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- रामायण की सांस्कृतिक विकास यात्रा’ विषयक संगोष्ठी का हुआ आयोजन
वाराणसी। अयोध्या शोध संस्थान, अयोध्या पर्यटन एवं संस्कृति विभाग, उत्तर प्रदेश द्वारा जन जन के राम विषय पर उत्तर प्रदेश के 16 जिलों में प्रस्तावित रामायण कॉन्क्लेव के आयोजन के क्रम में चित्रकूट के बाद द्वितीय पड़ाव के रूप में वाराणसी में भारत अध्ययन केंद्र के सहयोग से काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कला संकाय प्रेक्षागृह में दो दिवसीय रामायण कॉन्क्लेव’ का आयोजन किया गया।

इसके अन्तर्गत शनिवार को आयोजित रामायण की सांस्कृतिक विकास यात्रा’ विषयक अकादमिक सत्र में मुख्य वक्ता के रूप में हिन्दी विभाग के पूर्व आचार्य प्रो. अवधेश प्रधान ने कहा कि भारत का इतिहास सन्तों और कवियों ने रचा है। रामायण एक मात्र ऐसा ग्रन्थ है जो भारत की संस्कृति को सम्पूर्णता में व्यक्त करता है त्याग और प्रेम भारतीय संस्कृति का मूल है तथा करूणा रामायण का बीज है। उन्होंने सीता के व्यक्तित्व को व्याख्यायित करते हुए बताया कि सीता के महान चरित्र से ही मिलकर राम की कथा पूरी होती है।

विशिष्ट वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के पूर्व क्षेत्रीय निदेशक प्रो. विजय शंकर शुक्ल ने कहा कि सभी विद्याओं का एकीकृत स्वरूप वाल्मीकि रामायण में हमें मिलता है। वाल्मीकि ने रामायण के माध्मय से ब्रह्म की स्थापना की है। अष्ट मंगल की अवधारणा भारतीय संस्कृति में सर्वप्रथम हमें वाल्मीकि रामायण में दिखायी पड़ती है। कमल, शंख, स्वस्तिक आदि वास्तु का व्यवस्थित स्वरूप रामायण में है। वाल्मीकि सच्चे अर्थों में सांस्कृतिक भारत के निर्माण के हेतु है। रामायण के सांस्कृतिक पक्ष पर बात करते हुए संस्कृत विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. मनुलता शर्मा ने कहा कि राम अप्रतिम है जिनके भीतर समस्त आदर्श समाहित है समग्र ऐश्वर्य, ज्ञान, धर्म, यश तथा वैराग्य के अधिष्ठाता को भगवान् कहा जाता है। इस रूप में हमारी आस्था के केन्द्र है भगवान् राम।
रामायण के पुरातात्त्विक संदर्भों पर विचार करते हुए प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्त्व विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. सीताराम दूबे ने गुप्तकाल के अभिलेखों में रामकथा के ने विविध संदर्भों का विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने बताया कि गुप्तकाल तक राम को भगवान् के रूप में मान लिया गया था।
उन्होंने साहित्यिक, पुरातात्त्विक, लौकिक तीन प्रकार के साक्ष्य के बारे में विस्तार से चर्चा की तथा बताया कि अमृतेश्वर मन्दिर में रामायण के अनेक प्रसंगों का विस्तृत चित्रण मिलता है। श्रीलंका से पधारे विद्वान बाला शंकुरात्रि ने रामायण के भौगोलिक, राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक पक्ष पर अपने विचार रखें।

जन्तुविज्ञान विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के आचार्य प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे ने रामायण में वर्णित जनजातियों कोल, भील और गोड़ की उपस्थिति को वर्तमान सन्दनों से जोड़ा तथा उनकी अनुवांशिक व्याख्या की। सभी अतिथियों का सम्मान अयोध्या शोध संस्थान के निदेशक डॉ. लवकुश द्विवेदी, धन्यवाद ज्ञापन क्षेत्रीय पुरातत्त्व अधिकारी डॉ. सुभाष चन्द्र यादव ने किया तथा सम्पूर्ण सत्र का संचालन हिन्दी विभाग के सहायक आचार्य डॉ. महेन्द्र प्रसाद कुशवाहा ने किया। आकादमिक सत्र के बाद बीते 02 फरवरी को गुरुधाम मन्दिर परिसर में हुए रामायण के विविध पक्षों पर हुई चित्रकला प्रतियोगिता के विजेताओं के पुरस्कार एवं प्रमाणपत्र प्रदान किया गया। इसके अतिरिक्त रामायण गान तथा बाल एवं युवा काव्याचन कार्यक्रम आयोजित किया गया जिसमें वाराणसी के विभिन्न विद्यालयों तथा महाविद्यालयों के छात्र-छात्राओं ने अपनी काव्य रचना के साथ ही रामायण के विभिन्न प्रसंगों का पाठ भी किया।

कार्यक्रम के अन्तर्गत समाकालीन सन्दर्भ में ‘रामकथा – परम्परा एवं आधुनिकता’ विषयक पुस्तक का लोकार्पण किया गया। जिसके सम्पादक हिन्दी विभाग काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के आचार्य प्रो. चम्पा सिंह तथा संस्कृत विभाग के सहायक आचार्य राजेश सरकार है। सायंकाल सांस्कृतिक संध्या में पं. अजय पोहनकर ने प्रभु श्रीराम के भजन प्रस्तुत किये।
