भारत का शिक्षा जगत सदैव नवीनता का पोषक रहा है। प्राचीन काल में भी गुरुकुल प्रणाली न सिर्फ ज्ञान का भंडार थी, अपितु नये विचारों को जन्म देती थी। शास्त्रार्थ (शास्त्रों पर आधारित बहस) के माध्यम से विद्यार्थी मौजूदा ज्ञान को चुनौती देते और नये सिद्धांतों की खोज करते थे।

तक्षशिला और नालंदा जैसे विश्वविद्यालय वैज्ञानिक अनुसंधान के केंद्र थे। खगोल विज्ञान में आर्यभट्ट द्वारा शून्य की खोज, चिकित्सा में आयुर्वेद का विकास, वास्तुकला में अद्भुत मंदिर निर्माण – ये सब प्राचीन भारतीय शिक्षा की नवीनता के कुछ उदाहरण हैं। शिक्षा का उद्देश्य केवल पुस्तकीय ज्ञान प्राप्त करना न होकर, नये आविष्कारों के द्वारा जीवन को बेहतर बनाना माना जाता था।

भारतीय शिक्षा का एक समृद्ध इतिहास रहा है, जिसमें विश्वविद्यालयों की स्थापना से लेकर ज्ञान की परंपराओं को हस्तांतरित करने तक की महत्वपूर्ण घटनाएँ शामिल हैं। हालाँकि, इस गौरवशाली इतिहास में एक ऐसा काल भी रहा है जिसे हम “स्वर्णिम युग” के रूप में संदर्भित कर सकते हैं। यह वह युग था जब शिक्षा ज्ञान प्राप्ति का मात्र साधन न होकर, जीवन जीने की कला और समाज को बेहतर बनाने का एक उपकरण बन गई।

यह कहना कठिन है कि भारतीय शिक्षा का स्वर्णिम युग कब शुरू हुआ और कब खत्म हुआ। विभिन्न विद्वान विभिन्न युगों को इस कालखंड के रूप में परिभाषित करते हैं। कुछ का मानना है कि यह सिंधु घाटी सभ्यता (3300 ईसा पूर्व – 1300 ईसा पूर्व) के दौरान था, जहाँ शिक्षा औपचारिक संस्थानों और गुरुकुल प्रणाली दोनों के माध्यम से दी जाती थी।

अन्य लोग वैदिक काल (1500 ईसा पूर्व – 500 ईसा पूर्व) की ओर इशारा करते हैं, जहाँ श्रुति और स्मृति पर आधारित शिक्षा का प्रचलन था। हालाँकि, मौर्य साम्राज्य (322 ईसा पूर्व – 185 ईसा पूर्व) के शासनकाल को आम तौर पर भारतीय शिक्षा के स्वर्णिम युग के रूप में स्वीकार किया जाता है। इस युग में तक्षशिला और नालंदा जैसे विश्वविद्यालय ज्ञान के प्रमुख केंद्र बनकर उभरे। इन विश्वविद्यालयों में न केवल भारत बल्कि विदेशों से भी छात्र अध्ययन के लिए आते थे। यहाँ शिक्षा का दायरा काफी व्यापक था, जिसमें धर्म, दर्शन, विज्ञान, गणित, खगोल विज्ञान, चिकित्सा और कला जैसे विषय शामिल थे। शिक्षा प्राप्ति को जाति या लिंग के आधार पर सीमित नहीं किया जाता था, और योग्यता ही शिक्षा का आधार मानी जाती थी।















