भूमि से अवतरित हुई भगवान विष्णु की मूर्ति

हर्षवर्धन केसरवानी (संवाददाता)

घोरावल (सोनभद्र): ऐतिहासिक अवशेषो का खजाना कहे जाने वाले जनपद सोनभद्र के घोरावल तहसील के वीरकला (मंदहा) गांव में मकान निर्माण के लिए नींव की खुदाई के दौरान भूमि से भगवान विष्णु की मूर्ति प्राप्त हुई है। इस को लेकर क्षेत्र में तमाम प्रकार की चर्चा है शुरू हो गई है।

राम अनुज धर द्विवेदी (पत्रकार,घोरावल)

पत्रकार एवं अधिवक्ता राम अनुज धर द्विवेदी के अनुसार-” वीरकला गांव में मलधर आदिवासी पुत्र दद्दी मकान का निर्माण के लिए
नींव के खुदाई के दौरान मजदूरों को भगवान विष्णु की मूर्ति प्राप्त हुई,मूर्ति की लंबाई लगभग डेढ़ फीट एवं चौड़ाई 1 फुट है।

दीपक कुमार केसरवानी (इतिहासकार)

इतिहासकार दीपक कुमार केसरवानी के मुताबिक-“घोरावल क्षेत्र में जमीन के अंदर से मूर्ति का प्राप्त होना कोई नई बात नहीं है, इसके पूर्व भी अनेकों मूर्तियां प्राप्त हो चुकी हैं इस श्रृंखला में विश्व प्रसिद्ध शिवद्वार की लाश शैली की 10 वीं शताब्दी की उमा महेश्वर की मूर्ति,
बरनहरा मे भगवान विष्णु की दशावतार की मूर्ति मां अष्टभुजा सहित अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां पाई गई है।
सातवीं- आठवीं शताब्दी में सोनभद्र जनपद की धार्मिक स्थिति उन्नत थी।

नीव की खुदाई से प्राप्त भगवान विष्णु की मूर्ति

जनपद के मंदिरों एवं धार्मिक स्थलों का अध्ययन करने पर यह तथ्य प्रमाणित होता है कि सोनभद्र जनपद के रॉबर्ट्सगंज,दुद्धी, घोरावल तहसील के नवीन मंदिरों में प्राचीन मूर्तियां स्थापित है। सातवीं- आठवीं शताब्दी में मऊ से घोरावल तक का क्षेत्र सतवारी पथक (तहसील) के नाम से विख्यात था और यहां पर सभी संप्रदायों के देवी- देवताओं की मूर्ति मंदिरों में स्थापित थी और सभी संप्रदायों के अनुयाई अपने- अपने देवी- देवताओं की पूजा, आराधना करते थे।
घोरावल परिक्षेत्र के शिवद्वार, सतद्वारी, बरकन्हरा, देवगढ़ इत्यादि स्थानों पर पूर्व में कई मूर्तियां मिल चुकी हैं। यहां पर अवस्थित शिल्पी,मूर्तियां आदि गांव शिल्प कला को संबोधित नाम पर आधारित है । इससे यह जानकारी मिलती है कि यह क्षेत्र मूर्तिकला, शिल्पकला का प्रमुख केंद्र था।

डॉक्टर सुभाष चंद यादव (क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी वाराणसी)

क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी वाराणसी डॉक्टर सुभाष यादव के अनुसार -“प्रस्तर निर्मित चतुर्भुज विष्णु प्रतिमा है, जिनके तीन हाथों में शंख, चक्र और दण्ड है तथा चौथा हाथ वरद मुद्रा में है। प्रथम दृष्टया प्रतिमा लक्षण की दृष्टि से इसमें 7वीं-8वीं सदी ईस्वी के तत्व प्रदर्शित होते हैं। अतः इसे सातवीं -आठवीं सदी ईस्वी में निर्मित माना जा सकता है।”
भगवान विष्णु की ऐतिहासिक मूर्ति प्राप्ति के बाद ग्रामीणों में हर्षोल्लास छाया हुआ है ।
मूर्ति की पूजा आराधना जारी है। स्थानीय नागरिक लक्ष्मी शुक्ला,प्रभाशंकर पाठक,प्रवीण त्रिपाठी,आशीष त्रिपाठी,दीपक शुक्ला, निखिल चतुर्वेदी,हरीश आदिवासी,रामनारायण,डंगर,कट्टु आदि ने भव्य मंदिर निर्माण का संकल्प लिया है। क्षेत्र के साहित्यकारों, पत्रकारों, समाजसेवियों, बुद्धिजीवियों ने जिला अधिकारी सोनभद्र से यह मांग किया कि इस मूर्ति की सुरक्षा हेतु आवश्यक कदम उठाया जाए।

इसी नीव की खुदाई में मिली हैं भगवान विष्णु की मूर्ति

संस्कृति LIVE द्वारा प्रकाशित

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