अमृत महोत्सव पर्व के रूप में मनाया गया धनतेरस

हर्षवर्धन केसरवानी

रॉबर्ट्सगंज (सोनभद्र): संपूर्ण देश में धनतेरस का पर्व अमृत महोत्सव के रूप में मनाया गया ।
वरिष्ठ साहित्यकार दीपक कुमार केसरवानी के अनुसार-” कार्तिक माह (पूर्णिमान्त) की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन समुद्र-मंन्थन के समय भगवान धन्वन्तरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे, इसलिए इस तिथि को अमृत प्राप्त करने के उपलक्ष में अमृत महोत्सव के रूप में धनतेरस पर्व को मनाने की परंपरा प्राचीन है।

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धन्वन्तरि देवताओं के चिकित्सक हैं और चिकित्सा के देवता माने जाते हैं इसलिए यह पर्व चिकित्सकों के लिए महत्वपूर्ण है इसलिए भारत सरकार इस पर्व को राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस के रूप में मनाया जाता है।
देशभर के आयुर्वेदिक चिकित्सालयों में आयुर्वेद की महत्ता पर सेमिनार और विचार गोष्ठी,आयुर्वेदिक दवाओं की कंपनियों द्वारा धन्वंतरी पूजा का भी आयोजन किया गया।
जैन धर्म के अनुसार कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी
जैन आगम में धनतेरस को ‘धन्य तेरस’ या ‘ध्यान तेरस’ भी कहते हैं।

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भगवान महावीर इस दिन तीसरे और चौथे ध्यान में जाने के लिये योग निरोध के लिये चले गये थे। तीन दिन के ध्यान के बाद योग निरोध करते हुये दीपावली के दिन निर्वाण को प्राप्त हुये। तभी से यह दिन धन्य तेरस के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
भगवान धन्वन्तरि चूंकि कलश लेकर प्रकट हुए थे।
इसलिए इस अवसर पर बर्तन खरीदने की परम्परा है। इस दिन धन (वस्तु) खरीदने से उसमें तेरह गुणा वृद्धि होती है। लोगों ने नगर की दुकानों पर बर्तनों की खूब खरीदारी किया ।

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आभूषण की दुकानों पर लोगों ने चांदी के बने बर्तन खरीदा इसके पीछे यह कारण माना जाता है कि यह चन्द्रमा का प्रतीक है जो शीतलता प्रदान करता है और मन में सन्तोष रूपी धन का वास होता है। संतोष को सबसे बड़ा धन कहा गया है। जिसके पास संतोष है वह स्वस्थ है, सुखी है, और वही सबसे धनवान है।

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भगवान धन्वन्तरि जो चिकित्सा के देवता भी हैं। उनसे स्वास्थ्य और सेहत की कामना के लिए संतोष रूपी धन से बड़ा कोई धन नहीं है। लोग इस दिन ही दीपावली की रात लक्ष्मी, गणेश की पूजा हेतु मूर्ति की दुकानों पर काफी भीड़ देखी गई

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शाम को घर के बाहर
मुख्य द्वार पर और आंगन में दीप जलाने की प्रथा है, इस प्रथा के पीछे एक लोककथा है कि-” किसी समय में एक राजा थे जिनका नाम हेम था। दैव कृपा से उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। ज्योंतिषियों ने जब बालक की कुण्डली बनाई तो पता चला कि बालक का विवाह जिस दिन होगा उसके ठीक चार दिन के बाद वह मृत्यु को प्राप्त होगा। राजा इस बात को जानकर बहुत दुखी हुआ और राजकुमार को ऐसी जगह पर भेज दिया जहां किसी स्त्री की परछाई भी न पड़े। दैवयोग से एक दिन एक राजकुमारी उधर से गुजरी और दोनों एक दूसरे को देखकर मोहित हो गये और उन्होंने गन्धर्व विवाह कर लिया।

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विवाह के पश्चात विधि का विधान सामने आया और विवाह के चार दिन बाद यमदूत उस राजकुमार के प्राण लेने आ पहुंचे। जब यमदूत राजकुमार प्राण ले जा रहे थे उस वक्त नवविवाहिता उसकी पत्नी का विलाप सुनकर उनका हृदय भी द्रवित हो उठा। परन्तु विधि के अनुसार उन्हें अपना कार्य करना पड़ा। यमराज को जब यमदूत यह कह रहे थे, उसी समय उनमें से एक ने यम देवता से विनती की- हे यमराज! क्या कोई ऐसा उपाय नहीं है जिससे मनुष्य अकाल मृत्यु से मुक्त हो जाए। दूत के इस प्रकार अनुरोध करने से यम देवता बोले, हे दूत! अकाल मृत्यु तो कर्म की गति है, इससे मुक्ति का एक आसान तरीका मैं तुम्हें बताता हूं, सो सुनो। कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी रात जो प्राणी मेरे नाम से पूजन करके दीपमाला दक्षिण दिशा की ओर भेट करता है, उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता है। यही कारण है कि लोग इस दिन घर से बाहर दक्षिण दिशा की ओर दीप जलाकर रखते हैं।

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भगवान धनवंतरी, कुबेर और लक्ष्मी गणेश की प्रतिमा
पूजा घर में उत्तर दिशा में स्थापित कर भगवान कुबेर को सफेद मिठाई, धनवंतरी भगवान को पीली मिठाई धनिया चढ़ाया।
लोगों ने दीप जलाकर भगवान धन्वन्तरि की पूजा करते हुए भगवान धन्वन्तरि से स्वास्थ और सेहतमंद बनाये रखने की प्रार्थना किया।

चांदी का कोई बर्तन या लक्ष्मी गणेश अंकित चांदी का सिक्का खरीदा नया बर्तन खरीदा। पौराणिक कथा है
कि-” समुद्र मन्थन के दौरान भगवान धन्वन्तरि और मां लक्ष्मी का जन्म हुआ था, यही वजह है कि धनतेरस को भगवान धनवंतरी और मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है ।
धनतेरस दिवाली के दो दिन पहले मनाया जाता है।

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रात्रि में भगवान सूर्य, भगवान गणेश, माता दुर्गा, भगवान शिव, भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी, कुबेर देव और भगवान धन्वंतरि जी की प्रतिमा स्थापित कर कपूर, केसर, कुमकुम, चावल, अबीर, गुलाल, अभ्रक, हल्दी, सौभाग्य द्रव्य, मेहंदी, चूड़ी, काजल, पायजेब, बिछुड़ी, नाड़ा, रुई, रोली, सिंदूर, सुपारी, पान पत्ता, पुष्पमाला, कमलगट्टे, धनिया खड़ा, सप्तमृत्तिका, सप्तधान्य, कुशा, दूर्वा, पंच मेवा, गंगाजल, शहद, शकर, घृत, दही, दूध, ऋतुफल, नैवेद्य या मिष्ठान्न, मालपुए इत्यादि), इलायची (छोटी), लौंग, मौली, इत्र शीशी, तुलसी दल, सिंहासन, पंच पल्लव, औषधि, लक्ष्मीजी का पाना, गणेश मूर्ति, सरस्वतीजी चित्र, चांदी सिक्का, लक्ष्मीजी को अर्पित करने हेतु वस्त्र, गणेशजी को अर्पित करने हेतु वस्त्र, अम्बिका को अर्पित करने हेतु वस्त्र, जल कलश (तांबे या मिट्टी का), सफेद कपड़ा (आधा मीटर), लाल कपड़ा, पंच रत्न, दीपक, बड़े दीपक के लिए तेल, ताम्बूल, श्रीफल (नारियल), धान्य, लेखनी (कलम), बही-खाता, स्याही की दवात, तुला (तराजू), पुष्प (गुलाब एवं लाल कमल), एक नई थैली में हल्दी की गांठ, खड़ा धनिया, दूर्वा आदि, खील-बताशे, अर्घ्य पात्र। भगवान धन्वंतरि को गंध, अबीर, गुलाल, पुष्प, रोली, अक्षत आदि चढ़ाएं। उनके मंत्रों का जाप करें। उन्हें खीर का भोग लगाया।भगवान धन्वंतरि को श्रीफल और कर्पूर से आरती कर मुख्य द्वार एवं आंगन में दीपक जलाया।

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पूजा के पश्चात लोगों ने अपने घर हूं व्यापारिक प्रतिष्ठानों में भगवान धन्वंतरी की आरती का गायन किया-
*जय धन्वंतरि देवा, जय धन्वंतरि जी देवा।
जरा-रोग से पीड़ित, जन-जन सुख देवा।।जय धन्वं.।।
तुम समुद्र से निकले, अमृत कलश लिए।
देवासुर के संकट आकर दूर किए।।जय धन्वं.।।
आयुर्वेद बनाया, जग में फैलाया।
सदा स्वस्थ रहने का, साधन बतलाया।।जय धन्वं.।।
भुजा चार अति सुंदर, शंख सुधा धारी।
आयुर्वेद वनस्पति से शोभा भारी।।जय धन्वं.।।
तुम को जो नित ध्यावे, रोग नहीं आवे।
असाध्य रोग भी उसका, निश्चय मिट जावे।।जय धन्वं.।।
हाथ जोड़कर प्रभुजी, दास खड़ा तेरा।
वैद्य-समाज तुम्हारे चरणों का घेरा।।जय धन्वं.।।
धन्वंतरिजी की आरती जो कोई नर गावे।
रोग-शोक न आए, सुख-समृद्धि पावे।।जय धन्वं.।।

लोगों ने अपनी- अपनीराशियों के अनुसाररा की खरीदारी-

मेष – चांदी की कटोरी, इलेक्ट्रॉनिक सामान, स्वर्णाभूषण।

वृष – कपड़े, कलश।

मिथुन – सोने के आभूषण, स्टील के बर्तन।

कर्क – चांदी के आभूषण या बर्तन, घरेलू सामान।

सिंह – तांबे के बर्तन या कलश, लाल रंग के कपड़े।

कन्या – सोने या चांदी के आभूषण या कलश।

तुला – कपड़े, सौंदर्य सामान या सजावटी सामान।

वृश्चिक – इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, सोने के आभूषण।

धनु – सोने के आभूषण, तांबे के बर्तन,मिट्टी के कलश।

मकर – वस्त्रत्त्, वाहन, चांदी के बर्तन या आभूषण।

कुम्भ – सौंदर्य के सामान, स्वर्ण ,तांबे के बर्तन।

मीन – सोने के आभूषण, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण।

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धनतेरस पर बुध तुला राशि में गोचर कर रहे हैं। ज्योतिषविदों का मानना है कि बुध का राशि परिवर्तन जातकों के आर्थिक, सामाजिक जीवन पर असर डाल सकता है। धनतेरस पर बुध का राशि परिवर्तन मेष, वृश्चिक, कर्क, मिथुन, सिंह और धनु राशियों को आर्थिक और सामाजिक लाभ देगा।
अच्छी सेहत सबसे बड़ा धन है। यदि स्वस्थ देह ही न हो, तो माया किस काम की। शायद इसी विचार को हमारे मनीषियों ने युगों पहले ही भांप लिया था। उत्तम स्वास्थ्य और स्थूल समृद्धि के बीच की जागृति का पर्व है धनतेरस, जो प्रत्येक वर्ष कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाता है।

आध्यात्मिक मान्यताओं में दीपावली की महानिशा से दो दिन पहले जुंबिश देने वाला यह काल धन ही नहीं, चिकित्सा जगत की समृद्ध विरासत का प्रतीक है। या काल यक्ष यक्षिणीयों के जागरण दिवस के रूप में भी प्रख्यात है। यक्ष-यक्षिणी स्थूल जगत के उन चमकीले तत्वों के नियंता कहे जाते हैं, जिन्हें जगत दौलत मानता है। लक्ष्मी और कुबेर यक्षिणी और यक्ष माने जाते हैं। यक्ष-यक्षिणी ऊर्जा का वो पद कहा जाता है, जो हमारे जीने का सलीक़ा नियंत्रित करता हैं। सनद रहे कि धन और वैभव का भोग बिना बेहतर सेहत के सम्भव नहीं है, लिहाज़ा ऐश्वर्य के भोग के लिये कालांतर में धन्वन्तरि की अवधारणा सहज रूप से प्रकट हुई, जो नितांत वैज्ञानिक प्रतीत होती है।

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साहित्यकार प्रतिभा देवी के अनुसार-“
धनतेरस एक ऐसा और इकलौता महापर्व है जिसमें भौतिक समृद्धि के साथ स्‍वास्‍थ्‍स को भी महत्‍व दिया गया है। लक्ष्मी और कुबेर के साथ इस दिन धन्वन्तरि का पूजन हमें जीने का सलीक़ा सिखाता हैं।सनद रहे कि धन और वैभव का भोग बिना बेहतर सेहत के सम्भव नहीं है। लिहाज़ा ऐश्वर्य के भोग के लिये कालांतर में धन्वन्तरि की जो अवधारणा प्रकट हुई, वह नितांत वैज्ञानिक प्रतीत होती है।
धनतेरस का पर्व लोगों ने अपने घरों व्यापारिक प्रतिष्ठानों में बड़े ही सौहार्दपूर्ण ढंग से विधिवत पूजा पाठ के साथ मनाया इस अवसर पर जनपद सोनभद्र के विभिन्न कस्बों बाजारों में खरीदारों की भीड़ आभूषण, बर्तन, मिठाई, कपड़े इलेक्ट्रॉनिक उपकरण मूर्तियों की दुकानों पर काफी भीड़ देखी गई।

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संस्कृति LIVE द्वारा प्रकाशित

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