दीपोत्सव के साथ शुरू हुआ करमा का पर्व

HIGHLIGHTS

  • आदिवासी करमा नृत्य के माध्यम से देते हैं पर्यावरण संरक्षण का संदेश
  • सोनभद्र में दीपावली से शुरू होता है करमा पर्व
  • ब्रिटिश साहित्यकारों ने किया है करमा नृत्य पर शोध कार्य।
हर्षवर्धन केसरवानी
(जिला संवाददाता)

सोनभद्र। आदिवासी बाहुल्य जनपद सोनभद्र में दीपावली के दीप उत्सव के साथ शुरू हुआ कर्मा का पर्व। अमावस्या के दिन पढ़ने वाली दीपावली का पर्व पूजा, अनुष्ठान,आराधना, तंत्र मंत्र को जागृत करने का पर्व है। आदिवासी जनपद सोनभद्र में आदिवासी बाहुल्य इलाकों में दीपावली का पर्व दीप उत्सव के साथ- साथ नृत्य, उत्सव, अनुष्ठान, पूजा- पाठ करके आदिवासी मनाते हैं ।

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संस्कृति विभाग उत्तर प्रदेश के नामित सदस्य दीपक कुमार केसरवानी के अनुसा-“करमा आदिवासियों का लोकप्रिय नृत्य है और आदिवासी दीपावली के दिन करमा नृत्य के माध्यम से कर्म देवता को प्रसन्न करने के साथ-साथ प्रकृति संरक्षण एवं पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी अपने गीतों के माध्यम से देते हैं।

दीपावली के आगमन के पूर्व आदिवासी इलाकों में करमा पर्व मनाने की तैयारी शुरू हो जाती है और जहां पर इस पर्व के आयोजन का स्थान तय होता है वहां पर आदिवासीजन खुद वहां की सफाई, लिपाई, पुताई करते हैं और दीपावली के दिन आदिवासी युवक- युवतियां मादल की थाप पर गीत गाती हुई जंगल में जाते हैं। और वहां पर आदिवासी युवक हल्दु अथवा कदम के पेड़ पर चढ जाते हैं और एक हरी डाल को काटते हैं। (आदिवासी संस्कृति और समाज में कर्म की उपाधि दी गई है)

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और कदम या हल्दु के पेड़ के नीचे खड़ी आदिवासी युवतियां उस डाल को लोक लेती हैं और पुन: कर्मदेव के गीत गाते हुए युवक- युवती गांव पहुंचते हैं और गांव की चौपाल, किसी खुले स्थान अथवा आंगन में कर्मदेव की डाल की स्थापना आदिवासियों के पुरोहित बैगा तंत्र- मंत्र के साथ करते हैं और पूजा अनुष्ठान तांत्रिक क्रियाओं के पश्चात आदिवासीजन कर्मदेव को रिझाने, मनाने और अपने सुख शांति, समृद्धि के लिए मादल के थाप,पैजनी के झनझन पर करमा लोकनृत्य का आरंभ करते हैं।

आदिवासी लोक कला केंद्र की सचिव एवं साहित्यकार प्रतिभा देवी के अनुसार-“आदिवासी स्त्रियां अपने परंपरागत वस्त्राभूषण अपने केशों की सजावट फूलों पतियों के माध्यम से करती हैं आदिवासी युवक भी अपनी नई वेशभूषा को धारण कर गले में मॉदल लटकाए पुरुष मांदल की थाप पर आदिवासी स्त्रियां नृत्य का आरंभ करती हैं इस नृत्य में सामाजिक मर्यादाओं का ख्याल रखा जाता है,

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ससुर, भसुर मुख्य रूप से भाग नहीं लेते गले में लटके मॉदल पर हाथ की थाप से बजने वाले सुमधुर संगीत, पैरों में बंधी हुई पैरी की छन छन की धुन पर आदिवासी नर्तक आपा खो बैठते हैं ध्वनियों के साथ मिलकर नृत्य को सहज गति प्रदान करते हैं मंडलाकार अथवा अर्ध गोलाकार मे खड़े आदिवासी स्त्री-पुरुष नृत्य करते हुए, गीत गाते हुए कर्मदेव की आराधना में लीन हैं, जनपद के राबर्ट्सगंज, दुद्धी, म्योरपुर, बभनी विकास खंडों के आदिवासी बाहुल्य गांव में इस नृत्य का आयोजन सामूहिक रूप से किया जाता है।

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इसमें ओझा की मुख्य भूमिका होती है और ओझा अपने विभिन्न क्रियाओं के माध्यम से लोगों के जीवन में आने वाली परेशानियों एवं इसके निदान की क्रिया बताता है साथ ही साथ वह अपने शरीर पर गुरुदम, लोहे के सीकड से प्रहार करता है, सांगा गाल में पहन लेता है और भावाविभोर होकर नृत्य करते हुए कर्मदेव का अनुष्ठान, पूजा पाठ करता है, इस पर्व से अनेकों लोक कथाएं जुड़ी हुई हैं।

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कठपुतली कला केंद्र सलखन के संस्थापक रंगकर्मी हरिशंकर शुक्ला का मानना है-“,सोनभद्र जनपद के बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों में गरबा नृत्य का आयोजन होता है आयोजन में भाग लेने वाले आदिवासियों की अपनी- अपनी संस्कृति हैऔर नृत्य प्रस्तुत करने का अलग- अलग तरीका होता है।
लोक कला विशेषज्ञ डॉक्टर अर्जुन दास केसरी के अनुसार-‘आदिवासी आदिवासी जन अनुष्ठान, पूजा, पाठ के माध्यम से अपने अपने परिवार तथा गांव में निवास करने वाले लोगों का जीवन सुख समृद्धि से भरा रहे इसकी भी प्रार्थना कर्म देव से करते हैं।

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करमा नृत्य के बारे में पाश्चात्य विद्वान विलियम क्रुक,डाल्टन, वैरियर एल्विन आदि पाश्चात्य विद्वानों सहित सोनभद्र जनपद प्रख्यात लोक साहित्यकार डॉक्टर अर्जुनदास केसरी, दीपक कुमार केसरवानी इत्यादि विद्वानों ने अपनी- अपनी कृतियों में कर्मा लोक नृत्य पर विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला है, गीतों में कर्मदेव को प्रसन्न करने अथवा पूजा अनुष्ठान के गीतों के साथ आदिवासीजन अपने जीवन की तमाम समस्याओं को उजागर करते हैं, प्रकृति उपासना के गीत के साथ साथ आदिवासीजन पूजा अनुष्ठान के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हैं ।

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शिक्षिका तृप्ति केसरवानी के अनुसार-“हम करमा लोकनृत्य के आयोजन का अध्ययन करें तो इनकी हर क्रिया, अनुष्ठान मेप्रकृति संरक्षण का संदेश छिपा हुआ है आदिवासी अपने नृत्य, गीत, संगीत के माध्यम से इसको उजागर करते हैं।”
आज सोनभद्र जनपद पर्यावरण की समस्या से जूझ रहा है ऐसे में शहरों के किनारे गांवों में, जंगलों में कठिन, श्रम साध्य सुविधा विहीन जीवन जीते हुए आदिवासी कलाकार न केवल पर्यावरण संरक्षण का संदेश दे रहे हैं बल्कि आगामी पीढ़ी को भी पर्यावरण संरक्षण का संदेश दे रहे हैं, इस संदेश को सभी समाज सभ्य लोगों, पर्यावरणविदो, विद्वानों को सुनना और गुनना होगा,तभी दीपावली के दिन आदिवासियों जातियों द्वारा मनाए जाने वाले करमा पर्व का उद्देश्य सफल होगा।

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संस्कृति LIVE द्वारा प्रकाशित

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