एक दिन नहीं, सदा सर्वदा नारी का करें सम्मान: बाल व्यास आराधना चतुर्वेदी

राम अनुज धर द्विवेदी

सोनभद्र। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर महिलाओं की विभिन्न क्षेत्रों में निरंतर बढती प्रतिभा की चर्चा न की जाए तो दिवस विशेष मनाने का कोई औचित्य ही नहीं! देश प्रदेश के साथ ही सोनभद्र में भी धर्म संस्कृति एवं अध्यात्म, साहित्य, पत्रकारिता, कला, शिक्षा, चिकित्सा और समाज सेवा के क्षेत्र में कई महिलाएं उल्लेखनीय व अग्रणीय भूमिका अदा कर अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की सार्थकता को साकार करने का काम कर रही हैं।

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भारतीय सनातन संस्कृति और अध्यात्म के क्षेत्र में कम समय में अपना वर्चस्व स्थापित करने वाली सोनभद्र जनपद की एक महिला बाल व्यास आराधना चतुर्वेदी का नाम आदर के साथ लिया जाता है। बाल व्यास आराधना चतुर्वेदी ने मंगलवार को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर एक भेंट वार्ता में कहा कि आज सुबह से ही नहीं अपितु सोमवार रात्रि से ही महिला दिवस की अग्रिम शुभकामनाओं का अंबार लगा हुआ है। क्या महिलाओं के सम्मान करने का मात्र एक ही दिन होता है! विचारणीय बात यह है कि नित्य प्रति महिलाओं चाहे वो मां, बहन,बहु या बेटी किसी भी रूप में हो उनके साथ छोटी- छोटी बात पर अपमानजनक व्यवहार अशोभनीय नहीं है!

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क्या एक दिन महिलाओं के सम्मान में लिख देने से उन्हें बधाई दे देने से एक वर्ष की क्षतिपूर्ति हो जाएगी! वह आगे यह भी कहती हैं कि एक महिला जो मृत्यु के मुख में जा कर एक जीवन को संसार मे लाती है, महिला होना सम्मान है कि वो सब सहते हुए भी अपने कर्तव्य का निर्वहन करती है! महिला होना सम्मान है कि वो एक ही नहीं बल्कि दो- दो कुलों की मर्यादा है! महिला होना सम्मान है कि वो हार नहीं मानती और एक नई ऊर्जा के साथ प्रत्येक दिन कार्य करती है !

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बाल व्यास आराधना चतुर्वेदी ने महिलाओं के दूसरे पक्ष को उद्घाटित करते हुए यह भी कहा कि आज इस पर भी चर्चा होनी चाहिए कि एक महिला ही एक महिला के विरुद्ध कार्य क्यों करती है! क्या यह महिला होने का अभिशाप नहीं है कि 6 माह की बच्ची भी सुरक्षित नहीं है! उसे एक देह भोग का उपक्रम समझा जाता है न कि एक जीता जागता इंसान,महिला होना एक अभिशाप है क्योंकि उसे अपने स्वार्थ के अनुसार देखा जाता है अर्थात जब हमारे स्वार्थ की सिद्धि हो उसे देवी बना दिया जाता है और जहां स्वार्थ की सिद्धि न हो वहां उसे अपशब्द और अमर्यादित शब्दों से पुरस्कृत किया जाता है।

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हमारे धर्म ग्रंथों में यह स्पष्ट उल्लेखित है कि “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता” परन्तु शायद ही कुछ घरों में नारी की पूजा होती है अन्यथा उन्हें अपशब्द व अपमान के सिवा कुछ नहीं प्राप्त होता। जबकि एक स्त्री मात्र यही चाहती है कि उसके कार्य के लिए कुछ अच्छे शब्द कह दिए जाएं और प्रेम से बात कर ली जाए। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर महिला जगत के प्रति अपनी शुभकामनाएं देते हुए कहा है कि सदा नारी का सम्मान करो व उसे मौका नहीं उसे जिम्मेदारी समझो यही सबसे बड़ी शुभकामना व बधाई होगी।

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संस्कृति LIVE द्वारा प्रकाशित

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