HIGHLIGHTS
- सुलभ डिजिटल संसाधनों के बावजूद हम भीड़ का हिस्सा कब तक
- लाखों की भीड़ इकठ्ठा करके आयोजक तथा हमारी सरकारें अपना पीठ थपथपाती हैं, उन्हें नागरिकों के मूलभूत सुविधाओं की चिंता नहीं रहती।
डॉ मिथिलेश कुमार श्रीवास्तव शिखर
एकादशी के पवन पर्व पर दो जुलाई मंगलवार को हाथरस के मुगलगढ़ी/रतिभानपुर में पुलिस की नौकरी छोड़ सत्संगी बने स्वयंभू भोले बाबा श्री नारायण साकार हरि के सत्संग में मची भगदड़ और चली गई सैकड़ों लोगों की जान।
सत्संग का विशाल पंडाल एक खेत में लगा था, खेत की मिट्टी गीली हो गई थी। कुछ लोगों के अनुसार सत्संग के बाद जब गुरुजी की कार जाने लगी तो लोग उनके पैर छूने के लिए बाबा की ओर आगे बढ़ने लगे और भगदड़ मच गई। अधिकांश लोगों का यही मत है कि भीषण गर्मी एवं उमस के बीच लोग प्यास से व्याकुल थे। जैसे ही सत्संग खत्म कर बाबा जाने लगे, भूखे-प्यासे लोग भी बाहर निकलने के लिए जल्दबाजी में थे, फलस्वरूप लोग के एक दूसरे के ऊपर गिर गए। इस घटना में 108 महिलाओं सहित मंगलवार की रात तक कुल 123 लोगों की मौत हो गई थी। कुल 123 दर्दनाक मौत के बावजूद दूसरे दिन पुलिस के एफ आई आर में सुनने में यही आया कि बाबा का नाम शामिल नहीं है उनके मुख्य सेवादार देव प्रकाश एवं अन्य सेवादारों का ही है। खैर यह तो कानूनी मामला है, वह प्रशासन और न्यायालय जांच के उपरांत देखेगा ही।

सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी बनती है कि चाहे राजनैतिक रैली हो, राजनैतिक कार्यक्रम हों, सामाजिक या किसी भी धर्म के धार्मिक संस्थाओं के कार्यक्रम हों, मेला हो, कुंभ हो, कांवर यात्रा हो, धार्मिक जुलूस हों सबके लिए शामिल होने की क्षमता यानी संख्या उपलब्ध मूलभूत सुविधाओं के अनुरूप निर्धारित होनी चाहिए। उचित तो यही हो कि संख्या की अधिकतम सीमा निर्धारित कर दी जाए। एक घटना के बाद जब दूसरी घटना घटती है तो लोग पुरानी घटना भूल जाते हैं। पुरानी घटनाओं से सबक लेकर कोई सुचारू व्यवस्था नहीं की जाती। बाबा अथवा उनके सेवादारों के जेल जाने या सजा मिल जाने से खोई हुई 123 ज़िंदगानियां लौटकर नहीं आ सकतीं। इन 123 लोगों का परिवार तबाह हो जाएगा क्योंकि परिवार के सदस्य की कमी को कोई पूरा नहीं कर सकता।

चाहे राजनैतिक दलों की रैली हो या धार्मिक आयोजन भीड़ जुटाने, दूर-दूर से भीड़ को ट्रेनों, बसों में ठूंसकर लाने का एक माहौल बन चुका है। आयोजक मंडल दूर दराज से वाहनों द्वारा ढोकर भीड़ ले आती हैं। बार-बार भीड़ इसीलिए लिखना पड़ रहा है कि जनता को नागरिक न समझकर केवल भीड़ ही समझा जाता है। लाखों में भीड़ जुटाने का निर्देश होता है, जिसके लिए पूरी मशीनरी लगा दी जाती है। लोग भीड़ देखकर गौरवान्वित होते हैं तथा अपनी सफलता के प्रति आश्वस्त होते हैं। राजनैतिक दलों को भीड़ में ही छुपी हुई सफलता दिखाई पड़ती है। जिला प्रशासन भी भीड़ को प्रतिदिन काउंट कराती रहती है तथा यथासंभव बढ़ा-चढ़ाकर संख्या बताई भी जाती है। चाहे कुंभ, अर्धकुंभ, महाकुंभ हो या मंदिर-मस्जिद की बात हो अथवा कथा वाचकों का प्रवचन हो, या कोई मेला हो प्रतिदिन लाखों की भीड़ बताकर शासन-प्रशासन के लोग गर्व से फूले नहीं समाते। लोग चाहते हैं कि मंदिर में प्रतिदिन एक लाख लोग आवें, मगर उनके लिए आयोजक/ प्रशासन द्वारा पीने के पानी की भी व्यवस्था नहीं की जाती है। कोई यह नहीं सोचता कि लाखों लोग आएंगे तो नाश्ता कहां करेंगे, भोजन कहां करेंगे, कहां बैठेंगे? चाय-पानी मिलेगी या नहीं! लाख की संख्या में पहुंचे हुए श्रद्धालु नित्य कर्म कैसे और कहां करेंगे, कहां सोएंगे इसकी चिंता करने वाला कोई नहीं है।
हाथरस के सत्संग के लिए भी प्रशासन द्वारा अस्सी हजार लोगों को शामिल होने के लिए परमिशन दी गई थी, उससे तीन गुना सत्संग में लगभग ढाई लाख लोग पहुंचे। अब प्रश्न उठता है कि प्रशासन द्वारा जब अस्सी हजार लोगों को शामिल होने के लिए परमिशन दी गई तो उसके मुताबिक जो जनता की मूल सुविधाएं हैं, उनके बारे में क्या विचार किया गया? इतनी भीषण गर्मी में क्या वहां समुचित पेयजल, बिजली कनेक्शन, जेनरेटर, पंखा, कूलर, चेयर, चिकित्सा सुविधा, एम्बुलेंस, खानपान, सुरक्षा आदि का जायजा लिया गया? दूसरी बात यह है कि जब जिला प्रशासन द्वारा अस्सी हजार की परमिशन दी गई थी और उसके बदले ढाई लाख लोग पहुंचे तो उस भीड़ को नियंत्रित करने या वापस करने की जिम्मेदारी केवल आयोजन समिति की बनती है या जिला प्रशासन की या दोनों की।
मंगलवार को श्री नारायण साकार हरि के नाम से प्रसिद्ध भोले बाबा के कार्यक्रम में कई राज्यों के लगभग ढाई लाख लोग पहुंचे थेI भीषण गर्मी और उमस से बेहाल लोग सत्संग खत्म होने के बाद जल्दबाजी में जाने लगे तो जल्दी में भगदड़ मच गई। लोग एक-दूसरे को धक्का देते हुए, तथा जो गिर गए उनके ऊपर चढ़कर आगे निकलने लगेI जब तक कोई घटना नहीं घटती, ऐसे सभी आयोजनों में मिनिस्टर, सांसद, विधायक आदि जनप्रतिनिधि भी पहुंचते रहते हैं। नारायण साकार हरि मूल रूप से उत्तर प्रदेश के एटा जिले के बहादुर नगरी गांव के रहने वाले हैं, उनका असली नाम सूरज पाल जाटव है।

आध्यात्मिक जीवन में आने के बाद उन्होंने अपना नाम भी बदल लिया और अपने भक्तों के बीच नारायण साकार हरि के नाम से जाने जाने लगे। अपने मायावी तथा चमत्कारी पाखंडों के कारण वर्ष 2000 में बाबा को जेल भी जाना पड़ा था, मगर इधर कुछ वर्षों से बाबा का साम्राज्य तेजी से बढ़ा। बाबा श्री नारायण साकार हरि अन्य धार्मिक बाबाओं की भांति गेरुआ वस्त्र या कोई अलग पोशाक में नजर नहीं आते हैं, वे अक्सर सफेद रंग के शर्ट, पैंट, सूट, टाई और जूते पहने रहते हैं।

उन्हें पुलिस की सरकारी नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया था, उसके बाद सत्संग का खेल आरंभ हुआ। उनके पास सेवादारों तथा सुरक्षा कर्मियों को मिलाकर लगभग 100 के आसपास एक टीम है। गरीब और वंचित तबके के बीच में इधर कुछ वर्षों से भोले बाबा की प्रसिद्धि तेजी से बढ़ी और लाखों की संख्या में उनके अनुयायी बन गए। इससे स्वत: स्पष्ट है कि मरने वाले अधिकतर निचले तबके के ही हैं। स्वयं घोषित भोले बाबा के उत्तर प्रदेश के साथ-साथ हरियाणा, राजस्थान और मध्य प्रदेश में काफी ज्यादा अनुयायी हैं। हमारा विचार और सुझाव यही है कि इस हादसे से शासन प्रशासन सीख ले एवं हर कार्यक्रम के लिए संख्या सीमा निर्धारित किया जाए ताकि सभी श्रद्धालुओं को इंसान की भांति मूलभूत सुविधाएं एवं समुचित सुरक्षा मिल सके। जो अधिकारी जितनी संख्या की अनुमति दे उससे अधिक की जनता पहुंचने पर उन्हें रोककर वापस कर दिया जाए, ताकि क्षमता से अधिक लोग शामिल न हों। टीवी, यूट्यूब, मोबाइल आदि डिजिटल युग में इतनी भीड़ इकठ्ठा होने पर पाबंदी होनी चाहिए। आखिर हम कब तक एक नागरिक के बदले भीड़ का अंश कहे जाते रहेंगे। जहां देखिए वहीं भेंड़-बकरियों की तरह भीड़ ही भीड़ दिखाई पड़ती है, नहीं शायद मैं गलत हूं क्योंकि इतनी बड़ी भेंड़-बकरियों की भीड़ तो कभी देखी ही नहीं गई।















