कुशाग्र कौशल शर्मा
राजद्रोह कानून एक औपनिवेशिक काल का कानून है जिसको अंग्रेजों ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन को कुचलने के उद्देश्य से बनाया था। अब सवाल यह उठता है कि क्या इस राजद्रोह के कानून को जिसको आईपीसी की धारा 124 A में परिभाषित किया गया है क्या इसकी प्रासंगिकता आज के स्वतंत्र भारत में है?
हाल ही में 22 वें विधि आयोग ने ’राजद्रोह के कानून के उपयोग’ पर अपनी 279 वी रिपोर्ट जारी की है। जिसमें उसने इस कानून को बनाए रखना की सिफारिश की है भारत की अखंडता और को बनाए रखने के लिए और अलगाववादियों से निपटने के लिए यह कानून मील का पत्थर भी साबित हुआ है । लेकिन अगर इसके दूसरे पहलू पर गौर करें तो साल 2020 में अदालत में ऐसे विचाराधीन मामले 95% के अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गए थे।

इस तरह के मामले में गिरफ्तार हुए व्यक्ति को जमानत मिलना बहुत मुश्किल हो जाता है या सुनवाई की प्रक्रिया काफी लंबी हो जाती है।
भारत के नागरिकों के मौलिक अधिकार अनुच्छेद 19(1)(a) जो कि अभिव्यक्ति के आजादी का अधिकार है। उसे अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित भी करता है । इसके बढ़ते दुरुपयोग को देखते हुए कुछ देशों ने जैसे कि यूनाइटेड किंगडम ऑस्ट्रेलिया सिंगापुर ने ऐसे कानून को निरस्त कर दिया है। सरकार के सामने मुख्य रूप से दो चुनौतियां हैं भारत की अखंडता को बनाए रखना और अनुचित गिरफ्तारी से नागरिकों को बचाना ।धारा 124 A को उन्हीं मामलों में लागू किया जाना चाहिए ,जहां किसी कार्य का इरादा लोक व्यवस्था को भंग करना ,हिंसा भड़कना या सरकार को हटाना हो।

ऐसे संवेदनशील मामलों में सरकार को प्रारंभिक जांच के बिना FIR नहीं दर्ज करनी चाहिए इस बात का भी ध्यान रखना होगा की प्रारंभिक जांच का अधिकारी इंस्पेक्टर रैंक से नीचे का नहीं होना चाहिए । पुलिस अधिकारियों में प्रशिक्षण के साथ-साथ संवैधानिक मूल्यों के बारे में संवेदनशीलता और जागरूकता भी पैदा करनी होगी। पर्याप्त सुरक्षा उपाय करके ऐसे कानून के दुरुपयोग को रोका जा सकता है।
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