हर्षवर्धन केसरवानी (संवाददाता)
राबर्ट्सगंज, सोनभद्र। आजादी के अमृत महोत्सव वर्ष में जब पूरा राष्ट्र स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने वाले क्रांतिकारियों, देशभक्तों, स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को व्यापक पैमाने पर सम्मानित कर रहा हो और उनके परिजनों की सुधि ले रहा हो ऐसे
वातावरण में आजादी के पूर्व युद्ध में भाग लेने वाले सैनिकों एवं उनके परिजनों की सुधि भारत सरकार, उत्तर प्रदेश सरकार एवं सोनभद्र जिला प्रशासन को। लेनी चाहिए।
सोनभद्र जनपद के इतिहास का पन्ना एक के बाद एक खुल रहा। सोनभद्र जनपद के चोपन ब्लाक के लालगंज गांव के मेवा पनिका पुत्र सोबरन पनिका का सैन्य सेवा के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान रहा है।
सैनिक मेवा पनिका के 80 वर्षीय पुत्र मनबोध पानिका बताते हैं कि-मेरे पिताजी सहारनपुर डिपो के रीमाउंट सी में भर्ती हुए थे,और द्वितीय विश्व युद्ध में भाग लिया, इस युद्ध में भाग लेने के परिणाम स्वरूप तत्कालीन ब्रिटिश सरकार द्वारा उन्हें चांदी का दो तमगा प्रदान किया गया था। आजादी के बाद मेरे पिताजी मेरठ कैंप में भी तैनात रहे। उनके द्वारा 18 फरवरी 1976 का मेरठ कैंप से प्रेषित मनीऑर्डर की रसीद हमारे पास उपलब्ध है।

विंध्य संस्कृति शोध समिति उत्तर प्रदेश के निदेशक/इतिहासकार दीपक कुमार केसरवानी के अनुसार-मानव जाति की स्वतंत्रता, जानमाल को खतरे में डालने वाला द्वितीय विश्व युद्ध एक संघर्ष था। इस महायुद्ध मे 10 करोड सैनिक सम्मिलित थे। इस युद्ध में लगभग 7 करोड लोग मारे गए।
मित्र राष्ट्रों की ओर से ब्रिटेन ने 3 सितंबर 1939 इंग्लैंड ने जर्मनी के खिलाफ़ युद्ध की घोषणा कर दिया, भारतीयों की इच्छा के विरुद्ध युद्ध में भारत को भी शामिल कर लिया गया।
आजाद हिंद फौज की अभियोग जांच एवं भारतीय सैनिकों का विद्रोह के बावजूद भी ब्रिटिश सरकार द्वारा भारतीय सेना को युद्ध में शामिल करना उसकी मजबूरी बन गई थी और भारतीयों के लिए आजादी का मार्ग इस युद्ध ने प्रशस्त किया। भारतीय सैनिक युद्ध में मातृभूमि की रक्षा के के लिए लड़ रहे थे कि युद्ध जीतने के बाद हमारा देश स्वतंत्र होगा।
इन्हीं विचारों से ओतप्रोत तत्कालीन जनपद मिर्जापुर वर्तमान जनपद सोनभद्र के सैनिकों ने द्वितीय युद्ध में स्वतंत्रता प्राप्ति की इच्छा शक्ति के साथ वीरता पूर्वक युद्ध किया।

इन सैनिकों में जनपद के सचदेव सिंह (मरकरी) जयराम (बड़का गांव तरावा) घुरहू (अमोखर) रामजी (नई बाजार) जीवन दास (मलदेवा) राम देव सिंह (दुद्धि) अब्दुल जबर खान (देवरी) ठाकुर दास (रॉबर्ट्सगंज) राम नरेश (भरहिया) रामप्रवेश (कसौरी) बद्री प्रसाद (खजुरौल) अब्दुल मजीद (देवाटन) कंचन (रामगढ़) फरीउद्दीन (बराक) अजहर अली (नई बाजार) जगन्नाथ (दुद्धी) अब्दुल रहमान (कोन) कुबेर (सहिजन कला) भग्गू (रामगढ़) अली (पगिया) अल्लाह बख्श एवं देवी सिंह (चुर्क) उस्मांन गनी (महुली) वैजनाथ (महैवा) विश्वनाथ सिंह (गिरवविट) त्रिवेणी राम (परसौटी) वीरता पूर्वक युद्ध में भाग लिया और सन 1945 में मित्र राष्ट्रों की विजय के साथ युद्ध समाप्त हो गया।

दितीय विश्व युद्ध भारत की आजादी का स्वर्णिम अवसर था एक और भारत के रणबांकुरे सैनिक अपने मातृभूमि की आजादी की इच्छा शक्ति को रखते हुए धुर राष्ट्र के सैनिकों से लड़ रहे थे तो दूसरी ओर देश में व्यापक स्तर पर आंदोलन महात्मा गांधी द्वारा चलाया जा रहा था और इस आंदोलन में देशभक्त, क्रांतिकारी वीर बड़े ही मनोयोग से भाग ले रहे थे। द्वितीय विश्व युद्ध के ही काल में सन 1940 में व्यक्तिगत सविनय अवज्ञा आंदोलन और सन 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन आरंभ हुआ
भारतीयों का मानना था कि हमें आजादी हासिल करनी है अभी नहीं तो कभी नहीं यह नारा उन्होंने बुलंद किया।

विश्व युद्ध के विजय के पश्चात ब्रिटेन की आर्थिक बदहाली के कारण एवं भारतीयों के व्यापक पैमाने पर संघर्ष और पूरे विश्व में ब्रिटेन की किरकिरी होने के कारण मात्र 2 वर्षों के अंदर ही हमारा देश 15 अगस्त 1947 को आजाद हो गया।
भारत की आजादी में द्वितीय विश्व युद्ध में भाग लेने वाले भारतीय सैनिकों का महत्वपूर्ण योगदान है या यूं कहें कि उन्होंने आपके वीरता के माध्यम से भारत की आजादी का वातावरण बनाया। जिस समय हमारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अंग्रेजों से मुकाबला कर रहे थे उस समय हमारे सैनिक सीमा पर धुर राष्ट्र के सैनिकों से लड़ रहे थे।
आजादी के अमृत महोत्सव वर्ष में जनपद सोनभद्र में द्वितीय विश्व युद्ध में भाग लेने वाले सेनानियों की खोज एवं उनके परिजनों का सम्मान किया जाना चाहिए ताकि वे अपने पूर्वजों के वीरतापूर्ण, देशभक्तिपूर्ण कार्य पर गौरवान्वित हो सके।
