श्री मद्भागवत गीता में भगवान श्री कृष्ण ने संसार को दुःखालयम् अशाश्वतम् कहा है यानि संसार दुःखों का घर है और शाश्वत नहीं है। ये हर क्षण बदलता रहता है। आमतौर पर लोग समझते हैं कि दुःख पाप के कारण होता है या फिर भगवान के कोप के कारण लेकिन ये पूर्णतः सत्य नहीं है। भगवान तो कृपानिधान है फिर वो किसी पर रुष्ट क्यों होंगे और दुःख क्यों देंगे।

मनुष्य स्वयं ही अपने कर्मों से अपने दुःखों का कारण बनता है।दुःख क्या है- दुःख सामान्य रूप से मन की वह अवस्था है जो आपके किसी कार्य के अपेक्षित परिणाम ना मिलने के कारण होता है। दुःख कितने प्रकार का है- शास्त्र के अनुसार दुःख तीन प्रकार के माने गए हैं। १. आध्यात्मिकः इसके अंतर्गत शारीरिक दुःख जैसे रोग, चोट, आघात, इत्यादि और मानसिक दुःख जैसे चिंता, अपमान, क्रोध, भय, शोक इत्यादि आते हैं।

२. आधिभौतिकः ये वे दुःख है जो किसी भौतिक कारणों से होते हैं जैसे साँप, मच्छड़ आदि के काटने। उदाहरण के लिए, अगर आपके घर की बिजली चली गई और आप गर्मी से परेशान हैं तो उस कारण से होने वाला दुःख । ३.अधिदैविकः जो दुःख प्राकृतिक शक्तियों के कारण होता है, जेसे, आँधी, वर्षा, बज्रपात, शीत, ताप इत्यादि। इन्हीं तीनों को रामचरितमानस में दैहिक, दैविक और भौतिक ताप कहा गया है। दुःख को ताप कहने का कारण है कि ये आपको जलाता रहता है। ये दुःख हमारे शारीरिक और मानसिक कर्मों के फल होते हैं।

दुःख का मूलभूत कारण क्या है। महर्षि पतंजलि ने योग सूत्र 2.3 में पांच क्लेशों का उल्लेख किया है”अविद्या-अस्मिता-राग-द्वेष-अभिनिवेश-क्लेश जो जीवन में हमारे सभी दुखों के लिए जिम्मेदार हैं। जो शाश्वत नहीं है उसे शाश्वत मानना अविद्या है। असत्य को सत्य मानना अविद्या है। अनित्य को नित्य मानना अविद्या है।उदाहरण के लिए हम अपने शरीर को नित्य मान लेते हैं, हालाँकि जन्म से मृत्यु पर्यन्त ये प्रतिक्षण बदलता रहता है।

सत्य ये है कि जब जन्म हुआ है तो मृत्यु अवश्य होगी। लोग अपने बारे में भी एक धारणा बना लेते हैं कि मैं ऐसा हूँ या में वैसा हूँ । जैसे मैं बहुत बड़ा अभियंता, डाक्टर या कोई पदाधिकारी हूँ, ये सब अविद्या ही है। वास्तव में हमें पता ही नहीं कि हम क्या हैं। अपने बारे में एक निश्चित धारणा हमें तबाह कर देती है और दुःख के गहरे कुएँ में ढकेल देती है। अस्मिता एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ होता है अहंकार। मनुष्य में होनेवाला यह ज्ञान या धारणा कि “मैं हूँ” या “मैं करता हूँ” तथा “मेरी औरों से पृथक एवं स्वतंत्र सत्ता है”। ये अहं भाव ही अस्मिता है।

आत्मा और चित्त / बुद्धि को एक मान लेना ही अस्मिता है। जब किसी व्यक्ति में अहं भाव उत्पन्न हो और दूसरा व्यक्ति उसके अनुसार कोई काम न करें तो पहले व्यक्ति को उसके अहंकार के चलते दुःख प्राप्त होगा। दुःख का तीसरा कारण राग है। किसी भी पदार्थ या व्यक्ति विशेष के प्रति आसक्ति या प्रेम होने को राग कहते है। इसके लिए महर्षि पतंजलि ने कहा है” सुखानुशयी रागः” अर्थात् राग सुख का अनुसरण करता है। उदाहरण के लिए अगर आपको किसी व्यक्ति या वस्तु के साथ सुख की अनुभूति होती है तो आपको उसके साथ राग उत्पन्न हो जाएगा।

जब वह व्यक्ति या वस्तु आपके पास नहीं होगा तो आपको दुःख प्राप्त होगा। दुःख का चौथा कारण द्वेष है। द्वेष का अर्थ होता है घृणा या अत्यधिक कटुता। महर्षि पतंजलि के अनुसार द्वेष दुःख का अनुसरण करता है ” दुखानुशयी द्वेषः”। जैसे किसी कार्य को करने से आपको दुःख की अनुभूति हुई तो उस कार्य को आप नहीं करना चाहेंगे और उस कार्य से आपको घृणा हो जाएगी। “राग-द्वेष” एक द्वैत का प्रतिनिधित्व करते हैं।

ये हमें विभिन्न दिशाओं में खींचते हैं-स्वीकृति और अस्वीकृति। सबसे बड़ी बात यह है कि वे केवल वैकल्पिक नहीं होते बल्कि वे एक- दूसरे में बदल भी जाते हैं। जो हमें एक पल में पसंद होता है,वह दूसरे पल में नापसंद हो सकता है, और इसके विपरीत भी। दुःख का पाँचवाँ कारण अभिनिवेश है। जब किसी भी व्यक्ति को अपनी मृत्यु का भय सताने लगे या वह अपनी मृत्यु से भयभीत हो जाये उसे ही अभिनिवेश कहते हैं।उपरोक्त सभी क्लेश हमारे जीवन में दुःखों को उत्पन्न करते हैं।गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कामना को ही पाप का कारण बताया है। संसारमें जितने भी दुःखी हैं, उन सबका कारण एक कामना ही है। कामना प्रत्येक अवस्था में दुःख का अनुभव करती रहती है-जैसे धन के न होने पर धन प्राप्त करने की लालसा का दुःख, धन प्राप्त करने लिए ग़लत काम करना और उसके कारण उत्पन्न होने वाले तनाव का दुःख, धन मिल जाने पर उसके रखने या चोरी होने की चिन्ता का दुःख और धन ख़त्म होने पर अभाव का दुःख होता है। अब महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि दुःख से छुटकारा कैसे मिले।

प्राणिमात्र की प्रवृत्ति का एकमात्र लक्ष्य तो सुख की प्राप्ति और दुःख का निवारण ही तो है। हम सुख चाहते हैं और उसके प्राप्ति के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहते हैं फिर भी वह प्राप्त नही होता। इसके उलट हम दुःख नहीं चाहते और उससे बचने की चेष्टा भी करते हैं फिर भी हम दुखी रहते हैं। दुःख से उद्विग्न रहकर सुख की कामना करते रहना ही हमारा स्वभाव है। अब इस परिस्थिति से कैसे निकला जाये, इसकी चर्चा अगले अंक में:





















