स्वामी विवेकानंद जयंती मनाने की परंपरा सोनभद्र नगर में व्यवसायी विश्वनाथ प्रसाद केडिया ने शुरू किया था

HIGHLIGHTS

  • प्रत्येक 12 जनवरी को मनाई जाती थी जयंती
  • नगर में होता था स्वामी बाल विवेकानंद  बाल विद्यालय का संचालन
  • पू०नगर पालिका अध्यक्ष अजय शेखर के कार्यकाल में हुआ था स्वामी विवेकानंद प्रेक्षागृह का निर्माण
  • पू० चेयरमैन कृष्ण मुरारी गुप्ता के कार्यकाल में स्वामी जी की मूर्ति की स्थापना
  • भव्य कार्यक्रम में मूर्ति  अनावरण किया था बीएचयू के कुलपति गिरीश चंद्र त्रिपाठी ने

सोनभद्र। रॉबर्ट्सगंज नगर इतिहास, संस्कृति, साहित्य, कला से समृद्धशाली रहा है। इस परंपरा का आरम्भ कि  नगर में निवास करने वाले साहित्यकारों, पत्रकारों, समाजसेवियों ने।
  विंध्य संस्कृति शोध समिति उत्तर प्रदेश ट्रस्ट के निदेशक/इतिहासकार दीपक कुमार केसरवानी के अनुसार-” समाजसेवी, शिक्षा, संस्कृति के प्रति जागरूक व्यवसायी विश्वनाथ प्रसाद केडिया द्वारा सन 1925 में स्थापित संस्कृत महाविद्यालय में प्रतिवर्ष तुलसीदास जयंती कालिदास जयंती आदि महापुरुषों की जयंती पर तमाम प्रकार के सांस्कृतिक साहित्यिक एवं खेलकूद वाद-विवाद अंताक्षरी प्रतियोगिता का आयोजन कराया जाता था।

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  विश्वनाथ प्रसाद केडिया ने स्वामी विवेकानंद की जन्मभूमि, कर्मभूमि और उनसे संबंधित तीर्थ स्थलों की यात्रा कर चुके थे और उनके आचार- विचार- व्यवहार, शिक्षा से काफी प्रभावित थे।  नगर में सर्वप्रथम स्वामी जी की जयंती मनाने की परंपरा कायम किया।  शिक्षा के प्रति अभिरुचि के कारण केडिया जी ने स्वामी विवेकानंद बाल विद्यालय की स्थापना किया, इस विद्यालय की स्थापना का उद्देश्य छात्र-छात्राओं में स्वामी विवेकानंद के शिक्षा, विचारों एवं भारतीय संस्कृति, गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस आदि धार्मिक ग्रंथों में वर्णित विचारों का प्रचार-प्रसार था।

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इस स्कूल ने कई स्थानों पर अपना सफरनामा तय किया। तमाम परेशानियों के बावजूद यह स्कूल संचालित होता रहा अंततः विद्यालय के संस्थापक विश्वनाथ प्रसाद केडिया ने इस स्कूल को अपने भवन (ब्रह्मा बाबा की गली) में स्थानांतरित किया।
प्रधानाचार्य त्रिवेणी राम मिश्र, मंजू लता मनिक के कुशल नेतृत्व एवं संचालन में विद्यालय संचालित होता था। प्रतिदिन प्रार्थना के बाद सुंदरकांड कक्षाओं में छात्र- छात्राएं एवं अध्यापक- अध्यापिकाएं सुंदरकांड का सस्वर पाठ बिना किसी भेदभाव के करते थे। और महीने में 1 दिन गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस का पाठ चंद्रकला श्रीवास्तव बहनजी किया करती थी।
 

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धार्मिक एकता का संदेशवाहक इस विद्यालय में प्रत्येक 12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद की जयंती बड़े ही धूमधाम के साथ मनाई जाती थी और इस कार्यक्रम में नगर के सभी लोग भाग लेते थे, और स्वामी जी के विचारों को छात्र- छात्राओं को अवगत जाता था। तभी से हम लोगों ने स्वामी विवेकानंद के बारे में जानना शुरू कर दिया था।

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इस अवसर पर स्वामी विवेकानंद जी के चित्र वाले कैलेंडर का भी वितरण किया स्कूल के सभी छात्र-छात्राओं में किया जाता था। ताकि स्वामी विवेकानंद का चित्र प्रत्येक घर में हो और घर के सभी सदस्य, छात्र-छात्राएं इनसे प्रेरणा प्राप्त कर सके।
   स्वामी विवेकानंद जी के आचार- विचार, व्यवहार, शिक्षा का प्रचार- प्रसार इस विद्यालय के माध्यम से जन-जन में हुआ।
  स्कूल में शिक्षा प्राप्त छात्र स्वामी जी के विचारों से प्रेरित थे और उनके बताए हुए मार्ग पर चलने का प्रयास किया करते थे।

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मधुरिमा साहित्य गोष्ठी के निदेशक मधुरमा साहित्यकार कवि अजय शेखर के अनुसार-“स्वामी विवेकानंद जी भारतीय संस्कृति के अग्रदूत थे, संपूर्ण विश्व में भारतीय संस्कृति, धर्म, अध्यात्म का प्रचार- प्रसार किया था, इसीलिए नगर में निर्मित प्रथम प्रेक्षागृह का नामकरण स्वामी विवेकानंद प्रेक्षागृह किया गया।

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विवेकानंद बाल विद्यालय के  छात्र रहे पूर्व नगरपालिका अध्यक्ष कृष्ण मुरारी गुप्ता के कार्यकाल में आयोजित भव्य कार्यक्रम स्वामी विवेकानंद की मूर्ति का अनावरण बीएचयू के कुलपति गिरीश चंद्र त्रिपाठी द्वारा किया गया था।
आज रॉबर्ट्सगंज नगर में पूर्वजों द्वारा जिन स्वामी जी की स्मृतियों को सजाया गया है वह आगामी पीढ़ी के लिए अनुकरणीय है।

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  समय के साथ- साथ स्वामी विवेकानंद बाल विद्यालय,संस्थापक विश्वनाथ प्रसाद केडिया भले काल कवलित  हो गए हो लेकिन नगर के प्रेक्षागृह में स्थापित स्वामी विवेकानंद की मूर्ति नगर वासियों को धर्म, संस्कृति, सभ्यता की रक्षा का संदेश दे रही है।

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