HIGHLIGHTS
- दुद्धी के व्यवसायियों ने शुरू किया रामलीला को
- दुद्धि की रामलीला मंचन की परंपरा प्राचीन है
- स्थानीय कलाकार करते हैं रामलीला का मंचन

(जिला संवाददाता)
सोनभद्र। उत्तर प्रदेश के अंतिम छोर पर अवस्थित सोनभद्र जनपद में आदिवासियों के जननायक भगवान श्री राम की कथा पर आधारित दुद्धी की रामलीला सैकड़ों साल पुरानी परम्परा है।
रामायण कल्चर मैपिंग योजना सोनभद्र के डिस्ट्रिक्ट कोऑर्डिनेटर/संस्कृति विभाग उत्तर प्रदेश के नामित विशेषज्ञ दीपक कुमार केसरवानी के अनुसार-दुद्धी नगर की स्थापना आदिवासी तांत्रिक ननकू माझी द्वारा किया गया था। भारत के अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फ़र के शासन काल मे नगर उंटारी, अहरौरा, गहरवार, सिंगरौली घराने के कलाकार दुद्धी, विंढमगंज, मूड़ीसेमर आदि क्षेत्रों में कीर्तन, रामलीला किया करते थे।

इस सांस्कृतिक परंपरा ने महात्मा गांधी के द्वारा चलाए गए स्वतंत्रता आंदोलन आंदोलन के प्रचार- प्रसार का माध्यम बना। दुद्धि के प्रख्यात संगीतकार जोखू महाराज जो महाराजा सिंधिया के दरबार में संगीतज्ञ थे, उनके संगीत की चर्चा देशभर में थी, महाराज सिंधिया द्वारा पुरस्कार स्वरूप दिया गया चांदी का राम- लक्ष्मण का मुकुट आज भी उनके वंशजों के पास सुरक्षित है, रामलीला की शुरुआत उसी मुकुट पूजन से होती है
दिल्ली दूरदर्शन केंद्र में कार्यरत दुद्धी निवासी ईशहाक खान के अनुसार- “निर्माणाधीन हवाई अड्डा म्योरपुर (नेऊरगंज) के रामलीला दिवंगत कलाकार नासिर खान जो रिश्ते में मेरे ममेरा नाना लगते थे,दुद्धी रामलीला में स्त्री भूमिका निभाते थे। दुद्धी में रामलीला की परम्परा रामलीला एक बड़े उत्सव, त्योहार के रुप में मनाया जाता रहा है।हमें अच्छी तरह याद है कि जब हम बचपन में बाजार में जाते थे और देखते थे कि रामलीला की मंच की तैयारी चल रही है।इस काम को लोग आसान बोली में समझाते -खंभा खूटी गड़ गया। यह काम रामलीला की शुरुआत से तकरीबन हफ्तों पहले होता था तभी से बच्चों में खुशी की लहर दौड़ जाती। गांव घर में जाकर बताते कि रामलीला के लिए खंभा खूटी गड़ गई है यानी कि रामलीला होना निश्चित है ।

हिंदी साहित्य अकादमी नई दिल्ली द्वारा कहानी लेखन में फेलोशिप प्राप्त करने वाले दुद्धी निवासी, साहित्यकार डॉक्टर लवकुश प्रजापति के अनुसार-“रामलीला की प्रासंगिकता कल भी थी और आज भी है दुद्धी की रामलीला में हिंदू मुस्लिम एकता की झलक देखने को मिलती है। इसमें हिंदू- मुसलमान सभी कलाकार रामलीला का मंचन करते हैं।
पहले दुद्धी बाजार सप्ताह में रविवार और बृहस्पतिवार को लगता था। उस दिन दर्शकों की बाढ़ सी आ जाती। शाम छ बजे से ही लोग बैठ जाते। बाजार करने जो लोग आते थे २५ किलोमीटर, 50 किलोमीटर दूर से रामलीला के दिनों में उनका मकसद होता था बाजार करने के बाद राम लीला देख कर सुबह भोर होते ही अपने अपने घर को चले जाते थे। करीब 50 किलोमीटर तक के गांव देहात के लोग पुराने साइकिल के टायर जलाकर रोशनी करके राम लीला देखने आते थे और देखने के बाद उसी तरह से लौटते थे । भोर हो जाने पर फिर नींद कहां ? अपने-अपने घरों में अगर खेती किसानी का वक्त है तो हल बैल की तैयारी में लग जाते, अपने बैलों को चारा खिलाने में लग जाते या फिर अपने खेत खलिहान के कामों में लग जाते।

प्रसिद्ध शायर हसन सोनभद्री के अनुसार रामलीला को पाला पोसा दुद्धी के आढ़तियों ने । वे आढ़त लगाते तो धर्मादा नाम से कुछ निकाल लेते। कोई अनाज,दलहन तिलहन लाही डोरी महुआ जो कुछ भी खरीदते धर्मादा का अंशदान को नकद पैसे के रुप में लीला मंडली को सहयोग में दान कर देते।
चर्च के पादरी मिथिलेश मशीन रामलीला के कलाकारों के बारे में बताते हैं कि -“रामलीला में श्री राम की भूमिका धनौरा के अनिल पांडेय, देवेन्द्र पंडित के पिता हनुमान की भूमिका में जीवन के अंतिम क्षणों तक, रावण-भगवान सिंह, बाली – बिहारी जोकर की भूमिका में भी पारंगत थे, देवेन्द्र पंडित द्वारा परशुराम की भूमिका , महन्त अथवा व्यास का निर्वहन करते प्रेमचन्द मिश्रा , महिला कलाकार की भूमिका में त्रिवेणी, किशोरी जौहरी, रामलीला के बाद नाटक का भी प्रदर्शन किया जाता था जिसमें राजा हरिश्चंद्र की भूमिका में महादेव सिंह, तारामति- बिहारी कलाकार की भूमिका का निर्वहन करते रहे। प्रबंधक डा राजकिशोर सिंह का पहला शब्द ” बंधूओं ” सुनते ही दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते थे।

रामलीला कमेटी के अध्यक्ष जितेंद्र कुमार श्रीवास्तव का मानना है कि -“दुद्धी की रामलीला आज भी उन्ही आढ़तियों, दुकानदारों समाजसेवियों और आमजन के सहयोग से आयोजित होती आ रही है।
निदेशक देवेंद्र पंडित का कहना है कि रामलीला के अधिकतर कलाकार बिना किसी पारितोषिक के अपनी रुचि से लीला में भाग लेते हैं।जो कुछ उनकी भूमिका के लिए इनाम की राशि मिल जाए उसी से खुश हो लेते हैं।
व्यास प्रेमचंद मिश्रा के अनुसार दुद्धी की राम लीला आज भी जिले भर में प्रसिद्ध है। यहां की रामलीला संगीतमय में होती है और संपूर्ण रामलीला रामचरितमानस, राधेश्याम रामायण पर आधारित है।
रामलीला कमेटी के प्रबंधक कमलेश कमल के अनुसार-सोनभद्र जनपद में रामायण कल्चर मैपिंग योजना के अंतर्गत रामलीला के कलाकारों के आर्थिक प्रोत्साहन एवं कोरोना संक्रमण काल में कलात्मक अभिरुचि, रंगमंच से दूर होकर धन उपार्जन के लिए मेहनत- मजदूरी करने वाले कलाकारों के लिए केंद्र सरकार एवं उत्तर प्रदेश सरकार की रामायण कल्चर मैपिंग योजना के अंतर्गत कलाकारों एवं रामलीला मंडलियों केअभिलेखीकरण का काम जारी है जिससे भविष्य में रामलीला से जुड़े कलाकारों को रोजगार का अवसर प्राप्त होगा।
रामलीला आज भी गांव- गिराव, शहरो- कस्बों में रहने वाले लोगों के मनोरंजन एवं शिक्षा का उचित माध्यम है। यह प्राचीन परंपरा आज भी सोनभद्र जनपद के दुद्धी तहसील में कायम है।





