सोनभद्र। जिले के चोपन विकासखंड के अंतर्गत ग्रामसभा गोठानी का ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है, प्राकृतिक सुषमा एवं महानद सोन, रेणु, विजुल, नदी के संगम तट पर अवस्थित सोमनाथ मंदिर का निर्माण गुजरात के सोमनाथ मंदिर के तर्ज पर कराया गया है और इस स्थान पर प्राचीन मंदिर के अवशेष मूर्तियां इत्यादि भी प्राप्त हुई है इन मूर्तियों में भगवान विष्णु, शक्ति, गणेश, सूर्य, ब्रह्मा, कार्तिकेय, नवग्रह,दिक्पाल, हनुमान, शिवगण आदि प्रमुख देवी- देवताओं की मूर्तियां पर्याप्त संख्या में अवस्थित है।


(इतिहासकार)
इतिहासकार दीपक कुमार केसरवानी के अनुसार-“गोठानी नाम संस्कृत के गोष्टानी का अपभ्रंस रूप है, सन् 140-170 ईस्वी के मध्य इस क्षेत्र पर नागवंश (भारशिव) वंश का आधिपत्य कायम था,इस राजवंश में पहला शासक वर्ग, दूसरा साधक वर्ग, तीसरा शिल्पी वर्ग। इनमें शासक वर्ग का कार्य अपने राज्य पर शासन सत्ता कायम रखना था,भारशिव साधक पक्के शिव भक्त थे वे अपने सिर पर थाले में शिवलिंग लेकर चलते थे और गुप्तकाशी के खोह, कंदराओं, दर्रों, गुफाओं में तपस्या करते थे,शिल्पी वर्ग के लोग शिवालयों की स्थापना का कार्य करते थे।

गोठानी वह स्थान था जहाँ पर शिल्पी बैठकर शिवालयों, मूर्तियों, के निर्माण इत्यादि पर गोष्ठियां किया करते थे,जिस मंदिर को उन्हें गुप्तकाशी के धरती पर स्थापित करना होता था। गुप्तकाशी के धरती पर इन मॉडलों के आधार पर मंदिरों का निर्माण शिल्पियों ने किया था, इन्हीं मॉडलों में से एक शिव मंदिर आज भी मडरा गांव में अवस्थित है,इंटर लॉगिंग सिस्टम (पत्थर पर पत्थर रखकर) बनाया गया यह मंदिर आज भी गोठनी के सप्त शिवालयों की एक मंदिर की प्रतिकृति है और इस मंदिर के गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग भी गोठानी में अवस्थित शिवलिंग की ही तरह है।

गोठानी में अवस्थित मंदिर,मूर्तियां एवं अन्य कलात्मक अवशेष उत्कृष्ट शिल्पायंन के परिचायक हैं।गोठानी के सप्त शिवालयों में सोनभद्र जनपद सम्प्रति गुप्तकाशी में स्थापित मंदिरों का दर्शन किया जा सकता है। इस पुण्यस्थली पर भी मुस्लिम आतताइयों द्वारा मूर्ति एवं मंदिरों के भंजन का कार्य किया गया इस स्थल पर खंडित- विखंडित मूर्तियां इसकी साक्षी हैं।


शोण, रेणु,बिजुल के संगम तट पर अवस्थित सोमनाथ मंदिर पर प्रतिवर्ष शिवरात्रि, बसंत पंचमी के अवसर पर मेला एवं श्रावण मास में कॉवर यात्रियो द्वारा भगवान शिव को जलाभिषेक कर आध्यात्मिक, धार्मिक पुण्य की प्राप्ति करते हैं, सोन संगम आरती का भी आयोजन भी प्रतिवर्ष मकर संक्रांति के दिन सम्पन्न होता है,सोन संगम आरती का भी आयोजन सम्पन्न होता है,यह प्राचीन परम्पराएं आज भी कायम है ,ये परंपराएं हमारे आगे आने वाली पीढियों को अपनी सांस्कृतिक, धार्मिक, आध्यात्मिक परंपराओं को जागृत रखने में सहायक सिद्ध होंगी।













