आंवला वृक्ष की पूजा कर मनाया गया अक्षय नवमी का पर्व

हर्षवर्धन केसरवानी

सोनभद्र। कार्तिक मास में पड़ने वाला अक्षय नवमी का पर्व सोनभद्र जनपद में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। इस अवसर पर लोगों ने आंवले के वृक्ष का पूजन और आंवले के वृक्ष के नीचे भोजन करके आध्यात्मिक की सुख की अनुभूति किया।
कार्तिक मास की अष्टमी को गोपाष्टमी और नवमी को आंवला नवमी भी कहते हैं। गोपाष्टमी पर गो, ग्वाल और कृष्ण को पूजने का महत्व है तो आंवला नवमी पर आंवले के वृक्ष के पूजन का महत्व है।

गोपाष्टमी के बारे में लोक मान्यता है कि इसी दिन भगवान कृष्ण को गौ चराने के लिए मां यशोदा ने जंगल भेजा था। इस दिन प्रातःकाल गौओं को स्नान कराकर जल, अक्षत, रोली, गुड, जलेबी, वस्त्र तथा धूप-दीप से आरती उतारते हैं। संध्याकाल गायों के जंगल से वापस लौटाने पर उनके चरणों को धोकर तिलक लगाना की परंपरा आज भी कायम है।

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इतिहास का दीपक कुमार केसरवानी के अनुसार-“यह पर्व
प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का का पर्व है। इस दिन आंवले के पेड़ का पूजन कर परिवार के लिए आरोग्यता व सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। इस दिन किया गया तप, जप, दान इत्यादि व्यक्ति को सभी पापों से मुक्त करता है तथा सभी मनोकामनाओं की पूर्ति करने वाला होता है।

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पंडित मृत्युंजय त्रिपाठी के अनुसार-“ अक्षय नवमी के दिन आंवले के वृक्ष में भगवान विष्णु एवं शिवजी का निवास होता है। इस दिन इस वृक्ष के नीचे बैठने और भोजन करने से रोगों का नाश होता है। शास्त्रों के अनुसार अक्षय नवमी के दिन किया गया पुण्य कभी समाप्त नहीं होता है।

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पद्म पुराण के अनुसार-“ यह पवित्र फल भगवान श्री विष्णु को प्रसन्न करने वाला व शुभ माना गया है। इसके ग्रहण मात्र से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाते हैं। आंवला खाने से आयु  बढ़ती है। इस फल का रस पीने से धर्म-संचय होता है। आंवले के जल से स्नान करने से दरित्रता दूर होती है तथा सब प्रकार के ऐश्वर्य प्राप्त होते हैं। आंवले का दर्शन, स्पर्श तथा उसके नाम का उच्चारण करने से वरदायक भगवान श्री विष्णु अनुकूल हो जाते हैं। जहां आंवले का फल मौजूद होता है, वहां भगवान श्री विष्णु सदा विराजमान रहते हैं। तथा उस घर में ब्रह्मा एवं सुस्थिर लक्ष्मी का वास होता है। इसलिए अपने घर में आंवला अवश्य रखना चाहिए।

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साहित्यकार प्रतिभा देवी के अनुसार-“आंवला नवमी पर आंवले के वृक्ष की पूजा और इसके वृक्ष के नीचे भोजन करने की प्रथा की शुरुआत करने वाली माता लक्ष्मी मानी जाती हैं।
भारतीय लोक में प्रचलित मान्यताओं के अनुसार-“माता लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करने आईं। रास्ते में भगवान विष्णु एवं शिव की पूजा एक साथ करने की उनकी इच्छा हुई। मां लक्ष्मी ने विचार किया कि आखिर एक साथ विष्णु और शिव की पूजा कैसे हो सकती है? तभी उन्हें ख्याल आया कि तुलसी और बेल के गुण एक साथ  आंवले में पाया जाता है। तुलसी भगवान विष्णु को प्रिय है और बेल शिव को।

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आंवले के वृक्ष को विष्णु और शिव का प्रतीक चिह्न मानकर मां लक्ष्मी ने आंवले के वृक्ष की पूजा की। पूजा से प्रसन्न होकर विष्णु और शिव प्रकट हुए। लक्ष्मी  माता ने आंवले के वृक्ष के नीचे भोजन बनाकर विष्णु और भगवान शिव को भोजन कराया। इसके बाद स्वयं ने भोजन किया। जिस दिन यह घटना हुई उस दिन कार्तिक शुक्ल नवमी थी। तभी से यह परंपरा चली आ रही है।

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अक्षय नवमी के इस पर्व के अवसर पर जनपद सोनभद्र के ग्रामीण, शहरी, कस्बाई इलाकों में जहां पर आंवले का पेड़ अवस्थित है। वहां पर श्रद्धालु महिलाओं ने आंवले के वृक्ष की पूजा करते हुए इस पर्व से संबंधित भजन कथा का श्रवण एवं वाचन किया।
जनपद सोनभद्र के मंदिरो, धार्मिक स्थलों पर विविध प्रकार के धार्मिक सामाजिक कार्यक्रमों का भी आयोजन हुआ ।

संस्कृति LIVE द्वारा प्रकाशित

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