आत्मग्लानि -जीवन का अभिशाप

डॉ. कंचन जैन (लेखिका)

एक व्यक्ति को आत्मग्लानि अर्थात उसको मानसिक रूप से ही नहीं अपितु आंतरिक रुप से या कहें सिर्फ शारीरिक या मानसिक रूप से ही नहीं, आत्मिक रूप से भी किसी चीज का पछतावा होना ही आत्मग्लानि है ।
आत्मग्लानि की भावना एक व्यक्ति में तब उत्पन्न होती है जब वह जानबूझकर या सोच समझकर किसी प्राकृतिक सृजन को कष्ट देता है। और बाद में यह सोचता है कि यह मैंने क्या किया? अगर आप स्वयं पर थोड़ा सा प्रकाश डालेंगे तो आप जान पाएंगे कि क्या आपने ऐसा कोई कृत्य किया है, या नहीं।

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आत्मग्लानि से बचने का सर्वश्रेष्ठ उपाय है कि आप कोई भी ऐसा निर्णय ना लें,जो किसी को मानसिक या शारीरिक रूप से कष्ट पहुंचाएं। फिर चाहे वह व्यक्ति हो या पशु। जब व्यक्ति आत्मग्लानि महसूस कर रहा होता है तो वह दो चीजें करता है या तो वह व्यक्ति अपनी की हुई गलती का पश्चाताप करता है अर्थात उस व्यक्ति या पशु से माफी मांगता है और अपनी गलती को सुधारता है या फिर वह यह मान लेता है। कि गलती तो इंसान से ही होती है और वह इतनी गलतियां कर देता है कि वह सचमुच ही गलतियों का पुतला बन जाता है।आत्म ग्लानि एक नकारात्मक भावना है और यह मनुष्य अतीत की किसी घटना से जुड़ा होताहै। आत्म ग्लानि मनुष्य को अतीत में जीने पर मजबूर करती है। पबमेड सेंट्रल में प्रकाशित 2007 के एक शोध के अनुसार आत्मग्लानि की भावना से ग्रसित व्यक्ति में अवसाद होने की संभावना अधिक बढ़ जाती है। यही नहीं, नियमित रूप से आत्मग्लानि महसूस करने से व्यक्ति दो दशक के भीतर ही डिमेंशिया और अल्जाइमर जैसी गम्भीर मानसिक समस्याओं का शिकार हो सकता है।

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