय तक जिला कारागार मिर्जापुर में सजा काटने वाले रॉबर्ट्सगंज नगर के निवासी शिव शंकर गुप्ता आज भी इमरजेंसी की याद कर सिहर उठते हैं, किस प्रकार उन पर पुलिस ने जुल्म ढाया था। वे बताते हैं कि 25 जून 1975 को जब देश में आपातकाल तत्कालीन प्रधानमंत्री द्वारा लागू किया गया था,उस समय मै राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जुझारू, कर्मठ सदस्य था

और मेरे नेतृत्व में नगर में शाखाएं आदि लगा करती थी, विपक्षी दल के अनुषांगिक संगठन का सदस्य होने के कारण हमारे संगठन के लोग भी शासन और प्रशासन के निशाने पर आ गए और गिरफ्तारियां शुरू हो गई थी, मुझे याद है कि 29 जून 1975 का ही दिन था, मैं अपनी दुकान पर बैठा हुआ था, तभी पुलिस की एक जीप दुकान के सामने आकर रुकी दो पुलिस निकल कर बाहर आये और बोले कि चलिए आपको दरोगा जी बुला रहे हैं, मैं उस समय नंगे पांव दुकान की गद्दी पर बैठा हुआ था मैंने कहा कि मैं चप्पल पहन लूं लेकिन पुलिस वालों ने मुझे चप्पल तक पहने तक का मौका नहीं दिया और जबरदस्ती जीप पर बैठाकर थाने तक ले गए और वहां पर अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करते हुए गालियां दिये और डराया धमकाया, मेरी लड़की जब खाना लेकर थाने गई तो उसे वहां से गालियां देकर भगा दिया गया और मुझे खाना तक नहीं खाने दिया और रात में बालू के ट्रक पर बैठा कर मुझे जिला कारागार मिर्जापुर ले जाया गया, जेल की फाटक देखकर मेरा हौसला टूटने लगा और मुझे ऐसे बैरक में डाला गया जहां पर शातिर अपराधी बंद थे, मुझे उन खतरनाक कैदियों के प्रताड़ना का शिकार होना पड़ा, जेल के मैनुअल के अनुसार खाना मिलने की का समय खत्म हो गया था,

इसलिए मुझे रात को भूखा ही सोना पड़ा, सवेरे किसी तरह से दिनचर्या की शुरुआत हुई और कई दिनों तक मुझे शातिर अपराधियों वाली है बैंरक में रहना पड़ा, जब जेल में राजनीतिक बंदियों की संख्या अधिक हो गई तब मैंने निवेदन किया कि मुझे भी उनके साथ रखा है और मेरी बात को जेल प्रशासन ने मानते हुए मुझे राजनीतिक बंदी के रूप में उस सेल में रखा गया जहां पर मिर्जापुर जनपद के तमाम राजनेता, संगठन के लोग कैद थे।

शादी की बंदी होने के कारण हम लोगों को अलग से खाने-पीने का कच्चा सामान मुहैया कराया जाता था जेल में राजनीतिक बंदियों की संख्या लगभग 100 तक पहुंच गई थी इसलिए हम लोग अपने अपने समूह में खाना बनाने का कार्य करते थे, खाना बनाने में सबसे ज्यादा दिक्कत नहीं किया क्योंकि हम लोगों को ईंधन मुहैया नहीं कराया जाता हम लोगों ने जेल परिसर में लगे और उसका प्रयोग ईंधन के रूप में हम लोगों ने जेल परिसर में लगी कटहल के बीच और उसके उपयोग जब इस बात की जानकारी तो बहुत ही नाराज हुआ और कहा कि मैं जेल की पगली घंटी बजवा पर इतना कहूंगा कि तुम लोग जीवन भर याद रखोगे,

हमारे पास चुप रहने के अलावा कोई चारा नहीं था और काम चलता रहा। हम लोगों के साथ ही 14 वर्ष का बालक भी था जो दिन रात रोता रहता था लेकिन हम लोग उसे अभिभावक तुल्य होने के नाते उसका पूरा ख्याल रखते थे और अपनी समूह में शामिल कर लिया था वह खाना बनाने में हम लोगों की मदद करता था। धीरे धीरे मूवी जेल जीवन जीने का आदी हो गया।

मेरे घरवाले बहुत ही परेशान थे मेरे पिताजी मिर्जापुर के जाने-माने अधिवक्ता महेंद्र प्रताप सिंह यहां जमानत के लिए गए उन्होंने बढ़ेगी ईमानदारी के साथ मेरे पिताजी से मात्र ढाई ₹250 लिया जमानत उच्च न्यायालय इलाहाबाद से कराना था इसलिए इस कार्य में विलंब अंततः मेरा जमानत हो गया और मैं घर लौट कर इमरजेंसी के खिलाफ आंदोलन में संलग्न हो गया।

शासन के खिलाफ अपने धन से पर्चा छपवा कर आसपास के क्षेत्रों में उसका वितरण कराना आदि कार्य अपने संगठन के माध्यम से करता था, इसमें मेरे पिताजी का पूर्ण रूप से सहयोग था वे कहते थे कि हमारी नगर के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं द्वितीय टाउन एरिया अध्यक्ष बलराम दास केसरवानी ने स्वतंत्र आंदोलन में भाग लिया और वे जेल में पुलिस प्रताड़ना को भी सहा था, उन्हीं के पद चिन्हों पर चलो, मैंने भी अपने पिताजी की बातों को आत्मसात किया और आंदोलन में सक्रिय रहा ।

पुलिस का खुफिया तंत्र इतना मजबूत था कि मुझे शासन प्रशासन के विरुद्ध पर्चा बांटने के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया गया।
मुझे अपनी गिरफ्तारी का न तो कोई डर था, ना कोई भय था, ना कोई दुख था अब मैंने मान लिया था कि मुझे इमरजेंसी खत्म होने तक आंदोलन में सक्रिय रहना है, इस बार जेल में मेरी भेंट हुई अहरौरा नगर के रहने वाले आर एस एस के सक्रिय कार्यकर्ता राम जी के केसरी से। उनके कारण हम लोगों को खाने- पीने की सुविधाएं मिलने लगी और उनके मुलाकातों द्वारा हम लोगों को अच्छी खाद्य सामग्री जेल मैं मिलने लगी।

बाटी चोखा हम लोगों का जेल में सबसे पसंदीदा भोजन था और हम लोगों से 25 प्रतिशत कमीशन लेकर पुलिसकर्मी सामान मुहैया कराते थे, हम लोग जेल से मिलने वाले अनाज को मिट्टी के बर्तन में सुरक्षित रखते थे और जब कोई त्यौहार पड़ता था तो उसे जेल के माध्यम से बेचकर मिठाई वगैरह मंगवा कर खाते थे और अपनी खुशियां एक दूसरे से साझा करते थे।

इस बार जेल में मैं काफी दिनो तक रह गया और इसी बीच होली का त्यौहार भी आ गया हम लोगों ने होली का त्यौहार जेल में हंसी खुशी रंग अबीर गुलाल खेल कर और विभिन्न प्रकार के पकवान खा कर मनाया, इस दिन हमारे राजनीतिक बंदियों के सभी समूहों के लोगों ने विभिन्न प्रकार के व्यंजन तैयार किया और हम सभी एक दूसरे को मिल बांट कर खाया। महीनों बाद हम लोगों को जमानत मिल गई और हम लोग जेल के बाहर आ गए और देश से इमरजेंसी भी खत्म हो गई, सत्ता का परिवर्तन हुआ और हम लोगों का सपना पूरा हुआ।

सूबे में जब मुलायम सिंह यादव की सरकार बनी तो उन्होंने हम लोकतंत्र सेनानियों को याद किया और प्रदेश की राजधानी लखनऊ में सम्मान का एक बड़ा कार्यक्रम आयोजित हुआ, इस कार्यक्रम में संयोगवश अपने स्वास्थ्य के कारणो से मैं उपस्थित नहीं हो पाया। लेकिन हम सब की ओर से लोकतंत्र सेनानी मंगरु यादव गए वहां पर उनका भव्य स्वागत हुआ और आपातकाल के अपने साथियों और स्थिति परिस्थितियों पर भाषण भी दिया था, मुझे लोकतंत्र सेनानी का प्रमाण पत्र डाक के द्वारा प्राप्त हुआ, साथ ही साथ ₹500 भी।

हम सभी लोकतंत्र सेनानी इस सम्मान को प्राप्त कर अभिभूत हुए और शासन द्वारा हम लोगों को पेंशन मिलता रहा, सूबे में माननीय योगी आदित्यनाथ जी के सरकार आने के बाद हम लोगों का पेंशन में ₹5000 की बढ़ोतरी हो गई और वर्तमान समय में हम लोगों को ₹20000 पेंशन प्राप्त हो रहा है।
लोकतंत्र की बहाली के लिए हमारा आंदोलन सफल रहा ।





















