HIGHLIGHTS
- नगर के उत्तर महाल के प्यारेलाल केसरवानी ने किया था परंपरागत होली का आरंभ
- रामसूरत यादव ठेकेदार द्वारा कराया जाता था प्रतिवर्ष होली मिलन समारोह.
- उत्तर मुहाल कभी था साहित्यकारों, पत्रकारों, कलाकारों का गढ़।

(जिला संवाददाता)
सोनभद्र। जनपद मुख्यालय सोनभद्र नगर में परंपरागत रूप से होली पर्व मनाने की परंपरा सुप्रसिद्ध व्यापारी, रईस भूरालाल केसरवानी वंशधर प्यारेलाल केसरवानी द्वारा आरंभ किया गया था और आज भी इनके द्वारा प्रारंभ की गई होलिका स्थापना से होलिका दहन की परंपरा कायम है।
इतिहासकार दीपक कुमार केसरवानी के अनुसार-” होली पर्व का प्रारंभ हुआ नगर के समीप स्थित वर्तमान जैत गांव मैं भूरालाल केसरवानी द्वारा स्थापित बरैला मंदिर पर बसंत पंचमी को आयोजित होने वाले मेला से। होली आने की आहट बसंत पंचमी के बरेला मेले से ही हम बच्चों को मिलना शुरू हो जात था। बसंत पंचमी के आगमन के पूर्व ही हम बच्चे मेला देखने, घूमने का प्रोग्राम बनाने लगते थे।



हम बच्चे इस लायक नहीं थे कि अकेले मेला घूमने जाते, चाचा के साथ मेला घूमने की अनुमति अम्मा- पापा से मिल जाती थी, चाचा के साथ पैदल, रिक्शे या साइकिल की डंडी पर बैठकर बरेला मंदिर जाते थे।
रंग बिरंगे गुब्बारे, कागज की रंग- बिरंगी चरखी, सिटी, बाजा, बाइस्कोप वाले लाउडस्पीकर से दिल्ली का कुतुब मीनार देखो वाला गीत, चार्ट वाले खेले से तवा ठोकने की ठक-ठक की आवाज, बजने वाला गुब्बारे की चिर चिर की आवाज, तेलहिया जलेबी बेचने वालों की हांक, मेला देखने वाले स्त्री-पुरुष बच्चों का शोरगुल, बंदर- भालू का नाच दिखाने वाले मदारी की डमरू की आवाज, माहौल को खुशनुमा, संगीतमय हम बच्चों को आकर्षित करते थे और हम बच्चे मेला में धक्कम धुक्का करते हुए मदारी,बाइस्कोप चरखी झूला के पास पहुंच जाते थे और अपनी मनमर्जी करते थे।
खेल तमाशा देखने के बाद सीटी, बजा, चरखी जलेबी, मूंगफली आदि खरीदते थे बर्फ चूसते हुए मेले से वापस लौटेते थे। घर लौटने के बाद खाने पीने की चीजों का बंटवारा अम्मा किया करती थी। हम लोग खाते पीते, खेल खिलौने खेलने में मस्त।
मेले से लौटने के खेल खिलौने बेचने वाली रात को नगर में आ जाते थे, और मैं उसे खरीदने के लिए दादी से पैसे मांगता था, दादी का दुलरवा होने के कारण दादी के लाख बिगड़ने- चिल्लाने पर हंसती मुस्कुराती हुई चोरी से अपने धोती के खूंटे से पैसा पकड़ा देती थी पैसा लेकर गायब।

व्यवसाई नंदलाल केसरी के अनुसार-बसंत पंचमी से ही माई और भौजी अंगुलियों पर शिवरात्रि, होली के त्यौहार में कितने दिन बाकी हैं गिनती शुरू कर देती थी, शिवरात्रि को मेले का आनंद को भी हम युवा,बच्चे मेले का आनंद लेते थे, फिर होली का इंतजार शुरू।
दादी गुलाबी देवी बताती हैं कि- सबसे पहले नगर में होलिका बढौली चौक पर नगर के व्यवसाय प्यारेलाल केसरवानी द्वारा स्थापित कराया जाता था होलिका दहन वाले दिन नगर के सभी लोग यहां पर होलिका दहन के लिए आते थे, लेकिन एक बार की घटना है कि एक ब्राह्मण पुत्र मजाक- मजाक में होलिका दहन के बाद उसको लाघने की कोशिश किया लेकिन दुर्भाग्यवश होलिका आग में गिर गया और बुरी तरह झुलस कर उसकी मृत्यु हो तब से यहां पर होलिका दहन का कार्यक्रम बंद हो गया और शिवरात्रि के दिन सब्जी मंडी के नुक्कड़ पर उत्तर मुहाल निवासी रामसूरत यादव ठेकेदार द्वारा शिवरात्रि के दिन सब्जी मंडी के गली के नुक्कड़ पर मंत्रोचार के साथ होलिका की स्थापना कराई जाती थी।

बच्चे जब बरैला मेले से लौटते थे तो होलिका देखकर बड़े खुश होते थे और जोर-जोर से चिल्लाते थे सम्मत मैया अली अली, लड़का रोए गली गली।
स्कूल , घर मे यह बताया जाता था कि होली प्रेम, सौहार्द, दिल से दिल मिलने मिलाने, परंपराओं का त्यौहार है। इन शब्दों का मायने बचपन में नहीं समझ में आता था।
बच्चे तो होली का मतलब रंग खेलने, उधम मचाने, पटाखे छुड़ाने, शरारत करने से समझते थे। इसकी तैयारी 15 दिन पहले से ही शुरू हो जाती थी।
होली के हफ्ते भर पहले बच्चों की उधम शुरू हो जाती थी दुकानों पर रंग अबीर की दुकानें लग जाती थी, लेकिन हम बच्चे एक दूसरे पर पानी फेंक कर ही होली की शुरुआत कर देते थे यदा-कदा रंग भी घोलकर एक दूसरे पर फेंकते थे।
वयोवृद्ध माता प्रसाद वर्मा बताते हैं कि-” रॉबर्ट्सगंज शहर में ट्रैफिक नहीं के बराबर थी सड़कों पर साइकिल और पैदल लोग चलते थे। मकानों की संख्या कम थी, हमारा आंगन बाथरूम होता था और घर के लोग खास तौर से युवा बच्चे पानी से होली खेलते थे। इस खेल में नहाने में घंटी लग जाते थे,जिनके घर के अंदर टाउन एरिया का नल लगा नहीं होता था उनका नहाना धोना सड़क की पटरी ऊपर लगे नलों पर होता था
होली के मौसम में बच्चों,, युवाओं को शरारत करने का सुनहरा अवसर होता था।
साथियों के उसकाने पर नहाते हुए व्यक्ति सिर सर लाल रंग की पुड़िया खोलकर डाल देते थे, नहाने वाला व्यक्ति अपने सिर रंग बता देख कर गुस्सा हो जाता था, कौन वह चिल्लाता भी था, गालियां भी देता आंख खोलकर देखने की कोशिश करता तो उसकी आंख में साबुन लग जाता था वह आंख बंद कर आंख मलंनै घब भाव भंगिमा पर आसपास के खड़े लोग हंसते खिलखिलाते थे, रंग से रंगा व्यक्ति हंसते हुए घर वापस आ जाता था। पानी अथवा रंग भरे हुए गुब्बारे चोरी से फेंकना और गुब्बारा फूटने बच्चों का तालियां बजाकर हंसना खिलखिलाना रंगे हुए व्यक्ति का गुस्सा काफूर कर देता था। कभी-कभी हम लोग अपने साथियों पर भी गुब्बारा फेंक देते चोट लगने से गुस्साए साथी हमसे उलझ जाते थे और पटका पटकी शुरू हो जाती थी, तब बड़ों को हस्तक्षेप करना पड़ता था। दोपहर के अलावा इस तरह का खेल हम लोग शाम को भी कभी-कभी खेल लिया करते थे, लेकिन तब हमें बड़ों की डोंट भी सुननी पड़ती थी।लेकिन ज्यादातर बच्चेआइस- पाइस, लुका छिपी, कबड्डी का खेल सड़क पर खेलते थे।

गर्मियों के मौसम में लोग अपने घरों के सामने सड़क की पटरियो पर खटिया बिछा कर, मच्छरदानी लगा कर बड़े आराम से खर्राटे लेते थे।
व्यापारी नेता राजेश गुप्ता के अनुसार- बचपन में अन्य बच्चों की तरह मैं भी शरारती था, उस समय ऊंट छाप रंग 5 पैसे पुड़िया मिलता था और हम लोग दादा- दादी, चाचा से मिलने वाले 10 पैसे, 5 पैसे से लाल, हरा, पीला, रंगों की पुड़िया खरीद कर जुटाना शुरू कर देते थे ताकि होली के दिन रंगों की कमी ना पड़े।बचपन का दोस्त जिसका नाम मुन्ना था, शरीर से दुबला- पतला था और हम लोगों के साथ हमेशा खेलता, पढ़ता लिखता था, हम लोग उसे परेशान भी करते, चिढ़ाते थे ज़मीन पर पैर पटक पटक कर रोता था और अम्मा से शिकायत करता था जब मैं डाटती तो वह मुस्कुराता था, होली के मौसम में जब वह सरकारी नल पर नहाता था, तो मैं उसके सिर पर रंग डाल दिया करता था, एक बार मैंने उसकी चुंडी चुपके से कैंची से चुडी काट दिया और मैंने हीं पूछा तुम्हारा चुंडी कहां है उसने अपने सिर पर हाथ फेरा, उसकी चुंडी नदारद थी, वह रोने लगा, उसे पता नहीं चल पाया कि उसकी चुंडी किसने काटी? अगर इसकी शिकायत अम्मा से करता तो निश्चित उसी दिन मैं मार खाता।

युवा नेता एवं रावतसर नगर पालिका परिषद के भूतपूर्व चेयरमैन कृष्ण मुरारी गुप्ता पुरानी यादें ताजा करते हुए बताते हैं कि- स्वामी विवेकानंद बाल विद्यालय में पढ़ता था, जो मेरे घर से थोड़ी ही दूर बरम बाबा की गली में अवस्थित था। होली के पहले ही हम लोग आपस में स्याही से होली खेल लेते थे, इसके लिए हमारी टीचर हम लोगों को मामूली दंड भी देती थी लेकिन बालमन शरारत किए बिना मानता नहीं था। जिस दिन होली की छुट्टी होनी होती थी उस दिन विद्यालय कि सभी कक्षाओं में होली से संबंधित कहानियां टीचरों अथवा सीनियर छात्रों द्वारा सुनाई जाती थी, हम छात्रों को हिदायत दी जाती थी कि पानी के गुब्बारों से होली मैं ना फेंके गंदे सामानों तारकोल, कीचड़ आदि किसी के चेहरे पर ना लगाएं, पिचकारी से रंग खेले आदि।
मेरे विद्यालय के प्रबंधक विश्वनाथ प्रसाद केडिया हम छात्र-छात्राओं के प्रति बड़े ही उदार थे। हर होली के त्योहार पर होलिका दहन अथवा इसके 1 दिन पूर्व सभी छात्र- छात्राओं को प्लास्टिक वाली पिचकारी, पुड़िया वाला रंग, एक छोटी बट्टी हमाम साबुन, अबीर बटवाते थे। स्कूल से हमें टीचरों द्वारा हिदायत दी जाती थी की सारा सामान लेकर सीधे सब लोग अपने- अपने घर लेकिन मेरे कुछ बालसखा इन सामग्रियों का प्रयोग स्कूल के रास्ते में ही कर देते थे, जिससे उनका चेहरा कपड़ा और बस्ता रंगीन हो जाता थाना लेकिन ज्यादातर बच्चे अपने होली के उपहार को बड़ी हंसी- खुशी घर जाते थे, हम लोग भी इन्हीं बच्चों में शामिल थे और अम्मा मेरा, बहन का सामान एक अलमारी में रख देती थी।मेरी अम्मा बहुत ही सख्त स्वभाव की थी लेकिन होली की छुट्टी में उनसे आंखें बचा कर मैं दोस्तों के साथ रंग खेला करता था।
विंध्य संस्कृति शोध समिति उत्तर प्रदेश ट्रस्ट के निदेशक दीपक कुमार केसरवानी के अनुसार- होली के पूर्व ही नगर के रामलीला मैदान में प्रदर्शनी की धूम जाती थी इस प्रदर्शनी का मुख्य आकर्षण चरखी वाला झूला, स्टूडियो, दैनिक उपयोग के सामान की दुकान, निशानेबाजी, खेल- खिलौने की दुकान सहित किसिम- किसिम की दुकाने सजी रहती थी और बड़े-बड़े की स्पीकर ओं में गाना बजता था- “जिसका मुझे था इंतजार,
जिसके लिए था दिल बेकरार।
वो घड़ी आ गई, आ गई।,

हम बच्चों का आकर्षण चरखी वाला झूला था, हम प्रदर्शनी में चाचा अथवा मम्मी-पापा के साथ जाते तो चरखी जरूर झूलते थे, चरखी पर बैठने के बाद जब चरखी उल्टी घूमती थी तो बड़ा अच्छा और गुदगुदी होती थी,जब चरखी ऊपर से नीचे की ओर आती थी तो भय और रोमांच के कारण आंखें बंद कर लेते थे, चरखी पांच चक्कर लगाती थी। चरखी नगर का नजारा देखने में आनंद आता था।
प्रदर्शनी के अस्थाई स्टूडियो में फोटो खिंचवाने का आनंद ही था। ब्लैक एंड वाइट फोटो का जमाना था और मात्र डेढ़ रुपए में चांद सितारे, कट आउट, मोटरसाइकिल पर बैठकर, बाघ का बंदूक से शिकार करते या बाघ का मुंह फाड़े फिल्म तारिका हेमा मालिनी, ताजमहल की रंगीन पर्दे के आगे फोटो खिंचवाने के लिए लोगों की भीड़ लगी रहती थी। एक बार मैं, अम्मा, पापा छोटी बहन चंदा के साथ प्रदर्शनी से लौटते समय एक फोटो रामलीला मैदान के सामने स्थित प्रतिमा स्टूडियो में खींचवाया थाआज भी स्टूडियो और ताजमहल, चांद सितारे ,मोटरसाइकिल पर प्रदर्शनी में खिंचवाई गई फोटो मेरी एल्बम में सुरक्षित है।
प्रदर्शनी में घूमने का खामियाजा भी लोगों को भुगतना पड़ता था ज्यादातर मोहल्ले के शरारती लड़के लोगों के घर, आंगन, पिछवाड़े से बांस- बल्ली और लकड़ियां यहां तक कि गोमती,ठेले तक उठाकर होलिका में रख देते थे। जिससे लोगों का नुकसान होता था और लोग शरारती बच्चों को युवाओं को गाली देते हुए अपना सामान होलिका से वापस ले आते थे ऐसी मान्यता है कि ऐसा करने के पहले होलिका में कुछ लकड़ी भी दान स्वरूप डालनी पड़ती थी और लोग ऐसा ही करते थे।
उस जमाने में होलिका के लिए नौजवान और बच्चे हरा पेड़ काट कर कंधे पर उठाए सम्मत मैया अली अली, लड़का रोवे गली गली का उद्घोष करते हुए होलिका में कटा हुआ पेड़ डाल देते थे, इस प्रकार की युवाओं की शरारत भरी मेहनत से होलिका में काफी मात्रा में पेड़ों की लकड़ी, टहानियां आदि जुट जाते थे।
होली के पहले से ही फगुआ गाने का रिवाज हमारे मोहल्ले में था और रामसूरत ठेकेदार इसके आयोजक होते थे, प्रतिदिन इनके चौकी पर स्थानीय निवासी राजकुमार, शंभू, मामा खजड़ी बजाकर फगुआ गाते थे अनंत नाम का पुरुष स्त्रियों की वेशभूषा धारण कर गीत और नृत्य की धूम देर रात तक नाचता था।
चुर्क से प्रतिदिन चना जोर गरम बेचने वाला एक फेरीवाला नगर में चना जोर गरम बेचता था और गाता था- चना जोर गरम बाबू में लाया मजेदार चना जोर गरम उसकी वेशभूषा सफेद धोती, कुर्ता और टोपी लगाए रहता था और उसके गले में एक कनस्तर का डिब्बा बना होता था और वह 10 पैसे, पच्चीस पैसे का हम बच्चों को चोगा बनाकर चना जोर गरम दिया जाता था और यह गीत गाता था, एक साल उसने भी होली के पूर्व स्त्री रूप धारण कर होली के धुन, गीत पर नृत्य किया था जिसे आज भी मोहल्ले के पुराने लोग याद करते हैं। एक बार ही घटना है कि मोहल्ले के कुछ युवा पड़ोस के चाय की दुकान पर रंग खेलने के लिए घुस गए रंगों की पोता पोती में चाय की भट्टी पर रखा दूध का बड़ा भगोना दुकानदार के ही पैर पर गिर गया जिसकी वजह से उसका पैर बुरी तरह झुलस गया क्योंकि चित परिचित लोग होली खेलने में शामिल थे इसलिए कोई अनहोनी घटना नहीं हुई लेकिन दुकानदार को महीनों तक इलाज कराना पड़ा।

हम बाल सखाओके बाल मन में होलिका के प्रति अपार प्रेम होता था और हम लोग अपनी बचत के पैसे से पटाखे खरीद कर होलिका में छिपा देते थे मैंने भी एक बार एक सांप वाला बम होलिका की लकड़ियों के बीच छुपा दिया पायाश था और सोचा था कि जब होलीका जलेगी तब उसमें यह सांप नाचेगा। उस साल होलिका में आग लगी पटाखे बजे लेकिन मेरा सांप ना नाचा ना उछला।
मैंने जब यह बात अपने पापा को बताई पापा हंसने लगे और मम्मी ने खूब डाटा।
प्रतिवर्ष होलिका दहन वाले दिन रामसूरत यादव द्वारा लकड़ी डलवा दें और आसपास का क्षेत्र लाल, पीली, नीली, हरी, कागज की झाड़ियों से सजाते थे और निर्धारित समय तिथि के अनुसार मोहल्ले के ही भानु प्रताप (भांग पंडित) इनके बाद इनके पुत्र रामा पंडित होलीका जलाने के पूर्व पूजा अनुष्ठान कराया करते थे और तब जाके होलिका में आग लगाई जाती थी स्थानीय लोग परिक्रमा कर उसमें लकड़ी होलिका को समर्पित कर पीसी और सरसों की बाली लेकर परिक्रमा कर परिवार के सुख शांति की कामना के साथ घर लौटेतै थे। होलिका जलाने के पहले बारात भी निकलती थी और नगर के युवा उस बारात में शामिल होते थे रथ पर किशोरी खटीक दूल्हा बनते थे। बारात बैंड बाजे के साथ नगर भ्रमण करती थी।

दूसरे दिन होलिका की राख के साथ होली का शुभारंभ होता था और मोहल्ले के लोग हम बच्चे आपस में होली खेलते हैं दोपहर बाद गीत- संगीत का कार्यक्रम खत्म होता था और शाम को उसी बैठक में होली मिलन समारोह का आयोजन किया जाता था और शादी ठंडई, भांग वाली ठंडई का दौर देर तक चलता था। परंपरागत होली मनाने का दौर प्यारेलाल केसरवानी ने शुरू किया था और इस परंपरा को रामसूरत यादव के जीवित रहने तक चला, इसके बाद के सहयोगी माता प्रसाद द्वारा कई वर्षों तक आपसी सहयोग से यह कार्यक्रम चलता रहा आज होलिका की स्थापना एवं दहन का कार्यक्रम नगर पालिका के पूर्व चेयरमैन कृष्ण मुरारी गुप्ता, व्यापार मंडल के जिला अध्यक्ष राजेश गुप्ता अन्य मोहल्ले के प्रतिष्ठित लोगों के सहयोग से आयोजित होता है। समय के साथ साथ सब कुछ बदल चुका है, बावजूद इसके परंपराएं कायम है।




