HIGHLIGHTS
- घाटों पर हजारों की सख्या में जुटे श्रद्धालु
- व्रतियों ने विधि विधान से पूजन- अर्चन कर दिया भगवान भास्कर को अर्घ्य

सोनभद्र। हे सुरुज देव पूरा कर द अरजिया हमार. की विनती के साथ लोक आस्था का चार दिनी महापर्व छठ का शुक्रवार को उगते सूर्य को अर्घ्य देने के साथ संपन्न हुआ।

कार्तिक शुक्ल सप्तमी की सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद व्रतियों ने कच्चे दूध का शरबत पीकर पारण किया। इस दौरान सोनांचल के सभी छठ घाटों पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी रही। पूरी रात रतजगा कर छठ मइया की आराधना एवं छठ गीतों के गाने का दौर चलता रहा।

जगह-जगह घाटों पर भोजपुरी छठ गीतों की सरिता बहाई गई। बिरहा मुकाबला, देवी जागरण, झांकी जैसे कार्यक्रमों से भी पर्व को यादगार बनाया गया।
राबर्ट्सगंज नगर स्थित राम सरोवर तालाब, अकड़हवा पोखरा, बढ़ौली तालाब, मेहुड़ी नहर, मरकरी नहर समेत जिले के तमाम जलाशयों के तटों पर बनाए गए पूजा घाटों पर सूर्योपासना के शाम ढलते सूर्य को अर्घ्य देकर जो आराधना शुरु हुई वह सिलसिला सोमवार की सुबह तक जारी रहा।

व्रतियों ने पूजा वेदी के पास रतजगा कर भोर होते ही व्रती महिलाएं और पुरुष पानी में खड़े होकर भगवान सूर्य का इंतजार करते हुए पूजन-वंदन करने लगे।
सूर्य उदय होने तक छठ गीत गान एवं छठ मइया के आराधना का क्रम जारी रहा।

जैसे ही सूर्यदेव की लालिमा बादल से बाहर आई, व्रतियों के परिवार के लेाग पूजन सामग्री लेकर पानी के किनारे पहुंच गए, कमर भर पानी में खड़े होकर उपवास रखने वालों को सूरज देव को अर्घ्य अर्पित किया। इसके बाद सुख-समृद्धि एवं खुशहाली का आर्शीवाद मांगते हुए, खुशी-खुशी घर को लौट आए।
पर्व को सकुशल संपन्न होने से सुरक्षा में लगे पुलिस के जवानों ने राहत की सांस ली। इसी तरह वैनी, मधुपुर, सांगोबांध, व गुरमा में भी महिलाओं ने सूर्य को अर्घ्य दिया।

ऊर्जांचल के छठ घाटों पर प्रसाद लेने को उमड़ी भीड़
अनपरा। सूर्य उपासना का महापर्व छठ पूजा ऊर्जांचल में सोमवार को उगते सूर्य को अर्ध्य देकर व्रतियों ने अपना व्रत पूरा किया।
डिबुलगंज पुलिया छठघाट, अनपरा शिवमंदिर, कहुआनाला छठघाट, परासी, रेणुसागर, ककरी, बीना, शक्तिनगर स्थित चिल्काझील, खड़िया चैतन्यवाटिका, कोटा बस्ती बोर्ड प्वाइंट आदि छठ घाटों पर सुबह में मेले जैसा माहौल रहा। छठ घाटों पर सुबह चार बजे से ही आने का सिलसिला व्रतधारियों का शुरू हो गया।

कुछ महिलाओं ने रात भर छठ घाट पर ही जागरण किया। चहुंओर बज रहे ढोल, नगाड़े व आतिशबाजी से पूरा इलाका श्रद्वा से सराबोर रहा। भाष्कर भगवान की लालिमा देखते ही व्रतधारियों में उत्साह भर गया। विधि-विधान से सूर्य भगवान को अर्घ्य अर्पित किया।बीजपुर।

एनटीपीसी की रिहंद स्टेशन के आवासीय कालोनी परिसर में स्थित लेक पार्क में बने सूर्य कुंड व शिव मंदिर प्रांगण में सादगीपूर्वक वातावरण में छठ पर्व मनाया गया। लोगों ने बड़े ही हर्षोल्लास के साथ इस पर्व को मनाया। सूर्य कुंड व तालाब को लाइटों व झालरों के जरिए काफी आकर्षित बनाया गया था। उक्त स्थानों पर श्रद्धालुओं को नहाने, पूजा करने, वस्त्र बदलने आदि हेतु समुचित व्यवस्था की गई थी।

इसके अलावा शुक्रवार की सुबह क्षेत्र के जरहा दुदहिया मंदिर, बीजपुर बाजार, अजीरेश्वर धाम, डोडहर, सिरसोती आदि स्थानों पर नदी, तालाबों, नहरों तथा जलाशय किनारे बने घाटों पर व्रतियों ने उगते सूर्य देव को दूसरा अर्घ्य दिया।

इतिहासकार दीपक कुमार केसरवानी के अनुसार- “हमारी संस्कृति में उगते हुए सूर्य को अर्घ देने की परंपरा सदियों से कायम है कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की षष्ठी को ढलते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।
लोक मान्यता है कि-सुबह, दोपहर और शाम तीन समय सूर्य देव विशेष रूप से प्रभावी होते हैं।
सुबह के वक्त सूर्य की आराधना से सेहत के लिए बेहतर होता है। दोपहर में सूर्य की आराधना से नाम और यश बढ़ता है. शाम के समय सूर्य की आराधना से जीवन में संपन्नता आती है।

उन्होंने बताया कि शाम के समय सूर्य अपनी दूसरी पत्नी प्रत्यूषा के साथ रहते हैं। इसलिए प्रत्यूषा को अर्घ्य देना तुरंत लाभ देता है.जो डूबते सूर्य की उपासना करते है,अस्त होते सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा इंसानी जिंदगी हर तरह की परेशानी दूर करने की शक्ति रखती है। फिर समस्या सेहत से जुड़ी हो या निजी जिंदगी से।

ढलते सूर्य को अर्घ्य देकर कई मुसीबतों से छुटकारा पाया जा सकता है। जो लोग बिना कारण मुकदमे में फंस गए हों,जिन लोगों का कोई काम सरकारी विभाग में अटका हो। जिन लोगों की आँखों की रौशनी घट रही हो,जिन लोगों को पेट की समस्या लगातार बनी रहती हो,जो विद्यार्थी बार-बार परीक्षा में असफल हो रहे हों।

आगे बताया कि इस व्रत में सूर्य देवता की पूजा की जाती है, जो प्रत्यक्ष दिखते हैं और सभी प्राणियों के जीवन के आधार हैं… सूर्य के साथ-साथ षष्ठी देवी या छठ मैया की भी पूजा की जाती है।
छठ पूजा को षष्ठी देवी माता को कात्यायनी माता के नाम से भी जाना जाता है। नवरात्रि के दिन में हम षष्ठी माता की पूजा करते हैं षष्ठी माता कि पुजा घर परिवार के सदस्यों के सभी सदस्यों के सुरक्षा एवं स्वास्थ्य लाभ के लिए करते हैं षष्ठी माता की पूजा, सुरज भगवान और मां गंगा की पूजा देश में एक लोकप्रिय पूजा है। यह प्राकृतिक सौंदर्य और परिवार के कल्याण के लिए की जाने वाली एक महत्वपूर्ण पूजा है।
इस पुजा में गंगा स्थान या नदी तालाब जैसे जगह होना अनिवार्य हैं यही कारण है कि छठ पूजा के लिए सभी नदी तालाब कि साफ सफाई किया जाता है और नदी तालाब को सजाया जाता है प्राकृतिक सौंदर्य में गंगा मैया या नदी तालाब मुख्य स्थान है।
साहित्यकार प्रतिभा देवी के अनुसार-“छठ से जुड़ी पौराणिक लोक कथाएँ भारतीय लोक में बहु प्रचलित है -“ रामायण के अनुसार लंका विजय के बाद रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की। सप्तमी को सूर्योदय के समय पुनः अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया था।

महाभारत के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। सूर्यपुत्र कर्ण ने सूर्यदेव की पूजा शुरू की। कर्ण भगवान सूर्य के परम भक्त थे। वह प्रतिदिन घण्टों कमर तक पानी में ख़ड़े होकर सूर्यदेव को अर्घ्य देते थे। सूर्यदेव की कृपा से ही वे महान योद्धा बने थे। आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही पद्धति प्रचलित है।




















