हर्षवर्धन केसरवानी
रॉबर्ट्सगंज (सोनभद्र): दीपावली धन की देवी लक्ष्मी के सम्मान में विगत वर्षों की भांति इस वर्ष भी जनपद सोनभद्र में दीपावली का त्यौहार हर्षोल्लास के साथ मनाया गया।
इस अवसर पर जनपद वासियों ने जहां एक और अपने घरों की सफाई रंग रोगन करके अपने घरों व्यापारिक प्रतिष्ठानों को दीपमाला बिजली के झालरों मोतियों से सजाया वहीं दूसरी ओर उत्साही युवकों युवकों ने पटाखे फोड़कर अपनी खुशी का इजहार किया और मंदिरों में दीप प्रज्वलित कर आध्यात्मिक, सुख, शांति, स्वास्थ्य, दीर्घायु होने की मंगल कामना किया।

भक्तजनों ने शुभ मुहूर्त में मां लक्ष्मी गणेश कुबेर मां काली की विधिवत पूजा पाठ किया।
पंच दिवसीय पर्व के अंतर्गत पंचांग के अनुसार अमावस्या यह दिन इस पर्व को मनाए जाने के संदर्भ में अनेकों की मिथक, पौराणिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, लोक कथाएं इत्यादि प्रचलित है।
इतिहासकार दीपक कुमार केसरवानी के अनुसार-“प्राचीन हिंदू ग्रन्थ रामायण में बताया गया है कि दीपावली को 14 साल के वनवास पश्चात भगवान राम व पत्नी सीता और उनके भाई लक्ष्मण अयोध्या लौटने की खुशी दीपावली पर्व का आयोजन अयोध्या वासियों द्वारा किया गया था तब से लेकर आज तक यह पर्व संपूर्ण विश्व रूप से मनाया जा रहा है।
महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महाकाव्य महाभारत अनुसार दीपावली को 12 वर्षों के वनवास व 1 वर्ष के अज्ञातवास के बाद पांडवों की वापसी के प्रतीक रूप बनाया जाता है।
लोक मान्यताओं के अनुसार-” दीपावली को भगवान विष्णु की पत्नी तथा उत्सव, धन और समृद्धि की देवी लक्ष्मी से जुड़ा हुआ हैं।

दीपावली का पांच दिवसीय महोत्सव देवताओं और राक्षसों द्वारा सागर के मंथन से पैदा हुई लक्ष्मी के जन्म दिवस से शुरू होता है। दीपावली की रात वह दिन है जब लक्ष्मी ने अपने पति के रूप में विष्णु को चुना और फिर उनसे शादी की। लक्ष्मी के साथ-साथ भक्त बाधाओं को दूर करने के प्रतीक गणेश; संगीत, साहित्य की प्रतीक सरस्वती; और धन प्रबंधक कुबेर को प्रसाद अर्पित करते हैं।
लोक मान्यताओं के अनुसार दीपावली को विष्णु की वैकुण्ठ में वापसी के दिन के रूप में मनाते है। इस दिन लक्ष्मीजी प्रसन्न रहती हैं इनके पूजन से भक्तजन वर्ष भर मानसिक, शारीरिक दुखों से दूर सुखी रहते हैं।

भारत के पूर्वी क्षेत्र उड़ीसा और पश्चिम बंगाल में लक्ष्मी की जगह काली की पूजा करते हैं, और इस त्योहार को काली पूजा कहते हैं। मथुरा और उत्तर मध्य क्षेत्रों में इसे भगवान कृष्ण से जुड़ा मानते हैं। अन्य क्षेत्रों में, गोवर्धन पूजा (या अन्नकूट) की दावत में कृष्ण के लिए 56 या 108 विभिन्न व्यंजनों का भोग लगाया जाता है और सांझे रूप से स्थानीय समुदाय द्वारा मनाया जाता है।
भारत के पश्चिम और उत्तरी भागों में दीवाली का त्योहार नये हिन्दू वर्ष की शुरुआत का प्रतीक हैं।

दीप जलाने की प्रथा के पीछे अलग-अलग कारण या कहानियाँ हैं। राम भक्तों के अनुसार दीवाली वाले दिन अयोध्या के राजा राम लंका के अत्याचारी राजा रावण का वध करके अयोध्या लौटे थे। उनके लौटने कि खुशी में आज भी लोग यह पर्व मनाते है। कृष्ण भक्तिधारा के लोगों का मत है कि इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने अत्याचारी राजा नरकासुर का वध किया था। इस नृशंस राक्षस के वध से जनता में अपार हर्ष फैल गया और प्रसन्नता से भरे लोगों ने घी के दीए जलाए। एक पौराणिक कथा के अनुसार विंष्णु ने नरसिंह रूप धारणकर हिरण्यकश्यप का वध किया था।तथा इसी दिन समुद्रमंथन के पश्चात लक्ष्मी व धन्वंतरि प्रकट हुए।

जैन धर्म की मान्यताओं के अनुसार-” चौबीसवें तीर्थंकर, महावीर स्वामी को इस दिन मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। इसी दिन उनके प्रथम शिष्य, गौतम गणधर को केवल ज्ञान प्राप्त हुआ था।
जैन समाज द्वारा दीपावली, महावीर स्वामी के निर्वाण दिवस के रूप में मनाई जाती है। महावीर स्वामी (वर्तमान अवसर्पिणी काल के अंतिम तीर्थंकर) को इसी दिन (कार्तिक अमावस्या) को मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। इसी दिन संध्याकाल में उनके प्रथम शिष्य गौतम गणधर को केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। अतः अन्य सम्प्रदायों से जैन दीपावली की पूजन विधि पूर्णतः भिन्न है।
सिख धर्म की मान्यताओं के अनुसार-“सिक्खों के लिए दीवाली महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसी दिन ही अमृतसर में 1577 में स्वर्ण मन्दिर का शिलान्यास हुआ था । इसके अलावा 1619 में दीवाली के दिन सिक्खों के छठे गुरु हरगोबिन्द सिंह जी को जेल से रिहा किया गया था।

दीपावली पर्व को लेकर हिंदू धर्म विविध प्रकार की मान्यताएं हैं।
मुख्य रूप से यह त्यौहार भगवती लक्ष्मी के आगमन एवं लोक जन में सुख, समृद्धि, ऐश्वर्या की वृद्धि को लेकर मनाया जाता है और यह भी मान्यता है कि मां लक्ष्मी के आगमन के पश्चात घरों में दुख विपत्ति के प्रतीक दरिद्र को घर के बाहर खेदने(निकालने) का नियम है। महिलाएं इस कार्य को बड़े ही मनमोहक ढंग से करती हैं इसके पीछे यह भी मान्यता है कि दीपावली के दिन रात भर लोग अपने घरों, प्रतिष्ठानों को मां लक्ष्मी के आगमन के लिए द्वार खुले रहते हैं, ऐसी स्थिति में चोरी आदि जैसे आर्थिक अपराधों से बचने के लिए दरिद्र खेदने का नियम हमारे पूर्वजों ने बनाया है। इसके साथ ही साथ दीपावली की रात्रि में काजल पारने की परंपरा भी कायम है और इस दिन बनाए हुए काजल में औषधि गुण होते हैं जिससे आंखों की ज्योति बढ़ती है।

दीपावली पर्व की शुभकामनाएं देने का दौर इंटरनेट पर पहले से ही शुरू हो गया था लेकिन नगरों, कस्बों, ग्रामीण इलाकों में दीपावली के दिन लोगों ने एक दूसरे के घर जाकर गले मिलकर दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं दिया और स्वादिष्ट मिष्ठान व्यंजनों का स्वाद लिया।

