प्राकृतिक आस्था का पर्व छठ

हर्षवर्धन केसरवानी (जिला संवाददाता)



प्रकृति की पूजा, लोक आस्था का पर्व छठ पूजा के लिए सोनभद्र नगर के तालाब, सरोवर, पोखरा, नहर, नदी सज चुके हैं, घाट की रौनक बढ़ चुकी है, मनोकामना, महाकल्याण के लिए मनाया जाने वाला यह पर्व शुद्ध रूप से प्रकृति की पूजा आस्था और विश्वास का पर्व है।

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इस पर्व को श्रद्धालु बिना किसी पंडित और पुरोहित के यह पर्व आपसी सौहार्द, एकजुटता, लोक समृद्धि, लोक कल्याण, लोक संस्कृति, लोक कला, लोक आस्था का पर्व है, इस अवसर पर जहां स्त्रियां परंपरागत रूप से चली आ रही लोककथा को सुनाया, लोकगीतों का गायन करते हुए पूजा पाठ हवन किया। परंपरागत रूप से चली आ रही पूजा लोक संस्कृति, साहित्य, कला,परंपरा को सुरक्षित रखने का भी पर्व है, वहीं पर्यावरण की शुद्धता को बनाए रखने वाले इस पर्व के आयोजन का प्रत्येक सोपान पर्यावरण संरक्षण से जुड़ा हुआ है ।

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पर्व नदियों, तालाबों, तन मन की शुद्धता, पूजा पाठ, स्नान ध्यान की शुद्धता, स्वच्छता और शुद्धता का भी संदेश देता है जो हमारी भारतीय परंपरा है।
सोनभद्र नगर में राम सरोवर तालाब एक प्राचीन तालाब है। जिसका निर्माण सोनभद्र नगर के दूसरे टाउन एरिया अध्यक्ष बलराम दास केसरवानी ने कराया था, आज इस तालाब पर हर वर्ष आस्थावानो, श्रद्धालुओं, भक्तों, व्रती महिलाओं अपार भीड़ होती है ।

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छठ पर्व एक वैज्ञानिक पर्व है जिसका सीधा जुड़ाव विज्ञान से है छठ पर्व के दूसरे दिन अथवा तीसरे दिन अस्ताचल एवं चौथे दिन उदयीमान सूर्य को अर्घ देना वैज्ञानिक परंपरा का अनुपालन करना है, श्रद्धालु वैज्ञानिक परंपराओं का अनुपालन लोक आस्था के साथ करते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार उदितमान सूर्य से जो विटामिंस,ऊर्जा पृथ्वी जगत को मिलता है वही अस्त होते सूर्य से भी प्राप्त होता है ,छठ पर्व की वैज्ञानिक व्याख्या के साथ साथ आध्यात्मिक और धार्मिक व्याख्यान के अनुसार-” भगवान भास्कर एक माह तक तुला राशि में प्रवेश करते हैं और इस एक माह के अंदर में छठ का पर्व मनाया जाता है इस अवधि में अस्ताचल सूर्य को अर्घ देना, दीपदान करना, पूजा करना पुनीत और पुण्य का कार्य माना गया है।

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लोक संस्कृति के दृषिट से देखे तो कार्तिक महीना लोक पर्व का महीना माना जाता है इस महीने में धनतेरस, छोटी दीपावली, नरक चतुर्दशी, बड़ी दीपावली के बाद छठ पर्व, तुलसी विवाह इत्यादि मनाने की हमारी भारतीय परंपरा है इस परंपरा के अंतर्गत अनेकों प्रकार के लोकगीत, लोक कथाएं गाने, सुनाने, अनुष्ठान लोकचित्र के चित्रांकन की परंपरा आज भी कायम है।

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लोक कथाओं के अनुसार-” द्वापर युग मे द्रौपती ने सूर्योपासना का पर्व उसी काल से मनाए जाने की परंपरा मनाने का शुभारंभ किया था,चूकि महाबली करण सूर्यपुत्र थे और महादानी जिन्होंने इंद्र को भगवान सूर्य द्वारा दिए गए कवच और कुंडल को यह जानते हुए दान में दे दिया था कि यह इंद्र है और मुझसे छल कर रहे हैं । करण अपने पिता सूर्य की आजीवन पूजा करते रहे।

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मर्यादा पुरुषोत्तम राम सूर्यवंशी थे और भगवान भास्कर की पूजा आराधना उनके कुल में होता रहा और माता सीता ने वनवास काल में भी सूर्य आराधना करती रहीऔर आज भी सूर्यवंशी भगवान सूर्य की पूजा करते हैं।
सूर्य उपासना की पद्धति आदिकालीन है और बिना सूर्य के पृथ्वी पर जीवन की कल्पना ही नहीं जा शक्ति है सूर्य की रोशनी के अभाव में समस्त जगत नष्ट हो जाएगा ।

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माता अंजनी एक बात पूजा कर रही थी और बाल हनुमान को भूख लगी हुई थी, हनुमान जी ने अपनी माता जी से भोजन मांगा,माता जी को पूजा पाठ करना था उन्होंने हनुमान जी से कहा कि बेटा! जाओ और सवेरे सवेरे जो भी लाल फल दिखे उसे ग्रहण कर लेना हनुमान जी आकाश की ओर देखा उस समय भगवान सूर्य उदय हो रहे थे उनका स्वरूप लाल था बाल हनुमान उन्हें लाल फल समझकर ग्रहण कर लिया जिसके परिणाम स्वरूप समस्त पृथ्वी जगत अंधकार में डूब गया,

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पृथ्वी लोक, देव लोक, पाताल लोक में हाहाकार मच गया और सभी देवता भगवान इंद्र के पास इस समस्या के समाधान के लिए गए और सभी देवताओं के साथ भगवान इंद्र बाल हनुमान के पास पहुंचे और उन्होंने निगले हुए सूर्य को उगलने का अनुरोध किया लेकिन बाल हनुमान अपने हठ के कारण सूर्य को उगलने के लिए तैयार नहीं हुए क्रोध में आकर देवराज इंद्र ने उनके मुंह पर बजरा से प्रहार किया

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जिससे सूर्यदेव तो बाहर आ गए लेकिन हनुमान जी की हड्डी टूट गई और वह बेहोश हो गए इस घटना से क्रोधित पवन देव अपने पुत्र बाल हनुमान को लेकर एक गुफा में चले गए और समस्त सृष्टि में वायु का बहना बंद हो गया और लोक- परलोक में हाहाकार मच गया। इंद्र सहित सभी देवता पवन देव के पास आए और उनसे वायु को चलने का निवेदन किया क्रोध शांत होने पर पवन देव ने वेग से बहाना का शुरू कर दिया।
छठ पर्व से जुड़ी हुई लोक कथाएं, लोक गीत, लोक पहेलियां, लोकोक्तियां है आदि प्रचलित है जिसका अनुपालन छठ पर्व पर श्रद्धालु करते हैं।

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