सोनभद्र। काशी प्रांत के कुटुंब प्रबोधन के प्रांत संयोजक डॉक्टर सुकदेव त्रिपाठी ने बुधवार को विशेष संवाददाता से व्यक्तित्व निर्माण के संदर्भ में अपने विचार साझा किए ।
उन्होंने कहा कि, “जब मनुष्य संस्कारों से कमजोर होता है तब सबसे पहले उसका आत्मबल कमजोर होता है। संस्कार संगीत की तरह होता है।

संगीत में जब सुर-लय- ताल का क्रम बनता है, तब ही संगीत अपनी पूर्णता पर पहुंचता है। एक नन्हा सा बीज जमीन में रोपित होने के बाद मिट्टी, पानी, धूप तथा हवा के अन्य स्रोतों से लयबद्ध होता है। फिर मिट्टी के अंदर से गीत गाते हुए अंकुरित होता हैं, बढ़ता है और पत्तियों, फूलों तथा फलों को भी जन्म देता है। सब कुछ बीज के अनुकूल ही नहीं था।

कभी भीषण गर्मी, कभी वृष्टि, कभी अनावृष्टि, कभी शीत सब झेलता है बीज और तब विस्तार लेता है उसका वंश। इसका निष्कर्ष यही निकलता है कि जीवन में समय प्रतिकूल आए तो भी संस्कारों का वृक्ष हरा- भरा रहना चाहिए। यदि संस्कार कमजोर हुआ तो टूटकर बिखरना ही पड़ेगा।यहां सर्वाधिक लोकपूज्य महादेव के परिवार का उदाहरण भी दिया जा सकता है। परिवार में विरुद्धों का जमघट हैं।

फिर भी सामंजस्य बना हुआ है। मां पार्वती का वाहन शेर और महादेव का वाहन नंदी, दोनों विपरीत प्रवृत्ति के हैं। कार्तिकेय का वाहन मोर तथा महादेव के गले में सर्प एवं गणेश जी का वाहन चूहा धुर विरोधी हैं। महादेव की मंडली में ऐसे तमाम तत्व विपरीत ध्रुव वाली प्रकृति-प्रवृत्ति के बावजूद एक सूत्र में बंधे हैं। यही स्थिति जीवन की भी है। विपरीत स्थितियों को सकारात्मक तरीके से देखते हुए यह समझना चाहिए कि यह स्थिति उसे गढ़ने के लिए आई है।

माता-पिता, गुरु या श्रेष्ठजन किसी बात पर डांट रहे हों तो उसे सह लेना चाहिए, न कि उन्हें झटक देना चाहिए। विपरीत अवस्था भले कुछ नुकसान देने वाली लगे तो भी यह समझना चाहिए कि यह अवस्था उसे मजबूत आत्मबल अवश्य पुरस्कार के रूप में देकर जाएगी। हमें अपने मन को इतना मजबूत बनाना चाहिए कि कुसंस्कारों का रावण- दल उसका पांव हिला न सके।”






















