दुर्गा देवी की कृपा से ही वीर लोरिक ने जीता था अघोरी किला

HIGHLIGHTS

  • मारकुंडी घाट पर है मां दुर्गा का शक्तिपीठ
  • वीर लोरिक गौ रक्षक समुदाय का सिद्ध तांत्रिक था
  • लोरिकायन में वर्णित है लोरिक की वीर गाथा
हर्षवर्धन केसरवानी
(जिला संवाददाता)

सोनभद्र। शोण महानद किनारे अवस्थित सोनभद्र के अंचलों में गाए जाने वाला लोरिकायन का महानायक वीर लोरिक महाशक्तियों का पुजारी था,मारकुंडी घाट पर अवस्थित दुर्गा मंदिर एवं शोण महानद के किनारे अवस्थित बंसला देवी के मंदिर का उल्लेख लोरिकायन महाकाव्य में कई बार आया है देवी बंसला देवी, दुर्गा माता ने विपत्ति और युद्ध के समय वीर लोरिक की अनेकों माध्यमों से सहायता किया जिसके कारण वीर लोरिक अगोरी पर विजय प्राप्त कर पाए थे।

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लोक इतिहासकार दीपक कुमार केसरवानी के अनुसार-“वीर लोरिक महा शक्तियों के उपासक था और उन्होंने कठिन तपस्या पर तंत्र सिद्धि प्राप्त किया था, वीर लोरिक अगोरी के रहने वाले अहिर महरा की पुत्री से मंजरी विवाह करने आए थे परंतु अत्याचारी राजा मोलागत जो मंजरी को अपने रनिवास रानी बनाकर ले लाना चाहता था,लोरिक ने राजा मोलागत का विरोध किया और राजा मोलागत के युद्ध के आमंत्रण को स्वीकार भी किया, तत्पश्चात राजा मोलागत और वीर लोरिक में भयंकर युद्ध हुआ अगोरी के राजा मोलागत के पास असीम शक्ति एवं एक बड़ी सेना थी दूसरी ओर वीर लोरिक के साथ के कुछ वीर शक्तिशाली लोग थे जो बाराती बनकर अगोरी आए थे, जिसके कारण वीर लोरिक को कई बार महसूस हुआ कि वे युद्ध हार जाएंगे लेकिन उन्होंने मां बऺसला देवी का संस्मरण करके युद्ध लड़ते रहे युद्ध में अपने वीरता शौर्य पराक्रम का परिचय देते हुए मां दुर्गा एवं वऺसला देवी के बल पर विजयश्री प्राप्त किया, अघोरी राज्य की प्रजा को राजा मोलागत के अत्याचारों से मुक्त कराया, वही अगोरी की सुंदरी मंजरी से विवाह करके जहां एक ओर उसने भारतीय संस्कृति का पालन किया वही जीते हुए राज्य के राजा के सिंहासन पर अधिकार न जमा कर उनकी संपत्ति, स्त्रियों को जप्त न करके अपनी उदारता का परिचय दिया।”

लोक गायक दूधनाथ यादव के अनुसार-“वीर लोरिक एक तांत्रिक था और उसके पास अनेको तांत्रिक शक्तियां थी, लोरिकायन में वर्णित कई ऐसे प्रसंग आते हैं जहां पर वीर लोरिक के अद्भुत, साहस, वीरता का उल्लेख है जो किसी सामान्य योद्धा द्वारा संभव नहीं लगता है वीर लोरिक गौ रक्षक समुदाय का तांत्रिक था उसकी पत्नी अथवा शिष्य मंजरी उसके तंत्र सिद्धि में सहायिका थीऔर विवाह के पूर्व और विवाह के बाद वीर लोरिक ने इन महाशक्तियों की कठोर आराधना किया विवाह के पश्चात जब लोरिक अपनी पत्नी एवं बारातियों सहित मिर्जापुर जनपद के गौरा गांव के लिए प्रस्थान किया और जब बारात मारकुंडी घाट पर पहुंची तो मंजरी का डोला मां दुर्गा मंदिर के पास का रुका, वीर लोरिक और मंजरी ने मां दुर्गा की पूजा अर्चना किया और उनसे आशीर्वाद प्राप्त किया।”

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लोरिकायन के संकलनकर्ता लोक साहित्यकार डॉक्टर अर्जुनदास केसरी के अनुसार-“वर्तमान मारकुंडी घाट पर स्थित दुर्गा मंदिर के पीछे एक प्रतीकात्मक पत्थर का बना हुआ म मंजरी का डोला है, मंजरी को अपना मायका छोड़े जाने का दुख था और उससे वीर लोरिक से निवेदन किया कि महाराज अब तो हमारा अगोरी छूटा जा रहा है आप इस स्थान पर अपने वीरता और पराक्रम से कोई ऐसा प्रतीकात्मक चिन्ह अंकित कीजिए जिससे कि आने वाली पीढ़ियां हमारी प्रेमगाथा को याद रखें, मंजरी के कथन पर वीर लोरिक ने एक विशाल पाषाण खंड को अपनी अद्भुत, पराक्रमी तलवार से काट डालाऔर प्रस्तर खंड दो भागों में विभाजित होकर गिर पड़ा, मंजरी ने कहा महाराज ऐसे नहीं आप पाषाण खंड को काटे और यह दोनों खंड आपस में जुड़े रहे वीर लोरिक ने एक हाथ पाषाण खंड पर लगाया और दूसरे हाथ से पाषाण खंड को अपनी तलवार से विशाल पाषाण खंड को काट डाला और दोनों खंड आपस में जुड़े भी रहे इस प्रकार वीर लोरिक ने अपनी पत्नी मंजरी के कथनानुसार वीरता और पराक्रम का परिचय दिया ।
बारात आगे के लिए प्रस्थान करती है पंचमुखी पहाड़ी पर स्थित की गुफा कोहबर भी कहा जाता है यह स्थान है जहां पर नवविवाहित दंपत्ति प्रथम रात्रि विश्राम करते हैं ऐसा माना जाता है कि वीर लोरिक और मंजरी ने अपनी प्रथम रात्रि यही पर गुजारा था।

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वीर लोरिकायन पर शोध कार्य कर रहे पत्रकार राम प्रसाद यादव कथन है कि- “लोरिक अगोरी से अपनी पत्नी को विदा कराकर गौरा के लिए प्रस्थान करते हैं और वहां जाकर लोरिक और मंजरी सुख पूर्वक रहते हुए संतति प्राप्त कर सुख पूर्वक अपना जीवन बिताते हैं।
अहीरो के महाकाव्य लोरिकायन में वर्णित स्थान, युद्ध, घटनाक्रम इत्यादि सोनभद्र जनपद में अवस्थित है। प्रतिवर्ष वीर लोरिक पत्थर पर गोवर्धन पूजा का आयोजन होता है एवं अगोरी गांव में मंजरी माता के मंदिर में प्रतिवर्ष पूजा-पाठ, आराधना भी किया जाता है वीर लोरिक पत्थर आज पर्यटन एवं श्रद्धालुओं का केंद्र बना हुआ है और इस शौर्य, पराक्रम, प्रेम का प्रतीक वीर लोरिक पत्थर पर स्त्रियां अपनी सौभाग्य के लिए मान्यताएं करती हैं पूजा-अर्चना करती हैं और सिंदूर चूड़ियां इत्यादि चढ़ाती है।”

महाकाव्य के गायक रामवृक्ष यादव निवासी ग्राम अमोखर के अनुसार-“लोरिकायन महाकाव्य का गायन मुख्य रूप से अहीर जाति के लोगों द्वारा गाया जाता है और इस लोकगायन में वीर लोरिक के जन्म से लेकर युद्ध, विजय एवं पुत्रों की प्राप्ति और उनके पराक्रम का वर्णन किया जाता है,मिर्जापुर जनपद का गौरा गांव और सोनभद्र जनपद का अगोरी जनपद इस महाकाव्य से जुड़ा हुआ है और इन दोनों जनपदों के मध्य लोरीकायन की सारी घटनाएं घटित होती हैं इसलिए दोनों जनपदों में लोरिकायन मुख्य रूप से इन जनपदों में गाया जाता है।

जनपद में महा शक्तियों की पूजा का प्रश्न आज भी है अघोरी स्थित बंसरा देवी मारकुंडी पहाड़ी पर स्थित दुर्गा देवी शक्ति नगर में स्थित ज्वालामुखी देवी, रॉबर्ट्सगंज मुख्यालय की शीतला माता, रामगढ़ की काली मंदिर, घोरावल स्थित कुंडवासिनी देवी, अमिला भवानी, अमरा भगवती सहित जनपद सोनभद्र के ग्रामीण शहरी अंचलों में अवस्थित देवी मंदिरों में नवरात्र में जहां एक और तंत्र साधक अपनी तंत्र सिद्धि के लिए जप- तप करते हैं, वही श्रद्धालुजन पूजा- पाठ करके अपनी मनोकामना पूर्ण होने की देवी से प्रार्थना करते हैं।

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संस्कृति LIVE द्वारा प्रकाशित

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