दूरदर्शन पर कल प्रसारित होगी सोनभद्र के आदिवासी सेनानियों की गौरव गाथा

• स्वाधीनता आंदोलन में आदिवासियों की भूमिका नामक फिल्म का होगा कल प्रसारण।

• इस फिल्म में तिलौली के नील फैक्ट्री सहित अन्य ऐतिहासिक स्थलों को दर्शाया गया है।

• सोनभद्र के आदिवासी सेनानियों पर आधारित है यह फिल्म।

• जनपद वासियों को फिल्म के प्रसारण का बेसब्री से इंतजार।

•इस फिल्म को कल रात्रि 10:30 बजे दूरदर्शन के डीडी यूपी चैनल से प्रसारित किया जाएगा।

हर्षवर्धन केसरवानी

सोनभद्र। आजादी के अमृत महोत्सव वर्ष के अंतर्गत भारत माता को विदेशी दासता से मुक्त कराने वाले वीर सपूतों, देश पर सर्वस्व न्योछावर कर देने वाले आजादी के दीवानों क्रांतिकारियों, भारत में स्वाधीनता का बिगुल बजाने वाले ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ प्रथम बार हथियार उठाने वाली, देशी हथियारों से विजय श्री हासिल करने वाले, अंग्रेजी सेना को धूल चटाने वाले, देश के अस्तित्व स्वाभिमान की रक्षा करने वाले, अंग्रेजी राज्य र के चूले हिला देने वाले, अंग्रेजों द्वारा तोप के मुंह पर बांध कर उड़ा दिए जाने वाले बलिदानी आदिवासी नायको, महानायको के त्याग, तपस्या, बलिदान संघर्ष की गौरव गाथा पर आधारित आदिवासी गौरव दिवस के उपलक्ष्य में स्वाधीनता आंदोलन में आदिवासियों की भूमिका ( जनपद सोनभद्र) पर बनी डॉक्यूमेंट्री का सेटेलाइट टेलीकास्ट दिनांक 5 दिसंबर 2021को रात 10:30 बजे दूरदर्शन के डीडी उत्तर प्रदेश से होगा।

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फिल्म निर्माण में सहयोगी विंध्य विंध्य संस्कृति शोध समिति उत्तर प्रदेश ट्रस्ट के निदेशक/ इतिहासकार दीपक कुमार केसरवानी के अनुसार- इस फिल्म मे अंग्रेजों के जोर-ए- जुल्म का साक्षी तिलौली गांव की नील फैक्ट्री जहां पर स्वाधीनता के पूर्व अंग्रेजों द्वारा जबरदस्ती नील की खेती कराई जाती थी और उन पर अंग्रेज नीलहे किसानों द्वारा जोर जुल्म ढाया जाता था। बांग्लापुरा के नाम से विख्यात इस क्षेत्र में अंग्रेजों का आतंक इतना था कि महिलाएं भी इस क्षेत्र में आने से डरती थी, मजदूरों के थकान होने अथवा बीमार होने पर भी इनसे जबरदस्ती काम लिया जाता था, काम न करने पर इन्हें पेड़ों में बांधकर मारा- पीटा जाता था। सोनभद्र जनपद के स्वाधीनता आंदोलन में अपना महत्वपूर्ण योगदान देने वाले कुसुमा गांव के मंगल वियार, सलखन गांव के शिवनाथ प्रसाद गौड, शंकर प्रसाद गौड सहित अन्य आदिवासी सेनानियों के स्वाधीनता आंदोलन में योगदान को दर्शाया गया है।

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महात्मा गांधी के आवाहन पर सन 1921 मे असहयोग आंदोलन, 1930 में नमक सत्याग्रह, सन 1931 में सरदार भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी देने के विरोध में सन 1942 में अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में इस क्षेत्र के आदिवासी सेनानियों सरकार के खिलाफ आंदोलन धरना प्रदर्शन किया था और इस के जुर्म में अंग्रेजों द्वारा प्रताड़ना के शिकार हुए थे और जेल यात्राएं भी की थी।

संस्कृति LIVE द्वारा प्रकाशित

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