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- सोनभद्र की पर्यावरणीय दुर्व्यवस्था: एक गंभीर चिंता नीतीश कुमार चतुर्वेदी को
सोनभद्र। उत्तर प्रदेश का एक महत्वपूर्ण जिला सोनभद्र प्राकृतिक संसाधनों की दृष्टि से समृद्ध है। लेकिन पिछले कुछ दशकों में इस क्षेत्र में भारी औद्योगिकीकरण, खनन गतिविधियाँ, और वन कटाई ने पर्यावरणीय संतुलन को गंभीर रूप से छति पहुंचाया गया है। इन गतिविधियों के कारण जल, वायु, और मिट्टी की गुणवत्ता में निरंतर गिरावट आई है, जिससे स्थानीय निवासियों को कई स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

खनन और औद्योगिकीकरण ने जहां क्षेत्र की आर्थिक स्थिति को मजबूत किया है, वहीं इसके दुष्परिणाम भी उतने ही गंभीर हैं। वनों की अंधाधुंध कटाई से जैव विविधता को भारी नुकसान पहुंचा है और कई वन्य जीवों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। जल स्रोतों में रासायनिक प्रदूषण और भारी धातुओं की मात्रा बढ़ने से पीने का पानी दूषित हो गया है, जिससे कई जल जनित रोग फैल रहे हैं।




वायु प्रदूषण भी एक बड़ी समस्या बन गया है। कोयला खदानों और थर्मल पावर प्लांट्स से निकलने वाले धुएं और गैसों ने वायुमंडल को विषाक्त बना दिया है, जिससे सांस लेने में कठिनाई, फेफड़ों के रोग, और अन्य श्वसन संबंधी बीमारियाँ आम हो गई हैं। मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट ने कृषि को प्रभावित किया है, जिससे किसानों की आजीविका पर भी संकट गहरा गया है।
पर्यावरणीय दुर्व्यवस्था को सुधारने के लिए सरकार और स्थानीय प्रशासन को कठोर कदम उठाने की आवश्यकता है। नियामक नीतियों का कड़ाई से पालन, पुनर्वनीकरण, और प्रदूषण नियंत्रण उपायों को लागू करना अत्यावश्यक है। साथ ही, स्थानीय समुदायों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक और सक्रिय भूमिका निभानी होगी।
यदि इन समस्याओं का समाधान नहीं किया j लिए तत्काल और ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। यह बातें समाजसेवी नीतीश कुमार चतुर्वेदी ने बताया।














