तंत्र साधकों के सिद्धि का पर्व है दीपावली



गुप्त स्थानों पर करते हैं तांत्रिक सिद्धि की प्राप्ति।

दीपावली पर आयोजित होता है करमा नृत्य।

त्रेता युग में भगवान श्री राम लंका पर चढ़ाई के लिए गए थे इसी मार्ग से।

• आदिवासी समाज में प्रचलित है राम कथा।

हर्षवर्धन केसरवानी

रॉबर्ट्सगंज (सोनभद्र): विंध्य पर्वत के दक्षिण में अवस्थित सोनभद्र जनपद में आदिवासी तांत्रिकों की निशा पूजन की तैयारी शुरू हो गई है और यह तांत्रिक दीपावली की रात्रि में अपनी तंत्र सिद्धि प्राप्त करेंगे।
आदिवासी संस्कृति के अध्येता ऐसे दीपक कुमार केसरवानी की कृति आदिवासी के अनुसार-“प्राचीन काल से ही वर्तमान जनपद सोनभद्र का भूभाग समय रहस्यमयी गुफाओं,कंदराओ ओबरा, ओबरी, खंदको, जंगलों से भरपूर रहा है। तांत्रिक प्राचीन काल से यहां पर तंत्र सिद्धि प्राप्त करते रहे हैं और आज भी यह प्रथा गुप्त रूप से कायम है, जिसकी चर्चा कभी-कभी आदिवासीजन करते हैं।

दीपावली का पर्व आदिवासी समाज में विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहा है क्रेता युग में भगवान श्री राम, भगवती सीता, अनुज लक्ष्मण के साथ वनवास काल में विंध्य पर्वत को पार करते हुए वर्तमान सोनभद्र के जंगलों में रहने वाले आदिवासी जनों के सहयोग से सीता हरण के पश्चात लंका पर चढ़ाई के लिए इसी स्थल मार्ग से रामेश्वरम पहुंचे थे,जिसका वर्णन महर्षि बाल्मीकि नेअपनी कृति रामायण में किया है।

भगवान श्री राम ने वनवास के 14 साल इन्हीं आदिवासियों, वनवासियों, गिरिवासियों के मध्य रहकर व्यतीत किया था।इन्हीं के सहयोग से पृथ्वी पर उत्पात मचाने वाले राक्षसों और लंकापति रावण के क्षेत्रीय राजाओं का वध कर ऋषियो,मुनियों एवं समाज के अन्य वर्गों को भयमुक्त किया था। इन्हीं जातियों के सहयोग से भगवान श्रीराम ने लंकापति रावण पर विजय प्राप्त कर भगवती सीता को वापस ले आए थे।

वनवास से अयोध्या लौटते समय वनवासियों,आदिवासियों, गिरी वासियों ने इनका स्वागत- सत्कार किया था। अयोध्या पहुंचने के पश्चात संपूर्ण अयोध्या के नागरिकों ने दीप जलाकर भगवान श्री राम के आगमन की खुशी में दीपोत्सव का आयोजन किया था।
आदिवासी समाज में भगवान श्रीराम, माता जानकी, अनुज लक्ष्मण सेवक हनुमान विशेष महत्व रहा है इनके वाचिक साहित्य यथा लोककथाओ, लोकगीतों, लोककलाओं में रामायण कथाओं को कहने- सुनने- गुंनने,लोकगीत गाने, लोक चित्र बनाने का प्रचलन रहा है। जो आज भी दृष्टिगोचर होता है।

आज भी आदिवासी समाज के लोग तीर- धनुष जैसे प्राचीन हथियारों का प्रयोग अपने आत्म रक्षार्थ हेतु करते हैं इन्हीं हथियारों के बल पर भगवान श्री राम ने लंका पर विजय प्राप्त किया था।
आदिवासी समाज के लोगों का जीवन प्रकृति पर आधारित रहा है और यह प्राकृतिक शक्तियों की पूजा आदिकाल से करते चले आ रहे हैं। आदिवासी समाज के बैगा जाति के लोग जिन्हें आदिवासी समाज में पुरोहित का स्थान प्राप्त है ये अपनी तांत्रिक क्रियाओं के माध्यम से विभिन्न प्रकार की विपत्तियों, परेशानियों, रोग, बीमारी आदि व्यक्तिगत समस्याओं को दूर करते हैं।

तांत्रिकों के लिए अमावस्या के दिन पडने वाले दीपावली का पर्व सिद्धि प्राप्ति का दिन होता है जिसका इंतजार यह तांत्रिक साल भर तक करते हैं।
दीपावली पर्व साधारणतया आदिवासी समाज में हर्ष उल्लास का पर्व माना गया है, इस पर्व को हंसी खुशी मनाने के लिए आदिवासी समाज में कर्म देव को प्रसन्न करने के लिए करमा नृत्य की परंपरा कायम है, तैयारी आदिवासी धनतेरस पर उसे शुरू कर देते हैं।

कर्म देव की स्थापना, पूजन, अनुष्ठान के साथ कर्मा का पर्व शुरू होता है और रात्रि में आदिवासी स्त्री- पुरुष मंडलकार होकर करम देव की पूजा- अर्चना करते हुए करमा नृत्य करते हैं। यह कार्यक्रम 3 दिन तक चलता है, अंतिम दिन कर्मदेवता को नदी में प्रवाहित कर आदिवासी जन अगले वर्ष आगमन की प्रार्थना करते हैं।
आदिवासी समाज के लिए सुख समृद्धि, उपासना का पर्व है जिसका उन्हें वर्ष भर इंतजार रहता है।

संस्कृति LIVE द्वारा प्रकाशित

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