धान की फसल कटने के बाद उसके बचे हुए हिस्सा पराली कहलाती हैं। बरसों पहले जब किसान अपनी फसल स्वयं काटते थे या कटवाते थे। तो फसल का हिस्सा बहुत कम खेतों में रहता था जिसे जलाने की आवश्यकता ही नहीं होती थी, परंतु बदलते आधुनिक दौर में धान की फसल की कटाई मशीनो से की जाती है। पराली जलाने के कारण प्रदूषण की समस्या बढ़ जाती है वहीं उपजाऊ भूमि की गुणवत्ता पर भी खतरा बढ़ जाता है।

किसानों के द्वारा जलाई जाने पराली की वजह से मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा में कमी आ रही है। जिसके कारण खेतों में किसानों द्वारा उपयोग किए जाने वाले रासायनिक पदार्थ भी कार्य करना बंद कर देंगे। फसल के अवशेष (पराली) को जलाने से मिट्टी का तापमान बढ़ जाता है। जिसके परिणाम स्वरूप मिट्टी में उपलब्ध सूक्ष्म जीवाणु और केचुआ आदि मर जाते हैं।

इसके दुष्प्रभाव के कारण मिट्टी की उपजाऊ क्षमता कम हो जाती है। पराली जलाने पर उत्पन्न होने वाला धुंआ उड़ उड़ कर वायुमंडल में आ जाता है, जिसके कारण दिन में भी धुंध छा जाती है एवं कहीं कहीं पर तो पूरा आसमानही काला दिखाई देता है और लोग साफ सुथरी हवा में सांस लेने के लिए भी तरसने लगते हैं। पराली जलाने से किसानों काे आर्थिक नुकसान भी होता है क्योंकि मिट्टी अपनी गुणवत्ता को खोने लगती है। सरकार द्वारा चलाई जा रहे अभियान का सहयोग करें एवं राष्ट्रहित में पराली को ना जलाएं जिससे कि मिट्टी की गुणवत्ता मिट्टी में मिलने से बच सके।



























