पारदर्शिता और सूचना का अधिकार

कुशाग्र कौशल शर्मा

सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 भारत के लोकतांत्रिक ढांचे को मजबूत करने और भारत वास्तव में लोकतंत्र की जननी है इसका एक व्यापक उदाहरण है। सूचना का अधिकार अधिनियम 18 वर्षों से नागरिकों को केंद्रीय और राज्य सरकारों से वह सूचनायें और डाटा प्राप्त करने में मदद की है जो आसानी से पब्लिक डोमेन में उपलब्ध नहीं हो सकती थी। यह अधिनियम विश्व के तमाम लोकतांत्रिक देशों में से सबसे व्यापक सार्वजनिक रिकॉर्ड नागरिकों तक पहुंचाने में बड़ा ही कारगर साबित हुआ है।

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हाल ही में भारत के राष्ट्रपति ने डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण विधेयक 2023 को मंजूरी दी है। यह सरकार द्वारा नागरिकों के व्यक्तिगत डाटा को पब्लिक डोमेन में रखने से रोकता है ।
अगर उदाहरण से समझने की कोशिश करें तो किसी कार्यकर्ता द्वारा सूचना का अधिकार को उपयोग करके अगर मनरेगा के लाभार्थियों की एक सूची निकली जाए और व्यक्तिगत रूप से सत्यापित किया जाए की लाभार्थियों को वही मिला है जो उन्हें कागज पर मिला हुआ प्रतीत होता है। तो ऐसा करने में अधिकारियों द्वारा डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण विधेयक 2023 का हवाला देते हुए व्यक्तिगत जानकारी का खुलासा न करने और इस प्रतिबंध को लागू करके जवाबदेही से बचेंगे।

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सूचना का अधिकार कानून संशोधन 2019 पारित होने के बाद से कार्यकर्ताओं में चिंता है कि इस अधिनियम को कम प्रभावी बनाया जा रहा है। जिससे की चिंता है कि अधिकारियों को जवाबदेही बनाए रखने का एक महत्वपूर्ण साधन बंद हो रहा है। इसमें प्रावधान किया गया है कि मुख्य सूचना आयुक्त (केंद्र के साथ राज्य के) केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित अवधि के लिए काम करेंगे। इस संशोधन से पहले कार्यकाल 5 वर्ष के लिए तय किया गया था साथ-साथ वेतन भत्ते संबंधी शर्तें केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित की जाएगी।

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ऐसा करने से आयोग की स्वायत्ता पे सवाल खड़े होंगे साथ ही साथ आम नागरिकों और कार्यकर्ताओं में अधिकारियों से प्राप्त होने वाली जानकारी से असंतुष्टि की भावना पैदा होगी।
सरकार को चाहिए कि कार्यपालिका और नागरिकों के बीच पारदर्शिता बनी रहे जिससे कि नागरिकों में देश एवं समाज हित में काम करने की इच्छा शक्ति और प्रबल हो।

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संस्कृति LIVE द्वारा प्रकाशित

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