HIGHLIGHTS
- लाला रामदेव ने स्थापित कराई थी मां शीतला की मूर्ति।
- आदिवासी जन देवी धाम में आकर करते हैं देवी नृत्य।
- भक्त कर रहे हैं 100 वर्षों से मां की पूजा और आराधना।

(संवाददाता)
सोनभद्र। जनपद मुख्यालय रॉबर्ट्सगंज नगर के मुख्य चौराहे पर अवस्थित शक्ति पीठ मां शीतला का धाम वर्ष भर श्रद्धालुओं, भक्तों के आस्था का केंद्र बना रहता है। लेकिन श्रावण मास, नवरात्रि, शादी ब्याह के मौसम में इस धाम में हजारों भक्तों की प्रतिदिन भीड़ लगी रहती है श्रद्धालु मां का दर्शन- पूजन- अर्चन कर मां का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

इतिहासकार
मंदिर के इतिहास के बारे में इतिहासकार दीपक कुमार केसरवानी बताते है कि-“ऐतिहासिक शोध और अध्ययन से यह ज्ञात हुआ है कि सन 1846 में रॉबर्ट्सगंज नगर की स्थापना मिर्जापुर जनपद के अंग्रेज उप जिला अधिकारी डब्ल्यूबी रॉबर्ट्स ने किया था, इसके पश्चात इस नगर में वैश्य व्यापारियों का आगमन शुरू हो गया था उनमें एक थे लाला रामदेव जिन्होंने अपनी भूमि पर स्थित नीम के पेड़ के नीचे मां शीतला की मूर्ति स्थापित कराया था, तभी से इस देवी को लोकदेवी, कुलदेवी के रूप में मान्यता प्राप्त हुई। नगर के आसपास के कस्बों से भक्तजनों का मां की आराधना हेतु आगमन शुरू हो गया था। इसके पश्चात इनके सुपुत्र रॉबर्ट्सगंज टाउन एरिया के ।चेयरमैन भोला सेठ के कार्यकाल में स्थानीय नागरिकों के सहयोग से सन 1971 मंदिर का निर्माण शुरू हुआ। वर्तमान समय में शक्तिपीठ मां शीतला धाम का भव्य स्वरूप श्रद्धालुओं भक्तों के आगाध श्रद्धा, विश्वास के कारण देश भर में प्रसिद्ध हो चुका है, इस धाम में दूर-दूर से भक्त जन दर्शन, पूजन, अर्चन के लिए आते हैं।

सोनभद्र जनपद में निवास करने वाली आदिवासी जातियों के लोगों का भी आस्था और विश्वास का केंद्र है, यहां पर प्रत्येक नवरात्र के अष्टमी वाले दिन आदिवासी श्रद्धालु बुढ़िया माई, जई लेकर, गुरदम भाजते हुए ढोलक की थाप पर देवी गीत गाते हुए स्त्री पुरुष देवी नृत्य करते हैं। इस नृत्य में आदिवासी श्रद्धालु, नर्तक इतने विभोर हो जाते हैं कि वे सांगा से अपनी जिह्वा, बांह को छेद लेते हैं आश्चर्य है कि खून की एक बूंद भी नहीं टपकती अपने घाव को ठीक करने के लिए नींबू के रस में सिंदूर मिलाकर लेप लगाते हैं। आज के इस वैज्ञानिक युग में भी एक महान आश्चर्य का विषय है अथवा इसे मां के शक्ति का प्रभाव कहा जा सकता है।

वैसे तो शक्तिपीठ मां शीतला के धाम में वर्ष भर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है, लेकिन श्रावण मास, विवाह- शादी के अवसरों पर इस स्थान पर बच्चों का मुंडन संस्कार, विवाह संस्कार के पश्चात वर वधु के बनवार छुड़ाने, सत्यनारायण भगवान की कथा सुनने की परंपरा आज भी कायम है। नगर वासियों के प्रत्येक मांगलिक कार्यों का शुभारंभ मां शीतला के दर्शन पूजन अर्चन से ही आरंभ होता है।
मां के धाम में कीर्तन करने की परंपरा नगर के राजकुमार केसरी (कुमार साव) रामकृष्ण तिवारी, सोबरन साव,गोपाल केसरी सहित अन्य भक्तों ने आरंभ किया था यह परंपरा आज भी कायम है, नवरात्र में मां के पचरा गाने की परंपरा चमेली देवी, फुल्ला देवी आदि स्त्रियों ने शुरू किया था, इस परंपरा का निर्वहन आज भी मंदिर के आसपास की निवास करने वाली महिलाएं करती हैं।

शक्तिपीठ मां शीतला देवी धाम में पूजा- अर्चना का आरंभ ममुआ गांव के पुजारी सरजू राम शुक्ला, केदारनाथ शुक्ला, अक्षैबर नाथ शुक्ला द्वारा परंपरागत रूप से किया जाता रहा। वर्तमान समय में इस मंदिर के प्रधान पुजारी प्रशांत कुमार शुक्ला एवं पुजारी राहुल शुक्ला मां की सेवा कर रहे हैं।

नव दिवसीय भक्तिमय पर्व के अवसर पर शक्तिपीठ मां शीतला के धाम में शाम को होने वाली भव्य आरती में स्थानीय भक्तजन भाग लेते हैं और जिला प्रशासन सोनभद्र द्वारा भक्तों की सुरक्षा, यातायात की व्यवस्था पुलिस प्रशासन द्वारा सुनिश्चित कराई जाती है।




