कुशाग्र कौशल शर्मा
भारत इस बार अपना 75वां गणतंत्र दिवस मनाने जा रहा है अर्थात हमें अपने संविधान को स्वीकार किए आज 75 साल हो गए। संविधान मौलिक नियमों का एक समूह है जो यह निर्धारित करता है कि किसी देश या राज्य को कैसे चलाया जाता है। इस दिन यानी की 26 जनवरी भारत के संविधान की प्रस्तावना को भी लागू किया गया था।

प्रस्तावना शब्द का तात्पर्य संविधान के परिचय से है।यहां तक कि संवैधानिक विशेषज्ञ एन ए पलखीवाल ने प्रस्तावना को संविधान का पहचान पत्र कहा है।“मैं ऐसे धर्म को मानता हूं जो स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा सिखाता है” डॉक्टर भीमराव अंबेडकर। उपरोक्त पंक्ति में से कुछ शब्द जैसे की स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा यह भी सिद्ध करते हैं कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। इन शब्दों का प्रस्तावना में होना इस बात का भी प्रतीक है कि संविधान का मूल ढांचा उसकी प्रस्तावना है।

आज भारत भले ही विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अन्य देशों से आगे बढ़ता जा रहा है लेकिन कहीं ना कहीं इस देश के नागरिक अपने संविधान में दिए मौलिक अधिकारों से वंचित और मूलभूत कर्तव्यों की राह से भटकते नजर आ रहे हैं।
हर नागरिक का यह अधिकार है कि उसे जीवन की मूलभूत सुविधाएं आसानी से उपलब्ध हो लेकिन आज भी भारत में गरीबी व्यापक पैमाने पर देखी जा सकती है। अमीर और गरीब के बीच विभाजन बढ़ता ही नजर आ रहा है जिसका एक कारण जनसंख्या में वृद्धि भी है। मजदूरी में असमानता, हिंसा कुपोषण आदि के साथ लैंगिक भेदभाव अपने उच्चतम स्तर पर बना हुआ है।

भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है आसान भाषा में कहे तो हमारे देश में सभी धर्म को समान दर्जा प्राप्त है जो अपने नागरिकों को विचार की अभिव्यक्ति विश्वास और पूजा की स्वतंत्रता प्रदान करता है साथ ही सभी नागरिकों को अवसर की समानता सुनिश्चित करता है। लेकिन भारत के युवाओं में बढ़ते सांप्रदायिक और धार्मिक कट्टरवाद ने भयावह रूप ले लिया है जो कि भारत के संविधान में उल्लेखित धर्मनिरपेक्ष के लिए काफी दुखद है।

हमारे स्वतंत्र और गणतंत्र भारत ने अभी तक एक लंबा सफर तय कर लिया है। सरकार को चाहिए की समग्र देशवासियों के विकास के लिए राष्ट्र के सभी वर्गों और समुदायों को साथ लेकर चलने की आवश्यकता है साथ ही हर नागरिक को चाहिए कि साक्षरता के साथ-साथ उसे देश के अपने मौलिक कर्तव्यों का भी पालन करना चाहिए।
कुशाग्र कौशल शर्मा


























