हर्षवर्धन केसरवानी
सोनभद्र। आजादी के अमृत महोत्सव वर्ष में प्रदेश भर के नाम अनाम सेनानियों के त्याग- तपस्या, बलिदान की गौरव गाथा को जहां एक ओर उजागर किया जा रहा है वहीं विजयगढ़ परगना के ग्राम छतेहरी मे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी राम मनोहर सिंह की समाधि उपेक्षा की शिकार है।
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी राममनोहर सिंह का जन्म 5 सितंबर 1994 को विजयगढ़ परगना के ग्राम छोड़ा के निवासी आदित्य प्रताप सिंह, माता रामवास देवी के घर हुआ था। इनके के दादा बाजबहादुर सिंह विजयपुर रियासत के कुँहकी नेवाड़ी के जमीदार परिवार के थे, ब्रिटिश साम्राज्य का विद्रोह करने के कारण आप की पैतृक संपत्ति को जप्त कर लिया गया घर को जला दिया गया, पशुओं को जंगलों में छोड़ दिया गया और महिलाओं को प्रताड़ित किया गया, जिससे परिवार का जीना दुश्वार हो गया था पूरे गांव को महामारी ने अपनी चपेट में ले लिया था जिसके कारण महामारी में परिवार के पुरुषों की मृत्यु होने के कारण अपने छोटे भाई ,विधवा माँ के विजयगढ़ परगना वर्तमान जनपद सोनभद्र में आए थे।

बालक राम मनोहर सिंह की शिक्षा- दीक्षा संपूर्णानंद संस्कृत महाविद्यालय वाराणसी से हुई थी।
शिक्षा ग्रहण के दौरान ही वाराणसी में इनका क्रांतिकारियों, देशभक्तों, नेताओं से संपर्क हुआ और महात्मा गांधी के आवाहन पर अध्ययन छोड़कर 1921 में “असहयोग आंदोलन”मैं कूद पड़े।
सन् 1941 के व्यक्तिगत सत्याग्रह आंदोलन के अंतर्गत जिला कांग्रेस कमेटी द्वारा इन्हे विजयगढ़ परगना के किसानों के नेतृत्व की जिम्मेदारी सौंपी गई।
इनके द्वारा अपने क्षेत्र के आदिवासी, गरीब, किसानों के साथ मिर्जापुर में ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ प्रदर्शन किया गया अंग्रेज पुलिस द्वारा आपको आंदोलन के नेतृत्व करने के जुर्म में “भारत प्रतिरक्षा ” कानून की धारा 38/5 के तहत 1 वर्ष तक कैद तथा 500 रुपये जुर्माना की सजा हुई।
सन् 1942 के भारत छोड़ों आन्दोलन के सिलसिले में आपको भारत प्रतिरक्षा कानून की धारा 26 के अंतर्गत 17 माह तक नजरबंदी की सजा झेलनी पड़ी।

रॉबर्ट्सगंज संसदीय क्षेत्र के पूर्व सांसद रामस्वरूप स्मृति साझा संकलन- कम्युनिस्ट नेता अभिमन्यु सिंह ने लिखा है कि- “1941 में नजरबंदी, कैद के दौरान बाबूजी राममनोहर सिंह का जेल में पुत्रवत स्नेह मिला था। मै बालक था शरीर से दुबला-पतला था, जेल में मिलने वाला भोजन, दूध बहुत कम हुआ करता था। बाबूजी अपने हिस्से का हिस्से का दूध हमे पीने को दे दिया करते थे। वे कहते थे कि- “तुम लड़के हो तुम दूध को पी लो और शरीर बनाओ।”

स्वाधीनता के पश्चात इस क्षेत्र में स्वाधीनता की लड़ाई लड़ने वाले स्वाधीनता संग्राम सेनानियों का नाम सेनानियों की लिस्ट में सम्मिलित करने के लिए दिल्ली तक की यात्रा किया और सांसद रामस्वरूप के प्रयासों से सोनभद्र के छूटे हुए सेनानियों का लिस्ट में नाम सम्मिलित कराया।
सोनभद्र में चलाए गए भूदान आंदोलन में जमीदारों से भूमि लेकर आदिवासियों, गरीबों में भूमि का वितरण कराया।
प्रकृति प्रेमी, पर्यावरण संरक्षक, समाजसेवी राम मनोहर सिंह एक अच्छे लेखक और कवि थे इन्होंने कई पुस्तकों की रचना की और बाग- बगीचा, हनुमान मंदिर की स्थापना किया।

इनके पौत्र बजरंग दल के प्रांत संयोजक – काशी प्रांत सत्य प्रताप सिंह बताते हैं कि मेरे बाबा के मृत्यु के 1 दिन पूर्व सभी घरवालों को बुलाकर अपने समाधि के लिए स्थान चिन्हित किया और सभी को निर्देश दिया कि मेरे मृत्यु के पश्चात मेरी समाधि यही बनाई जाए।
11 अप्रैल 1994 को इनका स्वर्गवास हुआ और उनकी अंतिम इच्छा के अनुसार चयनित स्थल पर ही उनकी समाधि बनाई गई और प्रतिवर्ष इस समाधि स्थल पर भंडारा, संगोष्ठी आदि का आयोजन होता रहा है, लेकिन आज यह समाधि उपेक्षित है।

आजादी की 75 वीं वर्षगांठ के अवसर पर पूरे देश- प्रदेश, जनपद में आयोजित अमृत महोत्सव के अंतर्गत नाम- अनाम सेनानियों की खोज, स्वाधीनता आंदोलन से जुड़े हुए स्थलों आदि का विकास कार्य प्रदेश सरकार द्वारा कराया जा रहा है। इसके अंतर्गत क्रांतिकारी, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी राम मनोहर सिंह की आदम कद की प्रतिमा की स्थापना एवं समाधि स्थल का विकास सरकार द्वारा कराया जाना चाहिए इसके लिए उत्तर प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी पत्रक दिया जा चुका है।


