बुढ़वा मंगल पर्व की नीव डाली थी रामसूरत यादव ठेकेदार ने : दीपक कुमार केसरवानी

दीपक कुमार केसरवानी
(इतिहासकार)

HIGHLIGHTS

  • डफली की थाप पर गाए जाते थे फगुआ के गीतठंडाई पीने, गुझिया खिलाने- पिलाने का  दौर देर रात तक चलता था
हर्षवर्धन केसरवानी
(संवाददाता)

सोनभद्र। कल का रॉबर्ट्सगंज कस्बा आज का आधुनिक शहर सोनभद्र नगर है। आधुनिकता की चकाचौंध में यहां की सांस्कृतिक परंपराए बदल चुकी है, यहां के तीज, त्यौहार, व्रत मनाने का रंग ढंग। लगभग 50 वर्ष पूर्व नगर में धार्मिक एकता, प्रेम, सौहार्द की परंपरा कायम थी।
नगर का उत्तर मुहाल सांस्कृतिक परंपराओं का गढ़ माना जाता था जहां पर दीपावली, दशहरा, जन्माष्टमी, होली का पर्व बड़े ही धूमधाम, हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता था बिना किसी के आर्थिक सहयोग के, सारे आयोजन का भार वहन करते थे नगर के प्रतिष्ठित व्यवसायी रामसूरत यादव ठेकेदार।

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होली मनाने का शुभारंभ शिवरात्रि से ही हो जाता था, और लोग बड़े ही मर्यादित ढंग से होली पर्व को मनाते थे, बच्चों को रंग, पिचकारी, अबीर, गुलाल, टोपी आदि का वितरण किया जाता था जिसके कारण बच्चे होली पर्व के 15 दिन पूर्व ही होली खेलना शुरू कर देते थे। होली का आज जो विद्रुप रूप देखने को मिलता है वह उस समय नहीं था, नगर के लोग उत्तर मोहाल में रामसूरत यादव ठेकेदार के बैठक मेंआकर शालीनता, मर्यादा के दायरे में रहकर होली पर्व मनाते थे, पुरुष बाहर सड़कों पर तो महिलाएं घरों में होली खेलकर परंपराओं का पालन करती थी। तब बाल्टी में रंग घोलकर पीतल की पिचकारी से एक दूसरे पर रंग डाला जाता था, चेहरे पर रंग, बारनीस पोतकर, बालों में रंग डाल कर होली त्योहार की खुशी जहिर किया जाता था।
आज प्रेम, सौहार्द, आपसी भाई चारा मिलन का पर्व होली को मनाने की परंपरा पूरी तरह बदल चुकी है। पुरानी परंपराओं को याद करके नगर के बुजुर्ग अपने आपको गौरवान्वित महसूस करते हुए पुरानी स्मृतियों में खो जाते हैं, नगर के उत्तर मुहाल से ही बुढ़वा मंगल मनाने की परंपरा की शुरुआत हुई थी।
होली का पर्व मोहल्ले में शिवरात्रि से ही शुरू हो जाता था और इसका समापन बुढ़वा मंगल को हर्षोल्लास के साथ होता था। परंपरा को शुरू करने वाले स्वर्गीय राम सूरत यादव ठेकेदार होली और बुढ़वा मंगल के अवसर पर फगुआ के गीत गाने वाले राजकुमार केसरी, शंभूनाथ केसरी, ढपली पर थाप देने वाले मामा भले ही दिवंगत हो चुके हो,लेकिन उत्तर मोहाल के माता प्रसाद सोनी, जवाहिर प्रसाद सोनी, गुलाब प्रसाद केसरी, मोती लाल सोनी, नंदलाल केसरी आज भी अपनी भूली बिसरी दास्तान युवाओं को सुनाते हैं जो इतिहास के पन्नों में दर्ज हो चुका है।

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नगर की पुरानी परंपराओं को याद करते हुए इतिहासकार दीपक कुमार केसरवानी बताते हैं कि-“ सोनभद्र नगर का उत्तर महाल संस्कृति, साहित्य, कला, पत्रकारिता का केंद्र बिंदु था। यहीं पर वाराणसी से प्रकाशित आज हिंदी दैनिक के पत्रकार, स्तंभकार निरंजन लाल जालान, महावीर प्रसाद जालान, ओम जालान, दैनिक जागरण के पत्रकार सत्यनारायण जालान, नगर के पूर्व चेयरमैन भोला सेठ, वाइस चेयरमैन एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मोहनलाल गुप्ता, समाजसेवी शिव शंकर प्रसाद केसरी, पुरुष होते हुए भी स्त्रियों का स्वांग रचकर हिजड़ो के साथ नाच गाकर जीवन यापन करने वाले अनंत लाल, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, प्रसिद्ध कजली गायक श्री राम (जय श्री) चंडी होटल के मालिक चरणजीत सिंह, अन्य गणमान्य महानुभाव का निवास स्थान था और यह स्थल नगर की हृदय स्थली थी, जहां पर दीपावली, दशहरा, जन्माष्टमी, होली आदि प्रमुख पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता था।

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-नगर का उत्तर मुहाल सांस्कृतिक, साहित्यिक रूप से समृद्ध था, यहां पर निवास करने वाले मिर्जापुर के मूल निवासी रामसूरत यादव ठेकेदार इस नगर में काशी की तर्ज पर बुढ़वा मंगल मनाने की शुरुआत किया था। इस दिन नगर के अढतिया मामा के ढपली की थाप पर फगुआ के गीत राजकुमार केसरी, शंभूनाथ केसरी, रामसूरत ठेकेदार की बैठक में गाते थे इसी दिन यहां पर इतनी होली खेली जाती थी कि बैठक की सफेद चांदनी, मसलद, दीवारें सभी रंगीन हो जाती थी।
सुबह नगर के सब लोग रामसूरत ठेकेदार के बैठक में आते थे और एक दूसरे को रंग, अबीर, गुलाल लगाते थे और सम्मान स्वरूप उन्हें होली वाली टोपी पहनाई जाती थी तत्पश्चात सभी लोग बैठकर फगुआ गीत आनंद और गुझिया जैसे लचीज मिष्ठान का स्वाद लेते थे।

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दोपहर के बाद पहलवान द्वारा भांग और ठंडई पीसने का क्रम शुरू हो जाता था, शाम होते-होते भांग और ठंडाई तैयार हो जाती थी नगर के सभी लोग श्वेत वस्त्र धारण कर एक दूसरे को से गले मिलकर ठंडाई का आनंद लेते थे, किसी के साथ कोई जबरदस्ती नहीं, कोई मजाकबाजी नहीं जिसको भांग पसंद हो, जो खाता हो वह स्वेच्छा से भाग लेता था और पूरी महफिल मस्ती में डूब जाती थी यह क्रम देर रात तक चलता था।
रामसूरत यादव ठेकेदार द्वारा होली की तैयारी शिवरात्रि से ही कर दी जाती थी, शिवरात्रि के दिन विधि- विधान से नगर के उत्तर मुहाल के सब्जी मंडी के मोड़ पर होलिका गाड़ कर होली पर्व का शुभारंभ किया जाता था। समय के साथ साथ होली पर्व मनाने की परंपरा में परिवर्तन होता चला गया और आज जिस प्रकार होली का पर्व मनाया जाता है वह हम भली भांति जानते हैं। सोनभद्र नगर क इतिहास में बुढ़वा मंगल जैसे पर्व की शुरुआत करने वाले रामसूरत यादव ठेकेदार का नाम स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है।

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संस्कृति LIVE द्वारा प्रकाशित

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