अंग्रेजों के जुल्म का गवाह बंगलापुरा की नील फैक्ट्री

हर्षवर्धन केसरवानी (संवाददाता)

घोरावल ,सोनभद्र।आजादी के अमृत महोत्सव वर्ष के उद्घाटन के पश्चात स्वाधीनता आंदोलन से जुड़े स्थल, सेनानियों की जुड़ी गौरव गाथा पर आधारित दूरदर्शन केंद्र वाराणसी द्वारा निर्मित फिल्म के प्रदर्शन के पश्चात सोनभद्र जनपद के घोरावल तहसील का क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा गांव तिलौली कला का बंगलापुरा आजकल सुर्खियों में है।
यहीं पर अंग्रेजों के जोर-ए- जुल्म का गवाह नील गोदाम,चिमनिया, हौज, पेराई मशीन, अंग्रेज अधिकारियों के रहने के लिए डाक बंगला आदि का खंडहर जीरात (नील खेती के लिए उपजाऊ भूमि) अवस्थित है। कहीं-कहीं पर नीम के पौधे भी देखने को मिल जाएंगे। यहां पर आसामीया पद्धति के अंतर्गत शिकमी और तिनकठिया नील की खेती की जाती थी।

बगलापुरा में अंग्रेजों द्वारा स्थानीय किसानों से दलहन, तिलहन, अनाज की खेती के बजाए जबदस्ती नील की खेती दो आना, ढाई आना प्रतिदिन मजदूरी देकर कराया जाता था, नकद मजदूरी को भी फैक्ट्री के कारिंदे नेग, दस्तूरी नाम से वसूल लेते थे और कभी- कभी इन्हें नकद मजदूरी के बदले अनाज दिया जाता था।जो किसानों के परिवार के लिए अपर्याप्त था।नील की खेती बहुत परेशानी बदबू भरा काम था। इस कार्य के लिए घोरावल सहित दुद्धी, रॉबर्ट्सगंज के गरीब,दलित, आदिवासियों को मजदूरो खेती कराया जाता था।

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी काशीनाथ सिंह की वयोवृद्ध पत्नी कस्तूरा सिंह के अनुसार-“नील की कोठी में नीलहे अंग्रेज रहते थे जो घोड़ों से आते- जाते थे, महिलाओं का अपहरण,बलात्कार जैसी घटनाओं को अंजाम देते थे, इसलिए इस क्षेत्र में महिलाओं का आना- जाना वर्जित हो गया था।

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी काशीनाथ सिंह की वयोवृद्ध पत्नी कस्तूरा सिंह।

इतिहासकार दीपक कुमार केसरवानी के अनुसार-“नील का पौधा दो-तीन हाथ ऊँचा, पत्तियाँ चमेली की तरह टहनी के दोनों ओर पंक्ति में छोटी-छोटी लगती थी, फूल मंजरिया, लंबी लंबी बबूल की तरह फलियाँ लगती हैं। इसको फागुन- चैत के महीने में बोया जाता था, बरसात में टहनियाँ और पत्तियाँ निकलती और बढ़ती और आषाढ़ में पहला कलम हो जाता था, टहनियाँ आदि कारखाने भेज दी जाती थी, कटे हुए हरे पौधों को हौज में दबाकर ऊपर से पानी भर देते थे। बारह- चौदह घंटे पानी में रहने के बाद उसका रस पानी में उतर आता था और पानी का रंग धानी हो जाता था। इसके बाद पानी दूसरी हौज में जाता था जहाँ डेढ़ दो घंटे तक इसे मशीन से पेरा जाता था, पेराई के बाद पानी थिराने के लिये छोड़ दिया जाता था, जिससे कुछ देर में माल नीचे बैठ जाता है।

दीपक कुमार केसरवानी (इतिहासकार)

फिर नीचे बैठा हुआ यह नील साफ पानी में मिलाकर उबाला जाता है। उबल जाने पर यह बाँस की फट्टियों के सहारे तानकर फैलाए हुए मोटे कपड़े (या कनवस) की चाँदनी पर ढाल दिया जाता था, यह चाँदनी छननी काम करती थी, पानी के निथरने के बाद साफ नील लेई के रूप में लगा रह जाता है। यह गीला नील छोटे छोटे छिद्रों से युक्त एक संदूक में, जिसमें गीला कपड़ा मढ़ा रहता था रखकर खूब दबाया जाता था

नील फैक्ट्री का हौज

जिससे उसके सात- आठ अंगुल मोटी तह जमकर हो जाती है। इसकै कतरे काटकर घोरे धीरे सूखने के लिये रख दिए जाते था सूखने पर इन कतरों पर एक पपड़ी सी जम जाती था जिसे साफ कर देते थे, तैयार नील को इंग्लैंड भेज कर उस पर इंग्लैंड का मुहर दाम अंकित कर भारतीय मूल्य की तुलना में 50 गुना दामों पर भारत सहित अन्य देशों को निर्यात किया जाता था।

नील फैक्ट्री‌ की चिमनी

इस क्षेत्र में अंग्रेजों का अत्याचार इतना बढ़ गया था कि खेती में लगे थकावट मिटाने के लिए बैठे मजदूरों को देखकर अंग्रेज अधिकारी फैक्टरी के पास के पीपल के वृक्ष में बांधकर मारते- पीटते थे। नील फैक्ट्री में काम करने वाले मजदूरों के बच्चों के लिए न तो कोई स्कूल था और न कोई दवाखाना।
मुट्ठी भर नीलहे अंग्रेज तिलौली कला गांव सहित आसपास के अन्य गांव के निवासियों की सारी खेती, सारा जीवन बुरी तरह अपनी मुट्ठी में जकड़कर सब कुछ तहस-नहस कर रखा था मजदूरों को भूखे रखकर वह अपनी झोली भर रहे थे।

इसी बरगद के वृक्ष में मजदूरों को बांध कर अंग्रेज मारा- पीटा करते थे।

सन 1859 में बंगाल के कृषकों ने नील विद्रोह कर दिया था इसके बाद गठित आयोग ने नील की खेती पर पूर्णता रोक लगा दिया था, बावजूद इसके अंग्रेज नील की खेती करते रहें और 1917-18 में महात्मा गांधी द्वारा बिहार के चंपारण में नीलहे गोरे किसानों के खिलाफ आंदोलन किया था।
लेकिन घोरावल के बंगलापुरा क्षेत्र में इन आंदोलनों का नील खेती पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा और नीलहे गोरे अंग्रेज मनमाने ढंग से स्थानीय लोगों पर अत्याचार करते रहे और नील की खेती कराते रहे।

तिलौली के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की सामूहिक फोटो (फाइल फोटो)

सन 1941 में महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए सत्याग्रह आंदोलन से क्षेत्र के नौजवानों में नीलहे अंग्रेजों के खिलाफ जोश और जुनून पैदा हुआ और इन्होंने स्थानीय नागरिकों के सहयोग से आंदोलन किया, इस आंदोलन में यहां के निवासी काशी प्रसाद सिंह, शिव चरण सिंह, भूलन सिंह, ननकू राम हज्जाम, झगड़ मियां के नेतृत्व में सैकड़ों नौजवानों ने नीलहे अंग्रेजो के खिलाफ सत्याग्रह आंदोलन किया गया अंग्रेज पुलिस की प्रताड़ना, उत्पीड़न का सामना करना पड़ा और जेल यात्राएं भी करनी पड़ी।
आजादी के बाद ब्रिटिश कालीन नील फैक्ट्री, चिमनी,हौज, डाक बंगला आदि के अवशेष आज भी इस क्षेत्र के लोगों पर अंग्रेजों द्वारा किए जा रहे जोर जुल्म के साक्षी हैं।
आज तिलौली कला बंगलापुरा की नील फैक्ट्री ग्राम पंचायत के अधीन है और वर्षों पूर्व इस क्षेत्र में एक तालाब की खुदाई भी कराई गई थी जिसके कारण ब्रिटिश कालीन नील गोदाम के अवशेष ध्वस्त हो गए थे।
वर्तमान समय में ग्राम पंचायत की लगभग 3 बीघा भूमि पर नील फैक्ट्री का खंडहर आज भी अवस्थित है, फैक्ट्री के अन्य अवशेष नष्ट हो चुके हैं, लोहे की मशीनें गायब हो चुकी हैं बचे हुए अवशेषों का संरक्षण किया जाना सोनभद्र के इतिहास के लिए आवश्यक है।

सोनभद्र के स्वतंत्रता आंदोलन का साक्षी घोरावल तहसील का तिलौली कला गांव का बंगलापुरा नील फैक्ट्री को जिला प्रशासन द्वारा संग्रहालय के रूप में तब्दील किया जाना चाहिए और स्थानीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों जुड़े इतिहास को यहां पर संग्रहित किया जाना चाहिए। ताकि आने वाली पीढ़ियां इस ऐतिहासिक स्थल एवं पूर्वजों के त्याग, तपस्या, देशसेवा से परिचित हो सकें।

संस्कृति LIVE द्वारा प्रकाशित

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