- काशी एवं भगवान विश्वनाथ विषय पर विद्वानों ने किया चर्चा
वाराणसी। संस्कृति मंत्रालय (भारत सरकार), वैदिक विज्ञान केन्द्र (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय), संस्कृति विभाग, उत्तर प्रदेश शासन एवं जिला प्रशासन, वाराणसी के संयुक्त तत्त्वावधान में काशी कॉरिडोर उद्घाटन महोत्सव के महीने भर चलने वाले कार्यक्रम के अन्तर्गत “काशी एवं भगवान् विश्वनाथ” विषयक द्वि-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का रविवार को उद्घाटन सुबह 10.30 बजे मुख्य अतिथि उत्तर प्रदेश शासन के पर्यटन, संस्कृति, धर्मार्थ कार्य एवं प्रोटोकाल राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ० नीलकण्ठ तिवारी द्वारा किया गया।

इस अवसर पर प्रो0 आलोक त्रिपाठी, अपर महानिदेशक (भारत सरकार) ने स्वागत करते हुए कहा कि काशी अद्भुत अद्वितीय और अकल्पनीय है। आपने इतिहास, पुरातत्त्व, चित्रकला, संगीत और लोक कला की चर्चा करते हुए अविनाशी, अविमुक्त, आनन्दकानन और महाश्मशान की विस्तृत व्याख्या की। कार्यक्रम का विषय प्रवर्तन वैदिक विज्ञान केन्द्र के समन्वयक प्रो0 उपेन्द्र कुमार त्रिपाठी ने किया। उन्होंने काशी को मोक्ष एवं ज्ञान की नगरी बताया तथा काशी की सांस्कृतिक सीमाओं का वर्णन करते हुए पंचक्रोशी, अन्तरगृही यात्राओं की विस्तृत व्याख्या की।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि नीलकण्ठ तिवारी, उत्तर प्रदेश शासन के पर्यटन, संस्कृति, धर्मार्थ कार्य एवं प्रोटोकाल राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) ने कहा कि इस समय सम्पूर्ण देश ही नहीं अपितु पूरा विश्व उत्साह मना रहा है। काशी इस समय नभ पर चन्द्र की तरह चमक उठी है। इस समय बाबा के दर्शन के लिए सभी उद्दत हैं। काशी सबसे पुरातन और प्राचीन है जहाँ सभी देव-देवी विराजमान हैं। यहाँ के हर कंकण में रुद्र का स्वरूप देखा जा सकता है। यही कारण है कि विदेशी आक्रान्त यहाँ कि सांस्कृतिक, आध्यात्मिक परम्परा को छिन्न-भिन्न करने का प्रयास किया, जिसका काशीवासियों ने प्रबल विरोध किया था साथ ही काशी के समन्वय और समभाव का विशद् वर्णन किया। कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि प्रो० हृदय रंजन शर्मा, मानोन्नत आचार्य, वेद विभाग ने कहा कि हमारा ‘स्व’ भाव और प्राण शक्ति’ एक है हम सब ‘स्व’ भाव में प्रतिष्ठित हैं। उन्होंने सृष्टि के तीन स्तरों की चर्चा करते हुए कहा कि चराचर जगत् आधिदैविक सत्ता में विराजमान है, साथ ही काशी और वाराणसी के नामों की विशद् चर्चा किया और काशी को ज्ञान की पूर्णता प्रदान करने वाली नगरी बताया। आगे कहा कि वेदों की प्रारंभिक सत्ता प्राणात्मक है। कालान्तर में अक्षम होने पर लिपि आदि का विकास हुआ। “कृणवन्तो विश्वमार्यम” की अवधारणा ही हमारी विशेषता है।

कार्यक्रम के सारस्वत अतिथि प्रो० कमलेश झा, संकाय प्रमुख, संस्कृतविद्या धर्मविज्ञान संकाय ने कहा कि सारी सृष्टि को तीन भागां में बाँटकर देखा जाता है। साधक, सिद्ध, सुजान। मान्यतानुसार महाकुम्भ में सभी सन्त प्रयाग से काशी आकर अपने स्थान को लौटते है। शिव का दर्शन कर ही यात्रा पूर्ण होती है। प्रस्थानत्रयी के सारस्वत रूप भगवान विश्वनाथ काशी में पार्वती के साथ उपस्थित हैं। भवानी के बिना शिव पूज्य नहीं है क्योंकि वे शव रूप हो जाता है। शिव भाव लाने वाली अन्नपूर्णा यहा विराजमान है। वेदश्रुति और तंत्र श्रुति की बात कहीं और भगवान शिव के स्वपनादेश से काशी के निर्माण की चर्चा की।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कार्यवाहक कुलपति प्रो० विजय कुमार शुक्ल ने कहा कि काशी! काशी विश्वनाथ के बिना अधूरी है। आपने काशी के तीन खण्डों ओमकार खण्ड, केदार खण्ड तथा विश्वेश्वर खण्ड की विस्तृत व्याख्या की तथा सुश्रुत की चर्चा करते हुए काशी को तीन शक्तियां से पूर्ण बताया। सुश्रुत की चर्चा करते हुए सर्जरी की व्याख्या की तथा प्रथम सर्जरी का उदाहरण भगवान श्री गणेश को बताया। उद्घाटन सत्र का सफल संचालन प्रो० सुमन जैन, प्राचार्या, हिन्दी विभाग, महिला महाविद्यालय, का.हि.वि.वि. एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ० सुभाष चन्द्र यादव, क्षेत्रीय पुरातत्त्व अधिकारी, वाराणसी ने किया। तत्पश्चात् दो शैक्षणिक सत्रो का संचालन किया गया, जिसमें 18 विद्वानो ने काशी के विविध आयामों पर विस्तृत चर्चा की और काशी एवं भगवान् विश्वनाथ की ऐतिहासिकता को प्रतिष्ठापित किया।

कार्यक्रम के प्रथम सत्र की अध्यक्षता प्रो० श्याम गंगाधर बापट, पूर्व अध्यक्ष, पुराणेतिहास विभाग, सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी ने किया। इस सत्र में वक्ता डॉ0 प्रभाकर उपाध्याय ने ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में काशी, डॉ0 विनोद जायसवाल, काशी विश्वनाथ की ऐतिहासिकता, प्रो० माधव जनार्दन रटाटे, काशी एवं काशी विश्वनाथ का स्वरूप, प्रो० शीतला प्रसाद शुक्ल, शिव तत्त्व : काशी के परिप्रेक्ष्य में, प्रो0 संतोष कुमार शुक्ल, पुराणों में काशी, प्रो0 गिरिजा शंकर शास्त्री, काशी विश्वनाथ का अध्यात्मिक स्वरूप पर अपना व्याख्यान दिया। इस सत्र का संचालन डॉ० नारायण प्रसाद भट्टराई एवं धन्यवाद ज्ञापन शुभम तिवारी ने किया। कार्यक्रम का द्वितीय सत्र की अध्यक्षता प्रो० कौशलेन्द्र पाण्डेय, पूर्व अध्यक्ष, साहित्य विभाग, सं.वि.ध.वि. संकाय, का.हि.वि.वि. ने किया। इस सत्र में वक्ता डॉ० प्रभात कुमार मिश्र, काशी में साहित्य और साहित्य में काशी, डॉ0 दयाशंकर त्रिपाठी, काशी की सतत् जीवनचर्या एवं पर्यावरण, प्रो० उपेन्द्र कुमार त्रिपाठी, काशी की वैदिक पाण्डित्य परम्परा, प्रो0 भगवतशरण शुक्ल, काशी विश्वनाथ एवं देव दिपावली, प्रो० सीताराम दूबे, शिव का आयुध प्रतीक एक सांस्कृतिक विमर्श, प्रो० मारूति नन्दन तिवारी, श्री काशी विश्वनाथ धाम का नूतन स्वरूप असम्भव से सम्भव पर अपना विशद् वक्तव्य दिया। इस सत्र का संचालन डॉ० मयंक प्रताप एवं धन्यवाद ज्ञापन श्री कृष्ण मुरारी त्रिपाठी ने किया। इस अवसर पर प्रो0 विजय शंकर शुक्ल, क्षेत्रीय निदेशक, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, वाराणसी, प्रो0 विभा त्रिपाठी, प्रो0 सुमन जैन, प्राचीन इतिहास विभाग, प्रो0 श्रवण कुमार शुक्ला, डॉ0 उत्तम कुमार द्विवेदी, डॉ0 अभीजित दीक्षित, विजय पाण्डेय, पवन कुमार मिश्र एवं कार्यक्रम में विभिन्न विद्वान्, प्रतिभागीगण एवं वैदिक विज्ञान केन्द्र के कर्मचारीगण उपस्थित रहें।
