मुफ्त योजनाएं : विकास या निर्भरता?

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में सरकार द्वारा मुफ्त बटने वाले  राशन एवं अन्य योजनाओं पर सवाल उठाते हुए सख्त रुख अख्तियार किया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनाव से ठीक पहले घोषित की जाने वाली मुफ्त की योजनाओं के चलते ही लोग काम करने के लिए तैयार नहीं है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा उठाए गए इन सवालों पे चर्चा खत्म भी नहीं हुई थी कि उत्तर प्रदेश सरकार ने रानी लक्ष्मीबाई स्कूटी योजना का ऐलान कर दिया।

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इस योजना के लिए सरकार ने 400 करोड़ के बजट की स्वीकृति दे दी अब सवाल यह उठता है कि क्या किसी राज्य के आर्थिक स्थिति के लिहाज से यह उचित है?
मुफ्त की योजनाओं का व्यापक अनुभव यही रहा है कि वे अनुत्पादक साबित हुई है। साथ ही इससे सरकार पर वित्तीय बोझ ही बढ़ता है। जिसके परिणाम स्वरूप यह देखा गया है कि या तो सरकार आगामी बजट में शिक्षा,

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स्वास्थ्य या अन्य किसी वित्तीय आवंटन को कम कर देती है जिससे कि समाज के एक बड़े वर्ग को इसका खामियाजा उठाना पड़ता है इसके दुष्प्रभाव दूरगामी होते हैं। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने नए बन रहे महाविद्यालयों के लिए 50 करोड़ रुपए तय की है जबकि रानी लक्ष्मीबाई योजना के लिए 400 करोड़ रुपए आवंटित किए हैं।

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आजकल चुनाव के दौरान अक्सर ही देखने को मिलता है कि राजनीतिक दलों में मुफ्त की योजनाओं की घोषणा करने में एक होड़ सी मची रहती है। जिससे कि मतदाताओं को प्रलोभन देकर उनके स्वतंत्र निर्णय को प्रभावित कर दिया जाता है। मतदाताओं को यह देखना चाहिए कि राजनीतिक दलों का लक्ष्य दीर्घकालिक विकास होना चाहिए ना कि तात्कालिक लाभ जो की एक स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव का आधार है।

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अगर इसको थोड़ा और गहराई में जाकर समझने की कोशिश करें तो क्या यह कहना गलत नहीं होगा कि यह चुनाव में जीत हासिल करने के लिए जनता को रिश्वत देने का नया तरीका इजात किया गया है। सत्ताधारी सरकार अगर सच में देश और समाज को विकास की गति प्रदान करना चाहती है तो यह मुफ्त की योजनाओं के बदले देश में रोजगार के अवसर पैदा करके देश की बुनियादी ढांचे को और मजबूत किया जा सकता है।

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सरकार को मुफ्त की योजनाओं के बदले राशन, शिक्षा आदि सुविधाओं पर सब्सिडी देने पर भी विचार करना चाहिए।
भारत के निर्वाचन आयोग को राजनीतिक दलों द्वारा जारी घोषणा पत्रों का गहन अध्ययन कर अतार्किक एवं अव्यवहारिक योजनाओं पर प्रतिबंध लगाते हुए उन पर आचार संहिता के नियमों को कड़ाई से लागू कराना चाहिए।
न्यायिक हस्तक्षेप से निर्वाचन आयोग की शक्तियों को और विस्तृत और प्रबल बनाया जा सकता है जिससे कि समाज को ऐसी रिश्वतखोरी योजनाओं से बचाया जा सके।
कुशाग्र कौशल शर्मा

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संस्कृति LIVE द्वारा प्रकाशित

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