परंपरा पकौड़ी दिवस मनाने की

HIGHLIGHTS

  • निराला जयंती को पकौड़ी दिवस के रूप में मनाया जाता है।
  • बसंत पंचमी को मनाया जाता है निराला जयंती
  • आज भी कायम है यह अनोखी परंपरा

हर्षवर्धन केसरवानी

सोनभद्र। महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की जयंती अनोखे ढंग से मनाने की परंपरा सोनभद्र जनपद के मुख्यालय रॉबर्ट्सगंज में आज भी कायम है। वर्ष 2007 में निराला जयंती के अवसर पर मधुरिमा साहित्यिक गोष्ठी की ओर से सम्मानित वरिष्ठ साहित्यकार दीपक कुमार केसरवानी के अनुसार-“साहित्यकार अजय शेखर की खुले आंगन में ईटों को जोड़कर बनाया गया परंपरागत चूल्हा, चूल्हे में जलती हुई लकड़िया, चूल्हे पर रखे कढ़ाई में उबलते हुए सरसों के तेल में बेसन से सनी हुई गोभी, पालक, प्याज की हरे, पीले रंग की उछलती, कूदती, नाचती, बुदबुदाती पकौड़ियां, चूल्हे की आग पर डेकची उबलता हुआ चाय, मौनवार्ता करते, चूल्हे की आग को धीमा- तेज,खर- सेवर पकौड़ी, ठंडी चाय, गरम चाय की जांच करते बगुले की पर की तरह सफेद दाढ़ी- मूछ वाले मुस्कुराते,कविता गुनगुनाते पाक शास्त्री गीतकार जगदीश पंथी
बसंत पंचमी की गुनगुनी धूप में लाल कुर्सी पर बिन बुलाए परंपरागत साहित्यकारों को बड़े विनीत, स्नेह, प्रेम भाव से पकौड़ी का दोना पकड़ाते आशुतोष पांडे (मुन्ना)

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गरमा- गरम चाय के साथ पकौड़ी के साथ काव्य संतो के काव्य रस का आनंद उठाते, बसंती बयार में डूबते- उतराते मंत्रमुग्ध श्रोता। यह दृश्य प्रतिवर्ष साहित्य प्रेमियों के सामने बसंत पंचमी यानी फक्कड़ मिजाज, काव्य सर्जक, कवि महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की जयंती के अवसर पर होता है।” आयोजक मधुरिमा साहित्य गोष्ठी के निदेशक अजय शेखर के अनुसार-मां सरस्वती के वरद पुत्र महाकवि निराला की जयंती परंपरागत, निराले ढंग से पकौड़ी दिवस के रूप में मनाने की परंपरा वर्षों से कायम है।
मेरे एक कवि मित्र की रचना है-

इसीलिए मैंने तुम्हें निमंत्रण नहीं दिया है,
बिना बुलाने आने को कौन रहेगा।
बुलवाने पर अक्सर तो आते हैं,
यह भी अफवाह बहुत है।
बिन बुलाए बेमन आते हैं,
यही सोच कर मैंने बंद किए हर खिड़की दरवाजा।
साकल खटखटाने को कौन रहेगा।

कवि महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

निराला जयंती (पकौड़ी दिवस) के अवसर किसी को आमंत्रण प्रेषित नहीं किया जाता सभी साहित्यकार परंपरागत रूप आते हैं, गरमा- गरम चाय, पकौड़ी, चटनी का आनंद उठाते हुए काव्य रचना सुनते और सुनाते हैं।
यह अनोखी परंपरा आगे भी कायम रहेगी।
संत कीनाराम पीजी कॉलेज कैमूर पीठ के प्राचार्य डॉक्टर गोपाल सिंह के अनुसार-“महाप्राण निराला ने‌ अपनी कविताओं में भारतीय संस्कृति, साहित्य, कला की देवी सरस्वती के मुखमंडल को करुणा के आँसुओं से धुला कहा, सरस्वती को मंदिरों, पूजा-पाठ के कर्मकांड से बाहर लाकर खेतों-खलिहानों में श्रमजीवी किसानों के सुख-दुख भरे जीवन क्षेत्र में स्थापित किया

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कथाकार रामनाथ शिवेंद्र के अनुसार-“सरस्वती भाषा, वाणी, सिद्धि की देवी हैं।
वसंत पंचमी विद्या की देवी सरस्वती का जन्म उत्सव है, जब फूलों में बहार आ जाती, खेतों मे सरसों का सोना चमकने लगता, जौ और गेहूँ की बालियाँ खिलने लगतीं, आम बौरा जाता हर तरफ़ रंग-बिरंगी तितलियाँ फूलों का मकरंद चूसने के लिए मँडराने लगतीं। तब आभास होता है बसंत ऋतु के आगमन का।
साहित्यकार प्रतिभा देवी का मानना है की बसंत पंचमी और महाकवि निराला का संबंध दो शरीर एक आत्मा का है।

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निराला ने ‘हिंदी के सुमनों’ को संबोधित करते हुए जो कविता लिखी है, उसमें अपने को ‘वसंत दूत’ मानते हुए श्रेष्ठ कविताओं की रचना किया है।
अभाव रस के सागर में डूबे निराला जी की आत्मा में वसंत की खुशबू रची-बसी रही। इसीलिए हिंदी जगत उन्हें ‘महाप्राण’ मानता है। इनके जीवन काल में ही समकालीन साहित्यकारों ने यह मान लिया था कि वसंत-पंचमी के दिन सरस्वती की पूजा होती है निराला सरस्वती के वरद पुत्र,सरस्वती साधक, खड़ी-बोली हिंदी में सरस्वती पर अधिक काव्य लेखन करने वाले निराला जी की जयंती बसंत पंचमी ही माना गया।

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यह मान्यता चिर काल तक कायम रहेगी। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का पकौड़ी प्रेम, पकौड़ी पर लिखी कविता उनकी जयंती पर वर्षों से चली आ रही परंपरा अनुसार बसंत पंचमी के दिन काव्य प्रेमियों के मध्य रॉबर्ट्सगंज नगर की साहित्यिक धरा आंगन में सार्थक सिद्ध होती हैं।

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संस्कृति LIVE द्वारा प्रकाशित

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