राजेश्वरी सरोज दास ने किया था दुद्धी में अंग्रेजों के अत्याचारों का विरोध

HIGHLIGHTS

  • अंग्रेज सिपाहियों के शोषण के खिलाफ दुद्धी में खड़ा किया था आंदोलन।
  • जनपद की एकमात्र महिला स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को देवी जी कहा करते थे।
  • भारत माता को आजाद कराने के लिए लिया था, आजीवन अविवाहित रहने का लिया था संकल्प।
  • अध्यापन कार्य छोड़कर कूद पड़ी थी स्वतंत्रता आंदोलन में।
  • दुद्धी तहसील के सिंगरौली परगना की निवासिनी थी देवी जी।
  • आजादी के बाद झारखंड के नगर ऊंटरी, गढ़वा विधानसभा क्षेत्र से की चुनी गई थी विधायक।
  • बिहार विधानसभा की दो बार रही अध्यक्ष।
  • आदिवासियों के हितो, नारी शोषण के विरुद्ध आजीवन संघर्षशील रही।

सोनभद्र। महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए स्वाधीनता आंदोलन में महिलाओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
  सामाजिक, पारिवारिक वर्जनाओ, रूढ़ियों, परंपराओं, पर्दाप्रथा तोड़कर पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ मोर्चा लेने वाली आदिवासी बाहुल्य जनपद सोनभद्र के दुद्धी तहसील के सिंगरौली परगना की वीरांगना सुश्री राजेश्वरी सरोज दास (देवी जी) को सोनभद्र जनपद की प्रथम महिला स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, जेलयात्री होने का गौरव प्राप्त है।
  

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Deepak Kumar kesarwani
दीपक कुमार केसरवानी
(इतिहासकार)

  इतिहासकार दीपक कुमार केसरवानी के अनुसार-“भारत के एकमात्र जनपद सोनभद्र के बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश,छत्तीसगढ़ राज्य की राजनीतिक, भौगोलिक सीमाओं से घिरा सोनभद्र के दुद्धी तहसील का स्वाधीनता आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
 

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  1942 में जब महात्मा गांधी ने अंग्रेजो के खिलाफ भारत छोड़ो आंदोलन चलाया तब इस आंदोलन की गूंज सोनभद्र जनपद के दूरस्थ वनवासी  बाहुल्य इलाकों में पहुंची और यहां के लोगों ने अंग्रेजो के खिलाफ मोर्चा लेने के लिए हथियार उठा लिया था, उनमें सिंगरौली नगर की समाजसेवी, तेजतर्रार एवं अपने हृदय में आजादी प्राप्त करने का सपना संजोए सुश्री राजेश्वरी सरोज दास (देवी जी)  ने आदिवासी महिलाओं को संगठित कर रूढ़िवादिता, पर्दा प्रथा को तोड़ते हुए घर की दहलीज को लांघते हुए अंग्रेजों द्वारा आदिवासी महिलाओं के आर्थिक,

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शारीरिक शोषण के विरुद्ध अध्यापन कार्य छोड़कर भारत छोड़ो आंदोलन में कूद पड़ी थी। दुद्धी के ग्रामीण, जंगली इलाकों में भारत छोड़ो आंदोलन का प्रचार- प्रसार करते हुए स्त्रियों- पुरुषों, युवाओं को जुड़ने का आह्वान किया,इनके पीछे चल पड़ी थी आजादी के दीवानो की टोलियां।
  

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इनके आक्रामक शासन/ प्रशासन के विरुद्ध चलाए जाने वाले अभियानो से  मिर्जापुर का कलेक्टर घबडा उठा, इन्हें भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने के जुर्म में गिरफ्तार कर मिर्जापुर जिला कारागार भेज दिया गया।न्यायालय द्वारा इन्हें भारत छोड़ो आंदोलन, देशद्रोही गतिविधियों में भाग लेने, ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ षड्यंत्र रचने के जुर्म में 2 वर्ष की कठोर एवं ₹50 जुर्माना की सजा हुई।

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उस समय किसी महिला की गिरफ्तारी और जेल की सजा काटना अपने आप में कठोर सामाजिक सजा थी, जिसे सुश्री राजेश्वरी सरोज दास  (देवी जी) ने भोगा।
   2 वर्ष की सजा काटने के बाद सुश्री राजेश्वरी सरोज दास (देवी जी) ने जुर्माना की रकम देने से साफ-साफ इंकार कर दिया, जिसके एवज में उन्हें 1 महीने अतिरिक्त जेल की सजा भुगतनी पड़ी। मिर्जापुर जेल से रिहा होने के बाद सुश्री राजेश्वरी सरोज दास (देवी जी) पुनः आंदोलनकारी गतिविधियों में लग गई,नारी शिक्षा अधिकारों, किसानों, मजदूरों के हितो के लिए अंग्रेजी शासन और जमींदारों के खिलाफ आजीवन संघर्ष किया।

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उनका मानना था कि शिक्षा के बिना समाज अधूरा है। जब कोई संघर्ष में हारने लगता था तो वह कहतीं थी कि मैं तो जेल जाते समय ट्रेन से कूद गई थी और तुम जीवन रूपी ट्रेन (संघर्ष) से हार रहे हो। इसके अलावा जब घर में खाने में कीड़ा वगैरह मिल जाने पर कोई उसे फेंकने लगता था तो वह कहती हैं कि थीं कि अन्न को मत फेंको बल्कि इसमें से कीड़ा निकाल कर फेंक दो। अंग्रेजों ने जेल में हमें कीड़ा और पिल्लू वाला खाना ही दिया करते थे। हम उसे निकाल कर फेंक देते और खाना खा लेते थे। इसी खाने से मिली ताकत के बल पर अच्छे खाने और स्वराज के लिए संघर्ष करते थे।
   सुश्री राजेश्वरी सरोज दास (देवी जी) अनुशासन को बहुत महत्व देतीं थी। किसी का कोई काम हो तो वह तुरंत चली जातीं थी, बिना समय या मौसम का परवाह किए। एक बार उन्हें लू गई और वह बेहोश होकर गिर गईं। गांव के लोग उन्हें अपने घर ले गए और पूरे शरीर में अमझोरा लगाया तब उन्हें होश आया। इसके बाद भी वह रूकी नहीं और लोगों से मिलने लगीं।’
उनकी पहचान एक सभ्य और अनुशासन प्रिय महिला के रूप में होती थी।
   सुश्री राजेश्वरी सरोज दास (देवी जी) जब पलामू कांग्रेस की कोषाध्यक्ष थीं। तब उन्होंने पलामू के सबसे दोपिछड़े क्षेत्रों से जैसे भंडरिया, रंका, गारू एवं महुआडांड़ में दलितों एवं आदिवासियों के बीच स्वतंत्रता आंदोलन के जागरण का मंत्र फूंका था।
  15 अगस्त 1947 आजादी के बाद 1952 में स्वतंत्र भारत में हुए पहले विधानसभा चुनाव में वह बिहार के पलामू जनपद के विधानसभा नगर ऊंटारी से प्रथम बार विधायक चुनी गईं। इसके बाद 1957 में हुए चुनाव में वह गढ़वा विधानसभा से दूसरी बार विधायक चुनी गई। दूसरी बार विधायक चुने जाने के बाद सुश्री राजेश्वरी सरोज दास (देवी जी) को श्रीकृष्ण सिंह मंत्रिमंडल में बतौर उपमंत्री शामिल किया गया। बिहार में मंत्री बनने वाली वह पहली महिला थीं।  कालांतर में बिहार विधानसभा की दो बार विधानसभा अध्यक्ष भी रहीं।
   पराधीनता से स्वाधीनता तक की राजनीति, सामाजिक यात्रा करती हुई भारत माता की इस बेटी ने सोनभद्र जनपद से सटे झारखंड राज्य के डाल्टनगंज में 4 जून 1994 को अंतिम सांस लिया‌

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उसे फेंकने लगता था तो वह कहती हैं कि थीं कि अन्न को मत फेंको बल्कि इसमें से कीड़ा निकाल कर फेंक दो। अंग्रेजों ने जेल में हमें कीड़ा और पिल्लू वाला खाना ही दिया करते थे। हम उसे निकाल कर फेंक देते और खाना खा लेते थे। इसी खाने से मिली ताकत के बल पर अच्छे खाने और स्वराज के लिए संघर्ष करते थे।
  

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सुश्री राजेश्वरी सरोज दास (देवी जी) अनुशासन को बहुत महत्व देतीं थी। किसी का कोई काम हो तो वह तुरंत चली जातीं थी, बिना समय या मौसम का परवाह किए। एक बार उन्हें लू गई और वह बेहोश होकर गिर गईं। गांव के लोग उन्हें अपने घर ले गए और पूरे शरीर में अमझोरा लगाया तब उन्हें होश आया। इसके बाद भी वह रूकी नहीं और लोगों से मिलने लगीं।’
उनकी पहचान एक सभ्य और अनुशासन प्रिय महिला के रूप में होती थी।
  

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सुश्री राजेश्वरी सरोज दास (देवी जी) जब पलामू कांग्रेस की कोषाध्यक्ष थीं। तब उन्होंने पलामू के सबसे दोपिछड़े क्षेत्रों से जैसे भंडरिया, रंका, गारू एवं महुआडांड़ में दलितों एवं आदिवासियों के बीच स्वतंत्रता आंदोलन के जागरण का मंत्र फूंका था।

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  15 अगस्त 1947 आजादी के बाद 1952 में स्वतंत्र भारत में हुए पहले विधानसभा चुनाव में वह बिहार के पलामू जनपद के विधानसभा नगर ऊंटारी से प्रथम बार विधायक चुनी गईं। इसके बाद 1957 में हुए चुनाव में वह गढ़वा विधानसभा से दूसरी बार विधायक चुनी गई।

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दूसरी बार विधायक चुने जाने के बाद सुश्री राजेश्वरी सरोज दास (देवी जी) को श्रीकृष्ण सिंह मंत्रिमंडल में बतौर उपमंत्री शामिल किया गया। बिहार में मंत्री बनने वाली वह पहली महिला थीं।  कालांतर में बिहार विधानसभा की दो बार विधानसभा अध्यक्ष भी रहीं।

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   पराधीनता से स्वाधीनता तक की राजनीति, सामाजिक यात्रा करती हुई भारत माता की इस बेटी ने सोनभद्र जनपद से सटे झारखंड राज्य के डाल्टनगंज में 4 जून 1994 को अंतिम सांस लिया‌







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संस्कृति LIVE द्वारा प्रकाशित

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