दिल में देश प्रेम का जोश जगाती थी विश्वनाथ प्रसाद खादिम की रचनाएं

हर्षवर्धन केसरवानी (संवाददाता)

रॉबर्ट्सगंज, सोनभद्र। सांस्कृतिक, सामाजिक, ऐतिहासिक, पुरातात्विक स्थलों से भरपूर सोनभद्र जनपद के मुख्यालय रॉबर्ट्सगंज मे जन्मे हिंदी- उर्दू भाषा के महान साहित्यकार विश्वनाथ प्रसाद “खादिम” का नाम हिंदी- उर्दू साहित्यकाश में सूर्य की तरह दीप्तिमान है।
पराधीन भारत में भारत माता की हथकड़ी एवं बेड़ियों को तोड़ने के लिए अपनी हिंदी- उर्दू कविताओं, ग़ज़लों के माध्यम से अंग्रेजो के खिलाफ मोर्चा लेने के लिए जज्बा जगाने वाले,स्वाधीनता आंदोलन में तन मन धन न्योछावर करने की प्रेरणा देने वाली विश्वनाथ प्रसाद “खादिम”( बीएन बाबू) का नाम आजादी के 74 वर्ष व्यतीत होने के बाद भी साहित्य प्रेमियों के दिलों दिमाग पर छाया हुआ है।
आज जब पूरे देश में आजादी के 75 वी वर्षगांठ के 75 हफ्ते पूर्व आजादी के अमृत महोत्सव पर्व का शुभारंभ हो चुका है ऐसे में प्रख्यात शायर, साहित्य, कला प्रेमी, विश्वनाथ प्रसाद “खादिम”
द्वारा रचित रचनाओं के माध्यम से उनके साहित्यिक जीवन को जानना आवश्यक हो जाता है।
जिन्होंने हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता दिलाने के लिए देश के जाने माने साहित्यकार काका कालेकर, हजारी प्रसाद द्विवेदी, सेठ गोविंद दास, व्यवहार राजेंद्र सिंह के आंदोलन को समर्थन देते हुए मिर्जापुर जनपद के साहित्यकारों के साथ मिलकर आंदोलन चलाया और इस आंदोलन के परिणाम स्वरूप हिंदी भाषा को भारतीय संविधान में राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता मिली।

हिंदी- उर्दू भाषा के महान साहित्यकार विश्वनाथ प्रसाद “खादिम” (फाइल फोटो)

14 सितंबर 1949 को मूर्धन्य साहित्यकार व्यवहार राजेंद्र सिंह के 50 वें जन्मदिन को हिंदी दिवस मनाने का निर्णय लिया गया। हिंदी को भारत के प्रत्येक भाग में प्रसारित करने के लिए 14 सितंबर 1953 से हिंदी दिवस मनाए जाने की परंपरा की शुरुआत हुई। हिंदी दिवस के अवसर पर साहित्यकार विश्वनाथ प्रसाद खादिम विचार गोष्ठियों का आयोजन आजीवन करते रहे।
वरिष्ठ साहित्यकार दीपक कुमार केसरवानी के अनुसार- “इनका जन्म 27 दिसंबर सन 1910 ईस्वी को नगर के संभ्रांत वैश्य परिवार के कांग्रेसी नेता एवं रॉबर्ट्सगंज टाउन एरिया के प्रथम चेयरमैन बद्रीनारायण के घर में हुआ था। घर के सभी सदस्य स्वाधीनता आंदोलन से जुड़े हुए थे।
इनकी शिक्षा हिंदी और उर्दू भाषा में रॉबर्ट्सगंज में संचालित एवं सन 1906 में स्थापित मिडिल स्कूल में हुआ था।
इनको अपने परिवार से देश सेवा, समाज सेवा और साहित्य सेवा की शिक्षा प्राप्त हुई थी, बचपन से ही इन्होंने देश भक्ति कविताओं को लिखना शुरू कर दिया था, युवा होने पर इन्होंने अपने व्यवसाय के साथ- साथ हिंदी और उर्दू भाषा में कविताएं एवं गजल लिखना शुरु कर दिया।
उस समय देश पर अंग्रेजों का राज था और नगर में स्वतंत्रता आंदोलन की धूम मची हुई थी खादिम साहब युवाओं में उत्साह जगाने के मकसद से काव्य लेखन किया करते थे, इनकी कुछ गजलें, कविताएं आज भी लोगों के जुबान पर हैं-

राजा दौड़े पुलुर पुलुर,
नेता दौड़े डुगुर डुगुर।

किंग को चर्चिल मुबारक,
ऐमरी को इंडिया।
हम गरीबों को मुबारक,
वाई डी गुंडेबिया।

सर हथेली पर लेकर आगे बढ़े,
कौन जाने यह सिर रहे ना रहे।
अन्न माता का खाते हो खाते रहो,
पर समय पड़े तो सर कटाते रहो।

मुसाफिर अगर हिम्मत ना हारे,
ताजुब नहीं उसको मंजिल पुकारे।

देशभक्ति उत्साह उत्तेजना से भरी हुई कविताओं लेखन एवं खुले मंच पर काव्य पाठ के कारण यह कई बार ब्रिटिश पुलिस के आक्रोश एवं प्रताड़ना की शिकार भी हुए।
अंग्रेजों की प्रताड़ना एवं आक्रोश से बचने के लिए इनके संचालन में रामलीला मंच पर देश भक्ति एवं समाज को शिक्षा देने वाले नाटकों का प्रदर्शन आरंभ हुआ इसमें यह खुद अभिनय करते थे और खजडी पर देशभक्ति से ओतप्रोत कजरी का गायन कर समाज को स्वतंत्रता आंदोलन में सहभागिता के लिए प्रेरित करते थे।
खादिम साहब ने देश के नामचीन शायरों, कवियों के साथ मंच पर काव्य पाठ किया है जिसमें फिराक गोरखपुरी, सूफी चुनारवी, अनवर मिर्जापुरी, दिल लखनवी, राज इलाहाबादी, साहिबा बानो, भज्जी, शिवनाथ बनारसी, तेज बनारसी आदि कवियों का नाम प्रमुख रूप से सम्मिलित है।
इनकी एक कविता की चंद लाइने-
जब भी छेडा दर्द ने दिल को,
अश्क पलकों पर मुस्कुराए हैं।
जब भी आवाज दी तूफा नै,
हम किनारे से लौट आए।

भारत चीन युद्ध के अवसर पर उन्होंने राष्ट्रीय चेतना से भरपूर कविताएं लिखी-
जाग जा तू अरे हिंद के नौजवा, तुझको आवाज देकर बुलाती है मां।
देख लिया गया सर पर तेरे अदू, फिर भी गफलत में मे सोया है।
तू लूट न जाए कहीं मुल्क की आबरू,
खौलता क्यों नहीं अब भी तेरा लहू।
याद कर याद कर अपनी कुर्बानियां,
तुझको आवाज देकर बुलाती है मां।
विश्वनाथ प्रसाद “खादिम” एक साहित्यकार होने के साथ-साथ समाजसेवी भी थे,साहित्यिक कार्यक्रम के आयोजन क्रम में प्रतिवर्ष होने वाले जन्माष्टमी, शंकर मंदिर पर होने वाली झांकी मे इनके परम सहयोगी शिव शंकर प्रसाद केसरवानी मुख्य भूमिका होती थी और कवि सम्मेलन, मुशायरा, कजली, बिरहा आदि सांस्कृतिक कार्यक्रम में इनकी मुख्य भूमिका रहती थी।
आजीवन “नेकी कर दरिया में डाल वाले” पथ पर चलते रहें और कभी अपनी रचनाओं का संकलन इन्होंने नहीं किया।
इनकी मृत्यु कैंसर जैसे असाध्य रोग के कारण 11 फरवरी 1967 ईस्वी को पैतृक आवास रॉबर्ट्सगंज में हुई। इनके देहावसान के पश्चात देश के नामी-गिरामी साहित्यकारों, कवियों ने पत्र के माध्यम से अपनी शोक संवेदना व्यक्त किया था।
वर्ष 2011 में जिला प्रशासन सोनभद्र द्वारा आयोजित सोन महोत्सव के अवसर पर प्रकाशित स्मारिका के लिए जब इनकी रचनाओं की खोज की जाने लगी तो बमुश्किल से एक क्षतिग्रस्त डायरी प्राप्त हुई और उस डायरी में लिखित कविता का प्रकाशन स्मारिका में हुआ।
शोधकर्ता, साहित्यकार दीपक कुमार केसरवानी प्रयासों से लोकवार्ता शोध संस्थान के सचिव डॉक्टर अर्जुनदास केसरी के संपादन में उनकी कविताओं, गजलो पर आधारित लघु कृति “खादिम एक खुशबू” का प्रकाशन किया गया। जिसका विमोचन विंध्य संस्कृति शोध समिति उत्तर प्रदेश ट्रस्ट के कार्यालय में आयोजित हुआ इस विमोचन समारोह में जनपद के नामी-गिरामी साहित्यकार, पत्रकार, समाजसेवी उपस्थित रहे।

संस्कृति LIVE द्वारा प्रकाशित

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